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नाम की पढ़ाई

जब गांव याद आता है, तब बचपन और गांव-जवार के लोगों से मिले संस्कार भी याद आ जाते हैं। तब इस बात का अहसास बखूबी होता था कि पड़ोस में रहने वाले लोगों में कोई..

Author नई दिल्ली | October 30, 2015 1:50 AM
सच तो यह है कि सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा और शिक्षा के बाजारीकरण की जिम्मेदारी सरकार पर आती है।

जब गांव याद आता है, तब बचपन और गांव-जवार के लोगों से मिले संस्कार भी याद आ जाते हैं। तब इस बात का अहसास बखूबी होता था कि पड़ोस में रहने वाले लोगों में कोई हमारे दादा, चाचा, भैया हैं और कोई दादी, चाची, बुआ और जीजी। शहरों में तब आस-पड़ोस में रहने वाले लोगों के बीच ऐसा संबंध और संस्कार था या नहीं, मुझे नहीं मालूम। लेकिन आज जब मैं अपने आसपास के लोगों से उसी तरह के व्यवहार और मेलजोल की अपेक्षा करता हूं, तो वह नहीं मिलता और मैं दुखी हो जाता हूं। यही नहीं, जब मैं अपनी ओर से कुछ इस तरह के व्यवहार और संबोधन उनके बीच बांटना चाहता हूं तो उन्हें यह लेना जरूरी नहीं लगता। उलटा मुझे और मेरे संस्कारों को गया-गुजरा मान कर एकदम से नकार दिया जाता है और लोग यह साबित करने में लग जाते हैं कि ये गंवारों के संस्कार हैं और शहरों में चलने लायक नहीं हैं।

इसका एक उदाहरण अपने साथ हाल में घटी दो-तीन घटनाओं के आधार पर देता हूं। घटनाएं भी क्या, मुझे धमकाने, मारने, बेइज्जत करने जैसी ही हैं। एक दिन जब मैं स्कूल से घर के लिए निकल रहा था तो फाटक के बाहर बारहवीं कक्षा के अपेक्षया काफी बड़े डील-डौल वाले एक छात्र ने मेरी ओर अंगुली दिखा कर अपने दोस्तों से कहा- ‘तुम लोग देखना, मैं इसे जरूर मारूंगा!’ मजे की बात यह है कि उस भीड़ में मैंने उसे ऐसा कहते हुए खुद सुन लिया था। अब जब छात्रों को डांटने तक की इजाजत शिक्षकों को नहीं है, ऐसे में कोई शिक्षक क्या करे! मैंने इस बात की जानकारी प्रिंसिपल को दे दी। उन्होंने उसे अपने आॅफिस में बुला कर इस बाबत बहुत कुछ पूछा। छात्र ने बताया कि उसे न हिंदी विषय पसंद है, न हिंदी टीचर, क्योंकि इन्हें अंग्रेजी माध्यम के बच्चों को पढ़ाना नहीं आता। उसे मेरे बिहारी होने से भी चिढ़ थी। उसे लगता था कि बिहारियों को थोड़ी-सी भी अंग्रेजी नहीं आती। वे शब्दों का ठीक-ठीक उच्चारण तक नहीं कर पाते। पर खुद को महान टीचर कहवाने में लगे रहते हैं। ऊपर से जबर्दस्ती हिंदी पढ़ाने लगते हैं। न सोने देते हैं और न कक्षा में समाचार-पत्र ही पढ़ने देते हैं।

बहुत जल्दी ही इस बात की भनक स्कूल भर के बच्चों को लग गई। ऐसे में उनमें से कइयों का अचानक इस तरह आक्रामक हो उठना मेरे लिए विचित्र और चिंताजनक था। देखा-देखी में दसवीं का एक और छात्र भी पूरी क्लास के सामने मुझे कहने लगा- ‘मैं आपको मारूंगा सर। हिंदी का काम (होमवर्क) नहीं किया तो आपने हमको खड़ा क्यों करा दिया? आप कौन होते हैं खड़ा कराने वाले?’

मुझे फिर वही उपाय अपनाना पड़ा कि इसकी शिकायत प्रिंसिपल महोदय से करनी पड़ी। उन्हें फिर इस नकली अंग्रेज बच्चे के पिता को बुलाना पड़ा, फटकार लगानी पड़ी और अगले साल ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला न देने का डर दिखा कर अपनी शातिराना चालें चलने पर मजबूर होना पड़ा! लेकिन वह ज्यों का त्यों अड़ा और खड़ा रहा। यह तो उसका पिता था कि हाथ जोड़ लेने में ही अपनी और बेटे की भलाई समझी। बेटे की इसलिए कि उसे अगली कक्षा में दाखिला मिल जाएगा और अपनी इसलिए कि कम पैसों में काम बन जाएगा और दाखिले की भयानक पीड़ा से झटके में मुक्ति भी मिल जाएगी। घर पर मां-बाप ने उसे जरूर समझया-बुझाया होगा, क्योंकि ग्यारहवीं कक्षा में पहुंच कर वह इन दिनों एक सुधरा हुआ बालक जैसा कुछ बने रहने का स्वांग करता हुआ दिखता है।

एक और लड़के की बात है। वह स्कूल में जहां-तहां, जब-तब और जिस-तिस को गालियां देता फिरता है। अभिभावक-शिक्षक मीटिंग के दौरान मैंने उसकी मां से पूछा कि उनका लड़का अपने यार-दोस्तों को इतनी गालियां क्यों देता रहता है? क्या उसे आप लोगों ने सिखाया-समझाया नहीं! अपने बेटे को दूध का धुला मानने वाली उस मां ने मुझे खूब सुनाया और चलते-चलते यह भी कहती गर्इं कि शिक्षकों को लोगों से बात करने का सलीका नहीं आता।

ऐसे में फिर गांव और गांव के लोग बरबस याद आ जाते हैं जो हमें हमेशा समझाया करते थे- ‘ऐसा कुछ न करना और न कहना, जिससे मां-बाप और अपने गांव के नाम की बदनामी हो।’ लेकिन आज के बच्चों, उनके अभिभावकों, शिक्षा पद्धतियों, शिक्षकों, उनके व्यवहारों और शहरी माहौल में कितना बदलाव आ गया है कि सभी अपनी-अपनी कहने को तो बेसब्र हैं, पर किसी और की बात सुन भर लेने का धैर्य किसी में नहीं है। (सुरेश शॉ)

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