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दुनिया मेरे आगेः सपनों का बोझ

इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं एक छोटे शहर से दिल्ली आई थी। साहित्य में एमए के बाद शोध करने की इच्छा हमेशा से थी।

चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मैं एक छोटे शहर से दिल्ली आई थी। साहित्य में एमए के बाद शोध करने की इच्छा हमेशा से थी। यह अच्छी तरह जानती थी कि भारतीय समाज और पूरी भारतीय शिक्षा प्रणाली में शोध करना आसान काम नहीं। यह किसी चुनौती से कम नहीं। वह भी तब जब विद्यार्थी किसी मध्यवर्गीय या निम्नवर्गीय परिवार से संबंध रखता हो। खैर, स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद शोध के क्षेत्र में जाने का निर्णय मेरा अपना था और जाहिर है, अपने इस निर्णय को सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी मेरी थी। लेकिन बड़ी चिंता थी कि दिल्ली जैसे महंगे शहर में मेरे जैसी साहित्य की शोधार्थी का गुजारा कैसे होगा? इस गुजारे के सवाल के भीतर कई बातें थीं, जिनमें किताबों के खर्च के अलावा आवास और भोजन जैसी मूलभूत जरूरतें भी शामिल थीं। इस चिंता को बहुत हद तक दूर करने का कार्य किया एमफिल के दौरान मिलने वाली फेलोशिप यानी छात्रवृत्ति ने।

यह सच है कि फेलोशिप के पैसों से कोई छात्र विलासिता के साधन तो नहीं इकट्ठा कर सकता, लेकिन उसके लिए इतने पैसे पर्याप्त होते हैं, जिससे वह मेस बिल, हॉस्टल या कमरे का किराया अदा कर सके। मेरे लिए भी फेलोशिप ने जहां पुस्तकों और शोध-सामग्री की खोज में होने वाली भाग-दौड़ के खर्चे की चिंता दूर की, वहीं दिल्ली जैसे शहर में निवास की समस्या भी दूर कर दी। हिंदुस्तान में मुझ जैसे न जाने कितने विद्यार्थी हैं, जिनकी आंखों में उच्च शिक्षा के सपने तैरते हैं, लेकिन अपनी पारिवारिक स्थिति या आर्थिक तंगियों के कारण उनके सपने अधूरे ही रह जाते हैं। यूजीसी द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति उन्हीं सपनों को पूरा करने का एक माध्यम है।

भारतीय समाज में युवाओं पर डिग्रियां लेने के बाद जल्द से जल्द नौकरी पाने और मोटी कमाई घर लाने का दबाव रहता है। एक खास मानसिकता के तहत भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों में शुरू से बच्चों को यह प्रशिक्षण दिया जाता है। बाजारवाद और स्किल डेवलपमेंट के इस दौर में जहां जीवन के लगभग हर क्षेत्र में एक अंधी दौड़ और गलाकाट प्रतियोगिता है, छात्रों पर तकनीकी शिक्षा और मोटी तनख्वाह का दबाव बहुत अधिक बढ़ा है। जहां एक तरफ लड़कों पर नौकरी या रोजगार का भारी दबाव रहता है वहीं ज्यादातर परिवारों में लड़कियों को बीए तक की शिक्षा दिला कर उनके विवाह की तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं।

अगर स्नातक के बाद उन्हें थोड़ी और पढ़ाई का मौका दिया जाता है तो उसका एकमात्र मकसद शादी के लिए बायो-डाटा मजबूत करना होता है। यहां तक कि जो उच्चवर्गीय या उच्चमध्यवर्गीय परिवार लड़की के विवाह में लाखों खर्च करने को तैयार रहते हैं वही उसकी उच्च शिक्षा पर एक रुपया खर्च नहीं करना चाहते। विवाह में किया गया लाखों-करोड़ों रुपए का खर्च उन्हें अपनी सामाजिक हैसियत मजबूत बनाने में मददगार लगता है। जबकि लड़की की शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च उन्हें व्यर्थ लगता है।

क्योंकि पढ़-लिख कर लड़की ‘दूसरे घर’ की हो जाती है, तो उस पर खर्च करने का क्या फायदा! रही बात निम्नवर्गीय परिवारों की, तो भारतीय सामाजिक ढांचे को देखते हुए इस वर्ग की आर्थिक चिंता एक हद तक स्वाभाविक कही जा सकती है। उच्च शिक्षा में पैसे न खर्च करके वह उस पैसे को लड़की के दहेज के लिए जमा करने में लगा रहता है।

शोध के क्षेत्र में मिलने वाली फेलोशिप ने नौकरी और विवाह के दबाव में अपनी इच्छाओं का गला घोंटते युवाओं को पूरे आत्मसम्मान के साथ अपने सपनों को पूरा करने के रास्ते दिखाए। खासकर लड़कियों को इसने उड़ान भरने के पंख दिए। माता-पिता ने भी यह सोच कर उन्हें आगे पढ़ने या शोध के क्षेत्र में जाने की आजादी दी, क्योंकि उनकी शिक्षा पर होने वाले खर्च की पूरी जिम्मेदारी अब सिर्फ उनकी नहीं थी।

इसके अलावा वर्तमान समय में शोध की दयनीय होती स्थितियों के बीच ज्ञान के प्रत्येक अनुशासन में उच्च शिक्षा और शोध को प्रोत्साहन देने के लिए ये छात्रवृत्तियां बहुत जरूरी हो जाती हैं। यह यों ही नहीं है कि दिल्ली और अन्य राज्यों के छात्र कड़ाके की ठंड में भी यूजीसी दफ्तर के सामने प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं। इसके वृहद सरोकार हैं। उनकी आवाज को नजरअंदाज करना एक तरह से राष्ट्र के भविष्य की अनदेखी करना है। वैसे भी शिक्षा हमारा मौलिक अधिकार है और उसमें किसी तरह की कटौती सरकार और व्यवस्था की अदूरदर्शिता और लापरवाही ही कही जाएगी। सरकारों को अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए गंभीरता से इस मुद्दे पर विचार कर जल्द से जल्द सही निर्णय लेने की आवश्यकता है।

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