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आमतौर पर अब चुनावी सभाओं और रैलियों में कुछ नया सुनने को नहीं मिलता। वही आरोप-प्रत्यारोप और झूठे सपने दिखाने का कारोबार। इसलिए इन जनसभाओं के..

Author नई दिल्ली | October 27, 2015 10:57 PM

आमतौर पर अब चुनावी सभाओं और रैलियों में कुछ नया सुनने को नहीं मिलता। वही आरोप-प्रत्यारोप और झूठे सपने दिखाने का कारोबार। इसलिए इन जनसभाओं के विवरण पर से मेरी नजर फिसल जाती है। पर जब कभी अखबारों में पढ़ता हूं कि मुख्य वक्ता यानी बड़े वाले नेताजी के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई भीड़ के सब्र का बांध आखिरकार फट गया और क्रुद्ध भीड़ ने हंगामा मचा दिया तो बड़े चाव से उस खबर पर आंखें ठिठक जाती हैं।

अब इस तरह की खातिर-बात सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि उन फिल्मी सितारों और अन्य कलाकारों की भी होने लगी है, जिनके लिए अपने प्रशंसकों या मात्र कौतूहलवश जमा हो जाने वाले प्रतीक्षारत लोगों के समय का कोई मूल्य नहीं है। महंगे टिकट खरीद कर फिल्मी सितारों या समकक्ष हस्तियों के दर्शन करने को आतुर लोगों में अनेक ऐसे होते हैं जो उन्हें लगभग भक्त की तरह देखते हैं। पर जो लोग कुछ लेने नहीं, बल्कि अपने वोट के रूप में बहुत कुछ देने की क्षमता रखते हैं, उनके समय का मोल आंकना और उसका सम्मान करना अब धीरे-धीरे नेताओं की भी समझ में आने लगा है। लेकिन आदत से मजबूरी भी तो कोई चीज है!

दूसरों के समय की तिरस्कार भरी अनदेखी करने में सरकारी बाबू भी कोई कोर कसर नहीं उठा रखते। जिनसे दफ्तर में फोन पर बात करना लगभग असंभव हो, जिनके निजी सहायक तक ही पहुंचने में आम आदमी के छक्के छूट जाएं, उनकी बात कुछ और ही होती है। अगर आप किसी काम से उनसे मिलने पर तुल गए और किसी तरह उसके लिए समय पा जाने में सफल हो गए, तो आगे की राह कम दुरूह नहीं होती। ‘बड़े भाग मानुस तन पाया’ जैसी भावना से अंदर तक भीग कर जब आप बड़े साहेब के दफ्तर में पहुंचते हैं तो उनके आगंतुकों के कक्ष में प्रवेश करते ही पता चलता है कि और भी बहुत सारे लोगों को उन्होंने मिलने का वही समय दे रखा है जो आपको दिया था। भुनभुनाते और झीखते हुए बैठ कर झख मारने के सिवा आपके और उन सब प्रतीक्षारत लोगों के पास चारा ही क्या रहता है। बैठे रहते हैं।

पूर्वनिश्चित समय के घंटों बाद भी अगर अंत में मुलाकात हो जाती है तो क्या किसी को साहस हो पाता है कि इस अभद्रता और अपमानजनक व्यवहार के विषय में कोई शिकायत करे? अपना काम करवाना है तो इसे शेर के शिकार पर निकलने पर केवल मच्छरों से कटने जितनी ही महत्ता दी जा सकती है। शायद रहीम को भी किसी सरकारी बाबू, किसी मंत्री, किसी नेताजी के दरबार में कुछ मांगने के लिए जाना पड़ा होगा और यही सब भुगतना पड़ा होगा, तब जाकर वे बुदबुदाए होंगे- ‘रहिमन वे नर मर चुके जो कहुं मांगन जाहिं।’ आखिर रहीम थे भी तो खुद ही खानखाना! अगर कबीर जैसा कोई जुलाहा रहा होता तो करघा चलाने का लाइसेंस पाने के लिए इतनी प्रतीक्षा न करता, केवल खुद को कोसता। उसे नहीं जिसके मुंह से अंत में इस मांगने के बदले में ‘नहीं’ निकला। समझदारी तो इसी में है कि संत बन जाएं, तभी सीकरी बुलाया जाएगा तो वहां दरबार की सीढ़ियों पर दिए हुए समय पर बादशाह से मिलने की कामना में बैठे-बैठे जम्हाइयां लेते रहने की अपेक्षा पहले ही कह सकेंगे- ‘संतन को कहा सीकरी सों काम!’

दुर्भाग्य यह है कि दूसरों के (सच पूछें तो अपने भी) समय की कोई कीमत नहीं समझना हमारी राष्ट्रीय पहचान जैसा कुछ बन चुका है। तभी किसी प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन या किसी अन्य ऐसे ही महत्त्वपूर्ण इंसान से, जिसके आए बिना आपके काम रुके पड़े हैं, कोई आशा ही नहीं करता कि आने का वादा करके वह नियत समय पर आएगा। यों अब वे समझदार हो गए हैं। अक्सर लोगों से उलाहने पाते-पाते अब उन्होंने इतना सीख लिया है कि आने का कोई पक्का समय ही नहीं बताएं, पर अपने उन खासे पढ़े-लिखे, सभ्य और सुसंस्कृत परिचितों को क्या कहेंगे जो कई बार कहते हैं कि फलाने दिन, फलाने समय आएंगे या मिलेंगे। उसके बाद वह समय आकर निकल जाता है।

आप प्रतीक्षा करते-करते थक जाते हैं। लेकिन याद दिलाने पर कि उन्होंने आने का वादा किया था, वे बड़ी सहजता से कह देते हैं- ‘अरे क्या बताऊं! कुछ जरूरी काम आ पड़ा।’ और फिर बेफिक्री से विषय बदल देते हैं। पर इन सबमें चैंपियन तो मैं उन्हें समझता हूं जो अपने यहां बुला कर खुद गायब हो जाएं और शिकायत करने पर आराम से कहें- ‘अच्छा, उस दिन (या उस समय) बुलाया था? मैं तो भूल ही गया था!’ फिर बेफिक्री से कहकहा लगाते हैं। किसी तरह की क्षमा याचना का रिवाज कहां है! (अरुणेंद्र नाथ वर्मा)

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