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दुनिया मेरे आगे: पराई उम्मीदों का बोझ

पढ़ाई-लिखाई से लेकर रोजगार के मोर्चे पर आने वाली बाधाएं और नाकामी जरूर बहस का विषय बनती रही हैं, मगर इसके हल की राह की ओर उठे ठोस कदम नहीं दिखते।

Dunia mere aageसामाजिक समस्याएं और परेशानी के बीच जूझता इंसान। (Express Photo by Amit Chakravarty)

मोनिका भाम्भू कलाना

असफलता जीवन की प्राकृतिक गति का एक स्वाभाविक तत्त्व भर है। हममें से हर कोई इसे कभी न कभी झेलता है। लेकिन इससे उपजा माहौल कई बार व्यक्ति के लिए निर्णायक हो जाता है। वजह कोई भी हो सकती है। कभी निजी स्तर पर हुए उथल-पुथल के दायरे में मिली नाकामी के लिए खुद को जिम्मेदार मानना तो कभी व्यापक परिदृश्य में उपजे हालात में लाचारी महसूस करना। भावनात्मक मोर्चे पर हुई नाकामी पर बात करना सबके लिए आसान होता है, लेकिन उसे समझना शायद इतना ही आसान नहीं होता।

पढ़ाई-लिखाई से लेकर रोजगार के मोर्चे पर आने वाली बाधाएं और नाकामी जरूर बहस का विषय बनती रही हैं, मगर इसके हल की राह की ओर उठे ठोस कदम नहीं दिखते। यों अपने देश में एक व्यापक और गंभीर समस्या के तौर पर बेरोजगारी पर ध्यान जाना कोई अजूबी बात नहीं है, लेकिन पिछले साल भर से जो हालात कायम हैं, उसमें इसने मायूसी में इजाफे के कई आयाम रचे हैं। बेरोजगारी के साथ निराशा का बढ़ना स्वाभाविक है। आज जब व्यक्ति की आधी उम्र सरकारी नौकरी की जुगाड़ में ही निकल जाती है तो ऐसे में असफलता व्यक्ति को समूचे तंत्र से ही बाहर फेंक देती है।

दरअसल, हमारे यहां परिणाम लोगों की सोच को तय करते हैं। व्यक्ति का महत्त्व कुछ नहीं। उसकी मेहनत का कोई सम्मान नहीं, अगर किसी वजह से उसने ‘कुछ बन कर’ नहीं दिखाया। अगर हम सामाजिक अपेक्षाओं के मुताबिक कुछ बन जाए तो वही लोग हमको पूज्य समझने लगेंगे, अपने बच्चों को हमारा उदाहरण देने लगेंगे, जिन्होंने किसी समय हमें खारिज किया होता है। समाज के ऐसे रवैया कोई हैरानी नहीं पैदा करता, लेकिन यह थोड़ी कड़वी हकीकत है कि अक्सर खुद मां-पिता भी अपने बच्चों की योग्यता का एकमात्र प्रमाण नौकरीपेशा होना मानते हैं। बल्कि सच यह है कि तुच्छता का पहला अहसास व्यक्ति को अमूमन उसका परिवार ही कराता है।

हो सकता है कि सामाजिक तौर पर या फिर परिवार के प्रति थोड़ा नरमी बरतते हुए भावुक होकर हम इस तरह के आकलन से अपना ध्यान किसी और बात की ओर लगाना चाहें, लेकिन कुछ तल्ख हकीकतें पीछा नहीं छोड़तीं। यह सब सोच का नहीं, सामाजिक संस्कार का हिस्सा हो गया है। हर चीज के पैमाने समाज ने तैयार किए हुए हैं। उससे बाहर हम कुछ भी सोचते हैं तो हमें अपना छिद्रान्वेषण किए जाने और लगातार प्रताड़ित होने के लिए तैयार रहना चाहिए। यहां अपने समाज में विफलता के लिए अस्वीकार्यता ही नहीं, बल्कि बेहद असहिष्णुता भी है जो कभी-कभार तो नफरत की हद तक भी चली जाती है।

असफलता में कोई आश्चर्य नहीं, आश्चर्य इस बात पर है कि असफलता के बावजूद हम खुद को नकारात्मकता और हीन भाव से बचाए रख कर अनवरत आत्मविश्वास को कायम रख पाएं, क्योंकि पूरा परिवेश और तंत्र इस दिशा में कार्यरत है कि कैसे व्यक्ति को बेकार बना दिया जाए… उसे यह यकीन दिलाया जाए कि वह सचमुच किसी काबिल है ही नहीं। कोई काबिल शख्स भी ठीक मौके पर खुद को कमजोर महसूस करने लगता है या फिर दौड़ से बाहर हो जाता है तो क्या उसके लिए ऐसा सामाजिक रवैया जिम्मेदार नहीं है?

दरअसल, आज भी भारतीय समाज में खुद पर भरोसे वाले एक व्यक्ति के तौर पर जीना बहुत मुश्किल काम है। निम्न मध्यमवर्गीय भारतीय माता-पिता तो जिंदगी भर यह भी तय नहीं कर पाते कि आखिर उनकी अपने बच्चों से कैसी अपेक्षाएं हैं… उनकी अपनी क्या महत्त्वाकांक्षाएं हैं! वे तमाम उम्र न अपने बच्चों का स्वभाव जानने की कोशिश करते हैं, न उनके सपनों, उनके विचारों को समझने की कोशिश करते हैं। उनकी सोचने, समझने, विचार करने की पूरी प्रक्रिया सामाजिकता से जुड़ी होती है। वे अपने बच्चों को कभी भी व्यक्तिगत तरीके से देखने की जरूरत ही नहीं समझते। वे आज भी उन्हें आर्थिक जरूरतों के मद्देनजर शिक्षा तो जरूर उपलब्ध करा देते हैं, मगर कोशिश उनकी यही रहती है कि वह शिक्षा नौकरी दिलाने तक ही सीमित रहे। व्यवहार में बदलाव उन्हें बर्दाश्त नहीं होता। उम्र ही उनके लिए योग्यता का एकमात्र प्रमाण पत्र है।

खासतौर पर लड़कियों को उच्च शिक्षा दिला कर भी वे चाहते हैं कि वे ‘गाय’ की तरह ‘सीधी-सादी’ बनी रहें और हरदम उनकी कथित इज्जत के लिए अपने सपनों की बलि देती रहें। दूसरी तरफ, ये बच्चे हर जगह खुद को अलग-थलग पाते हैं। हर तरफ खुद को एकाकी, अजनबी, बेकार और छला हुआ महसूस करते हैं। …और यह निराशा हर बार बढ़ती ही जाती है। न वे उस परिवेश से सामंजस्य बैठा सकते हैं जिसने उन्हें बनाया, न ही उस दुनिया से उनका परिचय होता है जहां के योग्य वे खुद को समझते हैं। यह बहुत ही खतरनाक है। इससे बड़ा तनाव क्या होगा? ये आधे-अधूरे पढ़े-लिखे युवा जिंदगी भर इसी द्वंद्व में जूझते रहते हैं और आखिरकार अपने बच्चों पर इसे डाल कर ही खुद को मुक्त करते हैं। यह सिलसिला कहीं जाकर रुकेगा भी या नहीं, अभी इसमें भी संशय है।

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