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सफर में स्त्री

सौम्या गुलिया यों मेरा घर राष्ट्रीय राजधानी से ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन मेरे घर और दिल्ली के बीच चलने वाली लोकल ट्रेन के तीन घंटे के सफर में सोच के स्तर पर सदियों का फासला नजर आता है। मैं पिछले छह सालों से दिल्ली से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जाने वाली लोकल ट्रेन […]

Author August 4, 2015 1:47 AM

सौम्या गुलिया

यों मेरा घर राष्ट्रीय राजधानी से ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन मेरे घर और दिल्ली के बीच चलने वाली लोकल ट्रेन के तीन घंटे के सफर में सोच के स्तर पर सदियों का फासला नजर आता है। मैं पिछले छह सालों से दिल्ली से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जाने वाली लोकल ट्रेन में सफर करती हूं। पुराना याराना है मेरा इससे। इन सालों में सैकड़ों किस्म के लोग मिले और जो मैं अपने क्षेत्र और लोगों के बारे में मोहल्ले की चौहद्दी में रह कर नहीं जान पाई, उससे ज्यादा इस ट्रेन की बदौलत जानने को मिला। लोगों के सोच के स्तर में आते बदलाव को महसूस किया, अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर जागरूक होते देखा। संचार क्रांति के दखल और उसके परिणामों को सुना-गुना तो देश की राजनीति पर ‘पुरुषों’ को बहसें करते देखा, प्यार और सौहार्द के बहुतेरे रंग देखे।

दंगों के कुछ ही दिनों बाद एक अकेली मुसलिम महिला के उसके परिचितों से बिछड़ जाने के बाद एक हिंदू महिला को उसके लिए न सिर्फ चिंतित होते, बल्कि पूरी ट्रेन में उसके परिचितों को जी-जान लगा कर ढूंढ़ते देखा। एक बूढ़े बाबा को मुंहजबानी देश के सांस्कृतिक इतिहास को कहते नहीं, बल्कि गाते सुना। लेकिन कुछ जो देखने और सुनने की ख्वाहिश रही तो महिलाओं और उनके प्रति सोच में तब्दीली। हालांकि जैसे मेरे पिताजी बदले, मां बदली, वैसे ही और भी कुछेक लोग जरूर बदले होंगे। पर यह बदलाव ऐसा रहा, जिसे मेरी आंखें नहीं देख पार्इं। जिन बातों पर घर-गांव में बवाल हो जाते हैं, उन बातों को मैंने अपनी इस दुनिया में खुद औरतों को कहते, सुनते और सहमत होते हुए देखा। न जाने कितनी और किस स्तर की स्त्री-विरोधी बातें, जिन्हें दोहराना नहीं चाहूंगी मैं। उन बातों को वे ऐसे कह जाती हैं जैसे अटल सत्य, जैसे नैतिकता के पाठ की प्रमुख बातें।

तब मुझे याद आती है मार्क्स की वर्ग चेतना, जो कोसों तक कही नहीं है इनके भीतर और न शायद आने वाले बरसों में जल्दी दिखने वाली है। इनका समर्थन उसी स्त्री के साथ है जो अपने शरीर को पुरुष की बपौती मानती है, अपनी माहवारी के रक्त को किसी घृणित वस्तु की तरह छिपाती है। वह सिर्फ बेटी, बहन, पत्नी और मां बनने के लिए जन्म लेती है, पुरुष के हर कुकृत्य को न्यायसंगत ठहराने के लिए किसी दूसरी स्त्री को ही दोषी ठहराने में गर्व महसूस करती है। वह अपने गर्भ से जन्मी बेटी को अपने सामने ही काट कर जमीन में दफन कर देने देती है, सिर्फ इसलिए कि वह यौवनावस्था की अपनी स्वाभाविक भावनाओं के साथ बह जाने की जिद कर बैठी थी।

इनकी बातें भीतर तक झिंझोड़ जाती हैं मुझे। फिर भी मैं इनकी बातों को ठीक वैसे ही सुनती हूं, जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के सेमिनार में किसी स्त्रीवादी वक्ता को। मुझे इन पर गुस्सा नहीं आता और न चिढ़ होती है इनके यों कहने और सोचने से। मैं समझ नहीं पाती कि इनकी इसी दुनिया का हिस्सा होने के बावजूद मैं इनसे अलहदा होने पर खुद को सौभाग्यशाली समझूं या नहीं! मैं कुछ सोच पाती हूं तो सिर्फ उस खाई की दिनोंदिन बढ़ती गहराई के बारे में जो जाने-अनजाने हम स्त्रियों के बीच बन गई है या फिर यह कि स्त्री विमर्श में हर दिन जुड़ते प्रगतिशील अध्यायों के नशे में मदहोश हम शहराती बन चुकी स्त्रियां अपनी इन साथिनों को बहुत पीछे छोड़ आई हैं।

यही सच है कि किसी जाति या वर्ग विशेष के हकों के लिए लड़े गए आंदोलनों का सुख वही लोग भोग पाते हैं, जिनके हाथों में उनकी बागडोर रहती है। जबकि इन विमर्शों और आंदोलनों की सार्थकता का पैमाना उनकी जीवन-स्थिति में आने वाले परिवर्तनों से होना चाहिए जो पंक्ति में गिरता-संभालता, छिपता-छिपाता पीछे कहीं खड़ा है।

खैर, मैं हर बार ट्रेन से उतर आती हूं, लेकिन वे साथिनें नहीं उतरतीं मेरे दिलोदिमाग से। वे सभी स्त्रीवादी वक्तव्य जो भी आज तक सुने, शोषित होते हुए भी शोषण जैसे शब्द से बेखबर इन स्त्रियों की बातें सब एक साथ गड्डमड्ड होकर मेरे अंदर उठा-पटक करती हैं। मैं लोकल ट्रेन से मेट्रो में घुसती हूं तो मुझे तीन घंटों का फासला तीन सदियों-सा लगता है। यहां पसीना पोंछती, खुद से ही पराई हो चुकी वे मेरी साथिनें नहीं है। यहां हैं तो करीने से संवरी, आत्मनिर्भर, खुद से इत्तिफाक रखने वाली स्त्रियां। मैं मेट्रो के दरवाजे से समांतर चलती लोकल ट्रेन को देखती हूं, जब तक कि वे मेरी आंखों से ओझल नहीं हो जातीं और शुक्रिया करती हूं उस लोकल ट्रेन का जो मुझे मेरे घर तो ले ही जाती है, यह भी याद दिलाती है कि अभी हमें एक लंबा और मुश्किल सफर तय करना है… मिल कर!

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