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छोटी-छोटी खुशियां

अपने आसपास के ‘बेरुखे माहौल’ को देख कर अक्सर यह सवाल मेरे जेहन में कुलबुलाने लगता है कि क्या खुशियों ने हमसे दूरी बना ली है या फिर हम ही खुशियों की..

Author नई दिल्ली | October 28, 2015 11:29 PM

अपने आसपास के ‘बेरुखे माहौल’ को देख कर अक्सर यह सवाल मेरे जेहन में कुलबुलाने लगता है कि क्या खुशियों ने हमसे दूरी बना ली है या फिर हम ही खुशियों की शीतल छाया से दूर भागने लगे हैं! खुशियां हमसे छिटक कर न जाने कहां, किस राह चली गई हैं! हम अपनी ही खुशियों को सहजता से संवार नहीं पा रहे। दुख, चिंता, क्षोभ और भय का घेरा निरंतर हम पर गहराता चला जा रहा है। ऐसे भयंकर अवसाद के बीच हमने खुद को कुछ ऐसा सुप्त-सा बना लिया है कि हममें इन सबसे लड़ने-भिड़ने की अब शक्ति नहीं बची है। ऐसा लगता है कि हम अपनी जिंदगी और चल रहे संघर्षों से हार चुके हैं। न हमारे पास नया कुछ सुनाने को है, न रचने को। जी केवल इसीलिए रहे हैं कि हमें वक्त काटना है। तो क्या मान लिया जाए कि जिंदगी केवल वक्त काटने के लिए है, नया कुछ करने या बेहतर सोचने के लिए नहीं!

देखा गया है कि जिंदगी की मुश्किलों से हारे और हताश हुए लोगों के बीच निराशा की लकीरें कुछ ज्यादा ही गहरी हो जाती हैं। ‘अब सब कुछ खत्म’ की तर्ज पर वे बिना कुछ सोचे-समझे चल पड़ते हैं। माना कि मुश्किलें परेशान करती हैं, अथाह दुख देती हैं। कभी-कभी मन के भीतर इस कदर ऊब-सी भर देती हैं कि जीने की इच्छा तक समाप्त हुई-सी जान पड़ती है। यहीं से शुरुआत होती है हमारे अवसाद में घिरते चले जाने और खुशियों से दूर होते जाने की। जबकि मुश्किलों के साथ संघर्ष करते हुए भी हम अपनी बची-खुची खुशियों के दम पर खुद को खुश रख सकते हैं।

जिंदगी को संघर्ष और परेशानी के बावजूद थोड़ा सुकून दे सकते हैं। लेकिन हमारा नकारात्मक दृष्टिकोण हमें ऐसा करने से हर पल रोकता रहता है। चीजों को जहां पर सहज बनाया जाना चाहिए, वहां हम खुद ही तरह-तरह के मानसिक विरोधाभास पैदा करते रहते हैं। वैचारिकता को नष्ट कर अक्सर हम कुतर्कों में ढलने की कोशिश करते हैं। हम अपने ही धैर्य का दामन छोड़ शून्य में चले जाना चाहते हैं। शून्य को अपना हमसफर बना लेते हैं। उस वक्त हम भूल जाते हैं कि अंधेरे के बीच से ही उजाले की किरन भी निकलती है।

लगता है, खुशियां अब ईद के चांद सरीखी हो गई हैं हमारे लिए। जब चांद दिख जाता है, खुशी मिल जाती है। फिर उसके बाद मातम। दरअसल, यह सब अपने-अपने सोचने और समझने का ढंग है कि हम अपनी खुशियों, मुश्किलों और संघर्षों को किस तरह से जीते और झेलते हैं। कुछ की आदत होती है तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी खुशियों को यथावत रखने की और कुछ मुश्किलों के सामने ऐसे समर्पण कर देते हैं, मानो जिंदगी का अब कोई अर्थ ही न बचा हो! थोड़ी-बहुत मुश्किलों को भी पहाड़ मान कर परेशान हो जाते हैं। अगर मुश्किलों और संघर्षों के आगे हमारे क्रांतिकारियों ने हार मान ली होती तो शायद आज हम आजाद मुल्क की खुली हवा में सांस नहीं ले रहे होते। यह आजादी हमें कितनी मुश्किलों और संघर्षों के बाद हासिल हुई है, इसे ‘हारे हुए लोग’ क्या जानें! उन महान क्रांतिकारियों ने तो तमाम कठिनाइयों के बीच भी आजादी की उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था।

हम अपनी जिंदगी को जितना अधिक सीमित करते चले जाएंगे, हमसे जुड़ी चीजें भी उतनी ही सीमित होती चली जाएंगी। जिंदगी का हर एक पल हमारे लिए जरूरी है। वह हमें गहरे मायने देता है। जिंदगी में अगर अहसास नहीं तो फिर यह किस काम की! हमारी जिंदगी पर जितना हक मुश्किलों का है, उतना ही खुशियों का भी। अब यह निर्भर हम पर करता है कि हम किसे और कितना खुद पर हावी होने देते हैं। किससे कहां तक पार पाने या किसे कितना पास लाने में सफल होते हैं। मगर इन सबके लिए सकारात्मक दृष्टिकोण बेहद जरूरी है। जिंदगी में बिना सकारात्मकता के कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। यह बात हमें पक्के तौर पर अपने दिलो-दिमाग में रखनी चाहिए।

मुश्किलों और दुखों के साथ जिंदगी को बोझ मानने वालों से बस इतना कहना है कि वे न हारें, न अवसाद को ओढ़ें, बस हर स्थिति में खुशी-खुशी संघर्ष करते रहें। फिर नकारात्मकता का दर्द खुद ही उड़न-छू हो जाएगा। यह समय खुशियों से दूर भागने का नहीं, उन्हें कैसे भी अपने करीब बनाए रखने का है, ताकि हम जिंदगी के सफर का साथ यों ही निभाते चले जाएं। हर तरह की खुशियां जरूरी हैं। न भूलें कि छोटी-छोटी खुशियों को समेट कर ही बड़ी खुशियां बनती हैं। (अंशुमाली रस्तोगी)

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