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दुनिया मेरे आगे: सर्दी में बेघर

ये बेखौफ और निर्भीक निर्धन लोग ठंड का पूरे जोर-शोर से मुकाबला करते हैं, लेकिन प्रकृति के निर्दय तांडव के आगे इनके हौसले मात खा जाते हैं। नतीजतन, एक समय हाड़ कंपा देने वाली ठंड कुछ वक्त के बाद इनके हाड़ से प्राण लेकर ही दम लेती है। भीषण ठंड की भेंट चढ़ने वाले ये लोग किसी तरह केवल खबर बन कर रह जाते हैं।

Author December 13, 2018 5:36 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

देवेंद्रराज सुथार

‘कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए, कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए…!’ दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां देश की वर्तमान स्थिति पर सटीक बैठती हैं। दिसंबर का महीना आते ही देश में ठंड अपने तेवर दिखाने लग जाती है। तापमान की गिरावट के साथ ही धीरे-धीरे दिन छोटा व रातें बड़ी होने लगती हैं। कई शहरों में तापमान शून्य के नीचे चला जाता है, तो कई शहरों में पछुआ पवन अपनी गति तेज कर कहर बरपाने लगती है। वहीं देश में हिमालयी और जम्मू-कश्मीर जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी शुरू होने के कारण देशी-विदेशी सैलानियों की संख्या बढ़ने लगती है। एक ओर ठंड बहुतों के लिए खुशी और आनंद की सौगात लेकर आती है, तो दूसरी ओर यह बेघरों के लिए मौत के चेहरे के रूप में नजर आने लगती है। इसकी कल्पना हम फुटपाथ, पार्कों और खुले आकाश के नीचे जीवन बसर करने वाले उन निर्धन असहाय लोगों की दयनीय दशा को देख कर ही कर सकते हैं। दरअसल, जीवन के सफर के लिए ये लोग कितने मोहताज हैं, इसका पता इनके अर्धनग्न बदन पर ओढ़े हुए फटे और मैले कंबल से लगाया जा सकता है। जैसे-जैसे ठंड का प्रकोप बढ़ने लगता है, इनकी परेशानियां विकराल रूप धारण करने लगती हैं।

ये बेखौफ और निर्भीक निर्धन लोग ठंड का पूरे जोर-शोर से मुकाबला करते हैं, लेकिन प्रकृति के निर्दय तांडव के आगे इनके हौसले मात खा जाते हैं। नतीजतन, एक समय हाड़ कंपा देने वाली ठंड कुछ वक्त के बाद इनके हाड़ से प्राण लेकर ही दम लेती है। भीषण ठंड की भेंट चढ़ने वाले ये लोग किसी तरह केवल खबर बन कर रह जाते हैं। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी सियासी पार्टी के नेता ने इन लोगों के जीवन के लिए बुनियादी आवश्यकताओं की मांग के पक्ष में आवाज बुलंद की हो। वरना क्या कारण है कि ठंड के सितम के आगे मरने वाले इन लोगों की संख्या में हर अगले साल इजाफा हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, देश में सालाना लगभग आठ सौ लोगों की मौत ठंड के कारण हो जाती है। पिछले चौदह वर्षों में लगभग दस हजार से भी अधिक लोगों की जान ठंड ने ली है। इनमें पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी अधिक है। कारण साफ है कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को रोजी-रोटी की तलाश में अधिक विस्थापित होना पड़ता है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, देश में सर्वाधिक ठंड प्रभावित राज्य वे हैं जहां बेघरों की संख्या सर्वाधिक है। इनमें उत्तर प्रदेश प्रथम पायदान पर है, क्योंकि यह देश में सबसे अधिक बेघरों की संख्या वाले राज्यों में भी यह अव्वल है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात में भी स्थिति बहुत चिंताजनक है। हमारे देश में बेघरों की कुल संख्या भूटान की और फिजी की जनसंख्या से लगभग दोगुनी है। यह सही है कि देश में कुछ सरकारी योजनाओं के तहत चलने वाले कार्यक्रमों के बाद बेघरों की संख्या में कमी आई है, लेकिन अब भी पूरी तरह से स्थिति बदली नहीं है। अगर इस दुर्दिन वाली स्थिति का समग्र रूप से कायाकल्प हुआ होता तो आज कोई क्यों ठंड में ठिठुर कर फुटपाथों, मैदानों या पार्कों में अपने प्राण गंवाने को मजबूर हो रहा होता?

अफसोस की बात तो यह है कि ठंड को प्राकृतिक आपदा सूची में शामिल किए जाने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रति वर्ष शीत लहर के दिनों में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लापरवाही बरती जाती है। सरकार शहरी क्षेत्रों में दस-बारह रैन बसेरों का निर्माण करने को ठंड में बचाव का इंतजाम करना कहती है। लेकिन सर्द रातों में सड़कों पर निकल कर देखा जा सकता है कि कितने लोगों को रैन बसेरों में शरण मिल पाती है और कितने खुले आसमान में किसी तरह रात काटते हैं। जरूरत है कि सरकार ठंड से ठिठुरते और मरते लोगों के प्रति संवेदनशील रवैया अपना कर अपनी जवाबदेही तय करे। देश में जब तक बेघरों के लिए आवास नहीं बन जाते, तब तक उनके लिए आश्रय स्थलों का प्रबंधन करे।

यह तभी मुमकिन हो सकता है जब मोटी रजाई में भी ठंड के प्रकोप से कांप रहे हमारे सियासतदान खुले में बिना रजाई के सो रहे लोगों के प्रति संवेदना प्रकट करें और कुछ ठोस कदम उठाएं। सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सबकी भी जिम्मेदारी बनती है कि ठंड से ठिठुरते लोगों की हरसंभव सहायता प्रदान करें। इसके लिए ‘नेकी की दीवार’ कार्यक्रम काफी हद तक मददगार साबित हुआ और हो सकता है। ठंड के दिनों में अगर देश में जगह-जगह पर ‘नेकी की दीवार’ खड़ी कर हर कोई अपनी ओर से नए के अलावा सही हालत में पुराने ऊनी वस्त्र, स्वेटर, मफलर, कंबल आदि का स्वैच्छिक दान करे तो सर्दी में ठिठुरते जरूरतमंद लोगों की बड़ी मदद हो सकती है।

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