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दुनिया मेरे आगे: बदलाव की रफ्तार

अमूमन मैं ही दादी के साथ मंदिर जाता था। तंग गलियों, खुली नालियों, कूड़े वाले रास्तों के बीच से। एक दिन मैंने दादी से पूछा कि आप तो सुबह घर साफ करने लग जाती हैं और गलियों में कितनी गंदगी है! एक बताशा और पांच पैसे का सिक्का हाथ में रख कर बोलीं- ‘मैं अपने घर से दरिद्रता भगाती हूं।’

Author December 8, 2018 5:55 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

विक्रम जीत

दादी सुबह-सुबह तीलियों वाले झाड़ू से आंगन साफ करना शुरू कर देती थीं। सांय-सांय की आवाज, मतलब सुबह हो गई है। जिस बहु का बच्चा सुबह नहा-धोकर दादी के साथ मंदिर जाने को तैयार नहीं, वह बहु दादी की नजरों में संयुक्त परिवार की कसौटी पर कमतर थी। मेरी मां उम्र में छोटी थी, पर रिश्ते में उन्हें सब बड़ी भाभी कहते थे। दरअसल, पिता की शादी देर से हुई थी। मां दादी से भी पहले उठ कर मुझे ठंडे पानी से नहला कर, तेल लगा कर और कंघी कर कमरे से बाहर खड़ा कर देती थीं। अमूमन मैं ही दादी के साथ मंदिर जाता था। तंग गलियों, खुली नालियों, कूड़े वाले रास्तों के बीच से। एक दिन मैंने दादी से पूछा कि आप तो सुबह घर साफ करने लग जाती हैं और गलियों में कितनी गंदगी है! एक बताशा और पांच पैसे का सिक्का हाथ में रख कर बोलीं- ‘मैं अपने घर से दरिद्रता भगाती हूं।’ पांच पैसों की लाल इमली की चटनी पुराने अखबार पर से चाटी, मुंह लाल किया और घर पहुंच कर मां से मार खाई। मैं उन बच्चों में से था, जिन्हें तौलिया और पचास पैसे देकर बर्फ लेने भेजा जाता था। बर्फ लेकर वापसी पर बंदर मामा की सगाई का मदारी खेल देख कर बाकी सब भूल जाता था। तौलिये में लिपटी बर्फ, घर पर इंतजार करते लोग, मां की फटकार। पर दादी की कही बात आज तक न भूल सका- ‘मैं अपने घर से दरिद्रता भगाती हूं।’

हमारा देश दरिद्र है, ऐसा हम पढ़ते-देखते-सुनते हैं। गरीबी रेखा ऊपर-नीचे हो न हो, पर हरेक नागरिक के पास अपने स्मार्ट फोन पर आंकड़े हैं कि हम कितने निर्धन हैं… कौन-कौन से प्रदेश में कितने गरीब लोग हैं और दुनिया के अमीरों में भी हमारे कितने लोग सुशोभित हैं। पर राजा और रंक के बीच पाट चौड़ी है, स्वच्छ होती संगम वाली गंगा की तरह। अगर एक तरफ चमकदार चार लाख स्क्वॉयर फुट, सत्ताईस मंजिली बेहतरीन इमारत एंटीलिया में सिर्फ एक परिवार रहता है, तो ठीक उसके सामने एक कमरे में अलग-अलग प्रदेश से आए कितने लोग परिवार की तरह रहते हैं, इसकी गिनती नहीं है। बिना वैमनस्य।
‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां’ का भारत आज ‘जरा हट के, जरा डट के’ जीए चला जा रहा है। घर छोटा हो या बड़ा, अपने-अपने आंगन से दरिद्रता भगाता चला जा रहा है। यह बात अलग है कि हम लोग दरिद्रता बाहर चलती सड़क तक ही भगाते हैं, क्योंकि सड़क न मेरी है, न आपकी। वह सरकार की है। सरकार पहले हुआ करती थी। लोग डरते थे। कूड़ा तो दूर, बात भी ध्यान से की जाती थी। कानूनों का पालन सख्ती से होता था। ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा था, सड़कें छोटी थीं, दिल बड़े थे। स्कूल थोड़े थे, दरिद्र नारायण थे, लेकिन गांव हरे थे। रफ्तार की ऐसी नजर लगी कि लोग होड़ में दौड़ने लगे।

लोग सबसे बड़ा रुपया, बाप हो या भइया के धुनि होकर आंख खोल सो गए। रंगीन शहरों की चमचम गांव पहुंच गई, रामलखन चाय-मठरी छोड़, अपनी पुश्तैनी जमीन बेच, नमकीन पेप्सी की लहर में अमीर हो गए। गुड़िया रानी अब बिल्लो रानी हो गई। शादी, नौकरी, प्रॉपर्टी और बाकी सब कुछ ‘डॉट कॉम’ हो गए। भारत खुल गया, पेड़ कट गए, पानी बिकने लगा, फिर कम हो गया। सांस फूलने लगी, हवा में आॅक्सीजन की मात्रा कम हो गई। लोग जहां बूढ़ा होकर भी नहीं मरते थे, वहां जवानी में ही बिस्तर पकड़ने लग गए। निजी अस्पताल खुल गए, योगगुरु अब डॉक्टर बन गए।

जो लोग उपलब्धि गिनवाते थे, वे बीमारी गिनवाने लगे। दवा विक्रेता धनवान हो गए। शाम ढले शहर काले धुएं से ग्रस्त हो गए। लोगों में चल रहे हजारों साल के विश्वास के मापदंड ध्वस्त हो गए। जमीन के भाव आसमान छूने लगे। किसान सड़क पर आ गया, बिल्डर ने खेत खरीद लिया। पशुओं से ज्यादा दूध हो गया और केले मशीनों में तैयार होने लगे। नेहरू जैकट और गांधी टोपी नाचने लगे। बताया जाने लगा कि भारत नंबर एक देश होने जा रहा है। सोने की चिड़िया बनने जा रहा है। ऐसा ब्रिटेन के ‘मूडी’ के आकलन ने बताया। ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए’ वाले ‘कल क्या होगा, किसको पता, अभी जिंदगी का ले लो मजा’ के मानस में जीने लगे।

इसी सबके बीच एक दिन हरिद्वार जाते हुए मैं सहारनपुर रुक गया। लोगों से खचाखच भरा बाजार। चौड़ी सड़क। खादी आश्रम, रिक्शा, तांगा, कार, बस, पैदल- सबके सब एक धुन में। पीछे नई ऊंची इमारतों के बीच से दादी वाले मंदिर के ध्वज हवा का रुख बता रहे थे। संयुक्त परिवार कब के छिन्न-भिन्न हो गए थे। हमलोग बरसों पहले चंडीगढ़ आ गए थे। कुछ दिल्ली पहुंच गए। कुछ को शराब लील गई। हां, सुबह-सुबह घर से दरिद्रता भगाने की दादी वाली परंपरा न केवल कायम है, बल्कि उसमें इजाफा हो गया है। मां बीस साल पहले चल बसी थीं। वे सिखा गई थीं कि नहाते वक्त हरि नाम लेने से मन की दरिद्रता भागती है। और जिसका मन चंगा, उसके घर में गंगा!

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