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अनचीन्ही प्रतिभाएं

वीणा शर्मा असगर पच्चीस-तीस साल का युवक है। उसकी छवि दरवेश जैसी लगती है, पर वह मजदूर है। इमारतों में सफेदी का काम करता है। कपड़ों पर सफेदी के छींटे हैं। फुरसत के क्षणों में वह डूब कर गाने लगा है। गले में तासीर तो है ही, गाने के प्रति तन्मयता भी लाजवाब है। जो […]

वीणा शर्मा

असगर पच्चीस-तीस साल का युवक है। उसकी छवि दरवेश जैसी लगती है, पर वह मजदूर है। इमारतों में सफेदी का काम करता है। कपड़ों पर सफेदी के छींटे हैं। फुरसत के क्षणों में वह डूब कर गाने लगा है। गले में तासीर तो है ही, गाने के प्रति तन्मयता भी लाजवाब है। जो गजल गा रहा है वह दर्द से सराबोर है। लय ऐसी सधी हुई कि लगता है कोई परिपक्व गायक गा रहा है। चेहरे पर अजीब-सा सुकून है, जो इस तरह की मजदूरी करने वालों के पास विरल ही होता है।

सुनने वाला हर व्यक्ति उसकी आवाज की तारीफ कर रहा है। इसमें हैरानी की बात नहीं कि बिना संगीत की शिक्षा पाए कोई इतना बढ़िया गा सकता है। संगीत निरंतर अभ्यास से ही आता है। गाने की तड़प ही आवाज में वह जुंबिश पैदा करती है कि सुनने वाले खुद खिंचे आते हैं। निस्संदेह शब्दों का भी अपना जादू होता है, जो संगीत के सिर चढ़ कर बोलता है।

जो गजल वह गा रहा है, उसे जिस भी गायक ने किसी महफिल में या जहां भी गाया होगा खूब वाहवाही लूटी होगी। उसी गहराई से वह गा रहा है। कोई बाजा साथ नहींं, सुनने वालों का कोई व्यवस्थित समूह नहींं। बस है तो साथ की दीवार को बेरहमी से खुरचे जाने का कर्कश स्वर। उस दूसरे मजदूर को उसकी गजल के शब्दों, सुर या आवाज के सुरीलेपन से कोई लेना-देना नहीं है। वह लगातार दीवार खुरचता जा रहा है। मैं सोचती हूं ऐसी कर्कश ध्वनियां शायद उसकी साथी रही होंगी, जिनका वह अभ्यस्त हो चुका है। जो शोर में भी दर्द से भरी आवाज में गा लेने का हौसला रखता है, उसमें गाने के जुनून का अनुमान लगाया जा सकता है।

असगर अपनी प्रशंसा पर हल्के से मुस्करा भर देता है। वह बहुत कम बोलता है। अपने बारे में पूछे जाने पर वह मानो कहीं खो-सा गया। जैसे अतीत में बहुत कुछ ऐसा बिखरा पड़ा हो, जिसे तुरत-फुरत बताना संभव नहीं। उसने बताया कि वह राजस्थान के जोधपुर के किसी गांव से भाग कर आया था। तब वह तेरह-चौदह साल का था। पिता ने मां के मरने के बाद दूसरी शादी कर ली थी। सौतेली मां बहुत जालिम थी। उसकी दो छोटी बहनें और एक भाई था। वह घर में सबसे बड़ा था।

पिता और सौतेली मां के अत्याचारों से दुखी होकर एक बार जो वह घर से भागा तो वापस नहीं गया। न ही घर वालों ने उसकी कोई खोज-खबर ली। हालांकि उसे अपने दादा से खूब प्यार मिलता था, लेकिन दादा खुद उसके पिता पर आश्रित थे। पहले उसके दादा कव्वाल मंडली में ढोलक बजाते थे, सुरीले भी थे। दादा की संगत में ही उसने कब गाना शुरू कर दिया, उसे खुद नहीं पता। एक दिन दादा भी चल बसे और वह शहर-शहर भटकते यहां आ गया। लेकिन शहर आते ही पेट की भूख ने उसका संगीत छीन लिया। गाना उसे अच्छा लगता है। बहुत गहरे दर्द के क्षणों में वह गाता है।

असगर ने मुझे अंजू की याद दिला दी। छह महीने पहले आनंद विहार की बस में हारमोनियम लेकर गाने वाली अंजू, जिसे अगर संगीत की सही तालीम मिलती तो अपनी लोकगायकी से खूब नाम कमा सकती थी, लेकिन सही जानकारी और सुविधाओं का अभाव ऐसी कई प्रतिभाओं को पछाड़ चुका है। मेरे मन में कई सवाल हैं। टेलीविजन चैनलों पर सैकड़ों प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं, पर वे सच्चाई से कोसों दूर हैं। आज बाजार ने आम आदमी को जिस जगह लाकर खड़ा कर दिया है, वहां एक-दूसरे से आगे निकलने की एक अंधी दौड़ लगी हुई है। आज सफलता का मापदंड केवल योग्यता नहीं रह गया है।

हर रोज देश के विभिन्न प्रांतों से गरीबी के मारे हजारों बच्चे महानगरों में आते हैं। मगर महानगर में पहुंचते ही उन्हें अहसास होता है कि वे किसी विशालकाय अजगर के मुंह में प्रवेश कर चुके हैं, जिससे निकलना संभव नहीं। सर्वेक्षण बताते हैं कि हर रोज सैंकड़ों बच्चे गायब हो जाते हैं, जिनका कहीं कोई सुराग नहीं मिलता। मेट्रो स्टेशन के बाहर हाथ-पैरों पर पट्िटयां बांधे, लोगों के आगे हाथ पसारे या पूजा की थाली लिए दौड़ते या चौराहों पर भीख मांगते बच्चों में कौन-से गुण छिपे हैं, यह कौन जानने की कोशिश करता है। अवसर के अभाव में ये प्रतिभाएं या तो अपराधी बनती हैं या नशेड़ियों की कतार में शामिल होती हैं। यह दरअसल कानूनों से अधिक समाज को चेताने का मुद्दा है। होटलों में काम करने वाला छोटू या अन्य उद्योगों में लगे बच्चों को जब रोटी और छत जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हो जाएंगी तो वे शिक्षा की तरफ भी अग्रसर होंगे और इन्हीं में एक से एक प्रतिभाएं उभर कर आएंगी।

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