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दुनव के किनारे

सीरज सक्सेना मास्को से बेलग्रेड तक सफर सिर्फ दो घंटे का ही रहा, पर अधिक लंबा लगा। गंतव्य तक पहुंचने के ठीक पहले शायद ऐसा होता है। सिरेमिक कलाकार मित्र यास्मीन बेलग्रेड हवाई अड्डे पर मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं। यहां से नोवी साद हम करीब एक घंटे में पहुंचे। टैक्सी चालक ने नेपाल में […]

Author June 8, 2015 3:48 PM

सीरज सक्सेना

मास्को से बेलग्रेड तक सफर सिर्फ दो घंटे का ही रहा, पर अधिक लंबा लगा। गंतव्य तक पहुंचने के ठीक पहले शायद ऐसा होता है। सिरेमिक कलाकार मित्र यास्मीन बेलग्रेड हवाई अड्डे पर मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं। यहां से नोवी साद हम करीब एक घंटे में पहुंचे। टैक्सी चालक ने नेपाल में आए भूकम्प की दुखद खबर दी। नोवी साद शहर डेन्यूब नदी के किनारे बसा है। सर्बियन भाषा में इस नदी को दुनव कहते हैं। इसका उद्गम जर्मनी में है और ऑस्ट्रिया, क्रोएशिया, सर्बिया, रोमानिया होती हुई यह बुल्गेरिया के काले समंदर में जा मिलती है। नोवी साद इस नदी पर बने तीन सेतु से पार करता है। सन 2000 में नाटो सेना ने इन पुलों को नष्ट किया था। पूरा शहर उस वक्त थम गया था।

नदी का किनारा सुंदर और स्वच्छ है। साइकिल से इस नदी की सैर करने पहुंचा। दोपहर के दो बजे नदी के तट पर कुछ युवक-युवती स्केटिंग कर रहे थे। कुछ साइकिल चला रहे थे तो कुछ दौड़ रहे थे। साइकिल, पैदल चलने और दौड़ने के लिए यहां अलग पथ बने हुए हैं। जगह-जगह बैठने के लिए बेंच भी हैं। ऊपर खुला आकाश, सूरज की चमकीली रोशनी के साथ शांत और स्वच्छ बहता पानी। नदी के किनारे अपना कांटा डाले कुछ बुजुर्ग पुरुष मछली के फंसने का इंतजार कर रहे थे। सिर्फ प्रेम में ही नहीं, मछली के इंतजार में भी समय विराट और विशाल होता है।
बच्चों के लिए तरह-तरह के झूले-चकरी आदि यहां हैं। नदी के दूसरे किनारे पर एक विशाल महल है। उसकी बनावट से उसकी उम्र का अंदाजा लगाना आसान है। इस पुराने महल की अपनी एक पुरानी बस्ती भी है। झोपड़ीनुमा हर घर की छत सुंदर फूलदार कवेलू या खपरैल से पटी है। कई छतों को एक साथ उनकी छोटी-बड़ी चिमनियों के साथ देखना एक रोचक अनुभव है। इन छतों पर बीते समय का ठहराव आज भी महसूस किया जा सकता है।

नदी गहरी है। कुछ बड़ी नौकाएं पानी में खड़ी हिचकोले ले रही थीं। एक नौका पर रेस्तरां था। कुछ लोग किनारे पर नहा रहे थे, कुछ अपने एकांत में डूबे तो कुछ मोबाइल फोन पर झुके थे। नोवी साद सर्बिया का दूसरा बड़ा और प्रमुख शहर है। खैर, यास्मीन के सिरेमिक स्टूडियो पहुंचा। अपनी एक छात्रा को वे चीनी मिट्टी की कला के कुछ तकनीकी गुर सिखा रही थीं। यास्मीन भारत सहित कई देशों की कला यात्रा कर चुकी हैं।

छोटी-बड़ी सड़कें, गलियां, ऊंची इमारतें यूरोपीय वास्तु कला के इस सिटी स्केप में विचरना जैसे किसी तस्वीर में साक्षात भ्रमण करना हो। हर छोटी-बड़ी सड़क के किनारे छोटे-बड़े रेस्तरां हैं। साबुन की झाग के बड़े-बड़े गुब्बारे बनाता एक पुरुष बच्चों को लुभा रहा था। उसे खड़े होकर देखा। मेरे भीतर का बचपन उसके इस करतब से प्रफुल्लित हुआ। इसके बाद हम सर्बिया के सबसे बड़े पुस्तकालय के सामने थे। मातित्सा सरप्स्का अठारहवीं सदी की यह इमारत आधुनिक सर्बिया की एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक पहचान है। साहित्य, कला, संगीत, नाटक, विज्ञान, प्रकृति से संबंधित शोध आदि बौद्धिक योजनाएं यहां बनती हैं और उन पर काम होता है। इस पुस्तकालय में पैंतीस लाख किताबें हैं। ऑर्थोडॉक्स गिरजाघर के गर्भगृह में प्रवेश किया। ईसा मसीह के कई विशाल और लघु चित्रों में उनके जीवन की कई कहानियां यहां व्यक्त थीं। गिरजाघर के भीतर चाट पर भी महीन चित्रकारी मन को लुभाने वाली है।

मुझे लग रहा है कि यह चित्रों को पूजने का कोई पुण्य स्थल है, जहां चित्रों की स्तुति हर जगह बिखरी है। गिरजाघर में चित्रों के आगे झुके स्त्री-पुरुष चुप हैं। यहां का वातावरण स्वच्छ है और माहौल में मौन का विस्तार है। स्वच्छता देखते ही बनती है। यास्मीन अपने हाथों में कुछ पतली मोमबत्तियां लेकर आती हैं। पूरा कमरा मोमबत्ती के प्रकाश से जगमगा रहा है और कमरे की छत अग्नि की तपिश से काली है। गिरजाघर से बाहर आकर हम कुछ देर चुप रहे, जैसे हमें अपनी प्रार्थना से लौटने में समय लग रहा हो। यास्मीन बताती हैं कि अभी सर्बिया की आर्थिक स्थिति कमजोर है। कलाकारों के लिए अपनी कला रचना के साथ रहना बहुत कठिन है। कलाकारों को मजबूरी में कुछ अन्य काम करने पड़ रहे हैं। यह कलाकारों के लिए चुनौती भरा समय है। अपने चालीस दिन के प्रवास में दो एकल प्रदर्शनी के साथ सर्बिया यात्रा का यह अनुभव मेरे लिए बतौर कलाकार महत्त्वपूर्ण रहेगा।

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