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दुनिया मेरे आगेः रिवायत की मार

कुछ दिन पहले दबी आवाज में सुना कि मेरे पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने घरेलू कलह की वजह से आत्महत्या करने की कोशिश की। मन सकते में आ गया।

(pic- westheimphoto)

कुछ दिन पहले दबी आवाज में सुना कि मेरे पड़ोस में रहने वाली एक महिला ने घरेलू कलह की वजह से आत्महत्या करने की कोशिश की। मन सकते में आ गया। मैं उन्हें एक खुशमिजाज औरत के रूप में जानती थी और भाभी कहती थी। कारण जानने का प्रयास किया तो जो बातें सामने आर्इं, उनमें रूढ़ियों और परंपरा के बोझ तले दबती हुई जिंदगी की पीड़ा महसूस हुई। दरअसल, पिछले महीने माहवारी के दौरान उन्होंने जो कपड़े पहने थे, उसे बाहर किसी लॉन्ड्री में धुलवाए बिना पहन कर वे पूजा-घर में प्रवेश कर गई थीं। इसी बात पर पहले उनकी सास, फिर बाकी लोगों ने भाभी और उनके मायके वालों को काफी बुरा-भला सुनाया। वर्षों से यथाशक्ति अपनी सास द्वारा बताए गए रीति-रिवाजों का वहन करते हुए उनकी यह मामूली ‘चूक’ उनका ‘अपराध’ बन गया!

आज हम जीवन के तौर-तरीकों में आधुनिक दिखते हैं। विज्ञान के तमाम संसाधनों का उपयोग करते हैं। लेकिन आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसी परंपराएं हैं जो धर्म की आड़ लेकर महिलाओं और कमजोर वर्गों की जिंदगी और भावनाओं से खेलने का जरिया बनती हैं। समाज के स्तर पर आज भी इन परंपराओं का विश्लेषण करने की जरूरत नहीं समझी जाती कि इनकी उपयोगिता या महत्त्व कुछ है भी या नहीं और क्या ये बेवजह थोपी गई है!

कई बार पढ़े-लिखे सभ्रांत घरों में भी रजस्वला स्त्री को कुछ खास मौकों पर इतनी ‘अस्पृश्यता’ झेलनी पड़ती है जो इसलिए ज्यादा हैरान करती है कि आखिर आधुनिक शिक्षा का मतलब क्या है! वह कैसी पढ़ाई-लिखाई है जो शरीर विज्ञान के बारे में लोगों के भीतर मामूली चीजों के बारे में बनाई गई बेमानी धारणाओं को तोड़ नहीं पातीं। कुछ ऐसे मामलों पर तो विश्वास करना मुश्किल था कि आने वाले पूजा या व्रत को ध्यान में रख कर घर की महिला को दवा खाने पर मजबूर किया गया, ताकि ठीक उस वक्त उसकी माहवारी न शुरू हो जाए। जबकि इन दवाओं के दुष्परिणाम सेहत को भयंकर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

यह कैसी रिवायत है, जिसकी शुद्धता कायम रखने के लिए एक औरत को अपने शरीर और अपनी प्राकृतिक अवस्था से खिलवाड़ करना पड़ता है? ऐसा केवल भारत में सीमित नहीं है। एक समुदाय विशेष में छोटी बच्ची के निजी अंगों के एक हिस्से को दर्दनाक तरीके से काट कर हटा दिया जाता है। इससे उपजा शारीरिक और भावनात्मक कष्ट तो शायद ही भरा जा सके।

महिलाओं को आमतौर पर इन वजहों से मातृत्व सुख में दिक्कत, प्रसव में परेशानी, संक्रमण, कई तरह की बीमारियों और यातनाओं का सामना करना पड़ता है। कई महिलाओं को इन वजहों से जीवन भर अलग-अलग तरह की परेशानियां उठानी पड़ती हैं, लेकिन वे सब चुपचाप सह लेती हैं। लगभग हर धर्म में मासिक धर्म के समय स्त्रियां पूजा-पाठ से अलग रहती हैं। हिंदू धर्म में इसके अलावा भी काफी चीजें वर्जित रहती हैं, मसलन, अचार छूना, पौधों को पानी देना, जमीन पर चटाई बिछा कर सोना, रसोईघर से दूर रहना वगैरह। इस क्रम के पूरा होने और स्नान करके ‘शुद्ध’ होने तक स्त्रियों को एक तरह से अछूत माना जाता है। यहां सिर्फ यह सोचने की जरूरत है कि इतने सारे बंधनों के साथ किसी स्त्री के लिए तीन-चार दिन रहना कितना मुश्किल है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज शहरों-महानगरों में स्थितियां बदली हैं और पढ़े-लिखे तबकों के बीच इन मसलों पर जागरूकता का प्रसार हुआ है। स्त्रियां आजकल घर-बाहर सब जगह काम कर रही हैं और इस तरह की जड़ सोच को बदल रही हैं। इसलिए कुछ हद तक स्त्रियों की प्राकृतिक अवस्था को लेकर कई जड़ताएं टूटी हैं। लेकिन आज भी एक बड़ा तबका ऐसा है जो अतीत में जानकारी के अभाव के कारण थोप दी गई धारणाओं को अपने सिर ढोता रहता है। कई बार महिलाओं पर इस तरह के तमाम अत्याचार इसलिए जायज करार दे दिए जाते हैं या उसके बारे में लोगों को कुछ भी गलत नहीं लगता कि इसके पीछे धार्मिक नियम-कायदों का विश्वास खड़ा होता है। वैचारिक रूढ़ियों और दकियानूसी विचारों की बलि हमेशा की तरह एक लड़की चढ़ती है।

शरीर की साफ-सफाई और बीमारियों से बचाने के लिए उचित इंतजाम करना जरूरी है। वैज्ञानिक नजरिया इसे बेहतर तरीके से करने की जानकारी और भरोसा देता है। लेकिन यही चीज जब किसी अंधविश्वास और रूढ़ि से जुड़ जाती है तो उससे सामाजिक अवस्थिति में स्त्री को कमतर हैसियत में बनाए रखने की परंपरा शुरू हो जाती है। इक्कीसवीं सदी के दौर में जब हम आकाशगंगाओं को छानने की बात करते हैं, वहां निरर्थक रूढ़ियों से लड़ना जरूरी है। कोई भी धर्म अस्पृश्यता या स्त्री के कष्ट के लिए नहीं हो सकता। ये बातें हमारे समाज में विकसित हुई हैं और इसे सचेतन लोग ही खत्म कर सकते हैं।

स्वाति

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