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दुनिया मेरे आगे: आत्ममुग्धता का रोग

सही है कि मौत निश्चित है और वह आएगी ही। लेकिन मौत से पहले मौत आए और कारण महज आत्ममुग्धता बने तो दुख स्वाभाविक है। सेल्फी लेना जब चलन में नहीं था और उस तक पहुंच सीमित थी, तब वैसे ज्यादातर लोग शायद स्वाभाविक मौत तक पहुंचते, जिन्होंने महज सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान गंवा दी। जब से हमारे हाथ में स्मार्टफोन आ गया है और हम सेल्फी वाले बन गए हैं, तब से मौत मोबाइल के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही है।

Author December 18, 2018 3:37 AM
प्रतीकात्मक फोटो (एजंसी)

आसिम अनमोल

सही है कि मौत निश्चित है और वह आएगी ही। लेकिन मौत से पहले मौत आए और कारण महज आत्ममुग्धता बने तो दुख स्वाभाविक है। सेल्फी लेना जब चलन में नहीं था और उस तक पहुंच सीमित थी, तब वैसे ज्यादातर लोग शायद स्वाभाविक मौत तक पहुंचते, जिन्होंने महज सेल्फी लेने के चक्कर में अपनी जान गंवा दी। जब से हमारे हाथ में स्मार्टफोन आ गया है और हम सेल्फी वाले बन गए हैं, तब से मौत मोबाइल के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही है। आए दिन ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें ऐसा लगता है कि सेल्फी ने मौत को आसानी से अपने करीब कर लिया है। सब जानते हैं कि हर इंसान खुद में गुम है। ऐसे में जब कोई मेरी तस्वीर नहीं उतारेगा तो खुद ही सही। भले ही उसके लिए जीवन को जोखिम में डालना पड़े। यानी जीवन का भी मौका गंवाना पड़े तो कोई फर्क नहीं, लेकिन अगर खतरे वाली सेल्फी नहीं ली, तो मानो जीना बेकार है! पता नहीं, इस तरह की सोच लोगों के मन में कैसे बैठ गई है। सवाल है कि व्यक्ति के सोचने-समझने का तरीका ऐसा क्यों हो गया है? उसे अपनी ही जिंदगी इतनी सस्ती क्यों लगने लगी है?

सरकार पुल बनवाती है उस पर लोगों के आवागमन के लिए। लेकिन आज कई आकर्षक माने जाने वाले पुल और इस तरह की दूसरी जगहें खतरनाक अंदाज में खड़े होकर सेल्फी लेने के कारण ज्यादा जाने जा रहे हैं। ऐसे लोगों को शायद मौत से डर नहीं लगता। अगर हाथ में सेल्फी वाला मोबाइल नहीं है तो लोगों को अपना रुतबा कम हो जाने का डर रहता है। ऐसे मोबाइल फोन के कैमरे से ली जाने वाली सेल्फी का अपना आकर्षण है। यह आकर्षण इतना बेलगाम कर देता है कि अपनी मौत तक को प्रकृति के भरोसे नहीं छोड़ा गया है, बल्कि उसे सांसारिक और खिलवाड़ बना दिया गया है। इसकी वजह से आए दिन होने वाले हादसे और मौतों से ऐसा लगता है कि लोगों के सोचने-समझने और धीरज रखने की सीमा कितनी छोटी हो गई है। क्या यह किसी मनोवैज्ञानिक समस्या या रोग से कम है? हालत यह है कि कई लोग गाड़ी चलाते वक्त भी यह ध्यान रखना जरूरी नहीं समझते कि सेल्फी के चक्कर में जरा-सी लापरवाही के बदले हादसा और मौत तोहफे में मिल सकती है। मगर शायद यह बात लोगों के मन में बैठी है कि अगर हमने खतरे से खेलते हुए सेल्फी नहीं ली, हमारा रसूख खाक में मिल जाएगा। कहां से तय हुआ यह रसूख?

सेल्फी अपने आपमें एक ऐसा सौंदर्य उत्पाद है जो खुद को दुनिया के सामने अपनी खूबसूरती रखने का जरिया बन गया है। लेकिन सेल्फी का काम अब खूबसूरत दिखना भर नहीं रहा। इसके असर में लोगों की हालत यह हो चुकी है कि स्मार्टफोन रखने का मूल काम सेल्फी लेना ही समझा जाने लगा है। कई लोग तो सुबह से शाम तक अनेक सेल्फी लेने की जिम्मेदारी ऐसे निभाते दिखते हैं जैसे कोई अनिवार्य काम कर रहे हों। रोजाना की जिंदगी में इससे होने वाले नुकसान से आगे सेल्फी की धुन में डूबे लोगों को अपनी एकाग्रता भंग से लेकर मानसिक बाधाओं तक के बारे में पता नहीं चल पाता। बल्कि उन्होंने यह भी सोचना छोड़ दिया है कि यह बीमारी उन्हें मौत तक भी ले जा सकती है। इसकी दीवानगी में लोग डर के आगे जीत की तर्ज पर अब मौत के आगे जीत को देखना पसंद कर रहे हैं।

दरअसल, सेल्फी का काम अब यह दिखाना रह गया है कि आधुनिक तकनीकी के उपयोग के प्रति हम कितने जागरूक हो गए हैं। हम हर दुख बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन इसके बगैर जीना हमने अपने लिए मुश्किल बना लिया है। हमने अपना मान-सम्मान, कद, ओहदा- सब इससे जुड़ा हुआ मान लिया है। इसी से हमारी आकांक्षाएं पूरी होती हुई दिखती हैं। खुशियां जहां दिख न रही हों, वहां एक सेल्फी ही बत्तीस दांत निकलवा देती है। जब से यह तकनीक आई है, तब से लोगों ने अपने परिजनों और उनके प्रति जिम्मेदारियों तक को पीछे छोड़ देने में हिचकना छोड़ दिया है। कुछ समय पहले एक व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बाजार में सामान की खरीदारी करने गया। उसी दौरान एक सांसद वहां से गुजरे। पति ने जैसे ही सांसद को देखा, अपनी बीवी-बच्चे को भूल कर सांसद के पीछे भागा सेल्फी लेने। इधर न जाने किसने अपनी मोटरसाइकिल से उसके बच्चों को टक्कर मार दी। किसी ने मदद के लिए एक हाथ नहीं बढ़ाया, लेकिन दर्जनों हाथ घायल बच्चे का वीडियो बनाने लगे। सांसद के साथ सेल्फी लेने के बाद जब वह व्यक्ति वापस लौटा तो अपने बच्चों की हालत देख कर हक्का-बक्का रह गया। लोग घायल बच्चों की मदद करने के बजाय वीडियो बना रहे थे!

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