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दुनिया मेरे आगे: कठपुतली बनते हम

विडंबना है कि न चाहते हुए भी हम अक्सर कठपुतली बन जाते हैं या बना दिए जाते हैं। निश्चित ही इसका कारण हममें विवेकशीलता की कमी, व्यावहारिक समझ का अभाव, पर्याप्त साहस के बजाय अनजाने जोखिम का डर या फिर जल्दी से जल्दी सुविधा प्राप्त करने और अपने काम को शीघ्रता से अंजाम देने की हड़बड़ी भी हो सकता है।

Author December 6, 2018 6:00 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

एकता कानूनगो बक्षी

कठपुतलियों का खेल हमारे देश ही नहीं, पूरी दुनिया में सदियों से चला आ रहा है और आज भी खासा लोकप्रिय है। बच्चों के साथ साथ बड़े भी इसका लुत्फ उठाते हैं। किस्से-कहानियों से लेकर तात्कालिक वातावरण और दर्शकों की रुचि को ध्यान में रख कर कलाकार नए खेल और कठपुतलियों के स्वांग रचता है। यह सब देखने में तो बहुत सहज, सरल लगता है, लेकिन इस प्रदर्शन में सफल वही कलाकार हो पाता है जो काफी शोध, सोच-विचार करके खेल या नाटक की कथा बनाता है और देशकाल के साथ मौजूदा परिस्थिति के अनुकूल अपनी कठपुतलियों की साज-सज्जा और शृंगार करके नए स्वरूप में सबके सामने प्रस्तुत करता है।

कठपुतलियों की बात होते ही सबका ध्यान उन पुतलियों की ओर जाता है जो काठ यानी लकड़ी की बनी होती हैं। साज-सज्जा और शृंगार के बाद वे लगभग हम मनुष्यों की ही तरह नजर आने लगती है, जबकि उसे संचालित करने वाला कोई और व्यक्ति होता है। कठपुतली मस्तिष्क-विहीन होती है, उसके पास बुद्धि नहीं होती। यही सबसे बड़ा अंतर होता है हममें और कठपुतली में। लेकिन विडंबना है कि न चाहते हुए भी हम अक्सर कठपुतली बन जाते हैं या बना दिए जाते हैं। निश्चित ही इसका कारण हममें विवेकशीलता की कमी, व्यावहारिक समझ का अभाव, पर्याप्त साहस के बजाय अनजाने जोखिम का डर या फिर जल्दी से जल्दी सुविधा प्राप्त करने और अपने काम को शीघ्रता से अंजाम देने की हड़बड़ी भी हो सकता है।

कई परिस्थितियों में हमारा आचरण भी काफी हद तक कठपुतली के समान हो जाता है। मसलन, पहले हमारे हाथों में स्टील, पीतल, मिट्टी के बर्तन, रोटी को लपेटने के लिए मलमल का कपड़ा, हमारे क्षेत्र में उत्पादित स्थानीय फल और सब्जियां, अनाज, दालें, घी, तेल, ऐसी सामग्री जो हमें सुलभ तरीके से प्राप्त हो जाती थी और जिनके प्रयोग से हम स्वस्थ भी रहते थे। फिर अचानक किसी कलाकार ने दृश्य बदल दिया और हमारे हाथ में प्लास्टिक, नॉनस्टिक, एल्युमीनियम फॉयल, एयर फ्रायर नए तरह के अनाज, एक्सॉटिक सब्जियों और फलों ने ले ली। घी का सेवन हानिकारक हो गया और खाद्य तेलों के विभिन्न ब्रांडों की बोतलों के साथ हम किचेन के सेट वाले मंच पर कठपुतलियों की तरह किसी और के इशारों पर डोलने लगे।

लंबे समय तक यही दृश्य चलता रहा और अचानक किसी स्वास्थ्य रक्षा की चेतावनी वाले विज्ञापन में पुरानी परंपराओं को अपनाने के लिए फिर नया स्क्रिप्ट लिख दिया गया। मिट्टी सहित पुराने बर्तनों, प्राकृतिक और आॅर्गेनिक सामग्री के उपयोग के संदेश वाली कहानियों पर मानवीय पुतलियां नृत्य करने लगीं, जो एंटिक की तरह महंगा सौदा बन गया।

पहले हम नीम की डाली से दातुन करते थे और नमक-सरसों का उपयोग भी दांत की सफाई के लिए करते थे। फिर पाउडर से अपने दांत मांजने लगे। उसके बाद टूथपेस्ट आया, नए रंगों और स्वाद में। उसमें लौंग और नमक भी डाला गया और हम कठपुतलियां बहुत खुश होती गर्इं। इन दिनों नीम का दातुन भी आॅनलाइन मिलने लगा है। यह अलग बात है कि एक नीम का पेड़ अभी भी सड़क किनारे खड़ा मुस्कराता रहता है। सौंदर्य प्रसाधन के क्षेत्र में तो और भी भोलेपन के साथ हम इस खेल में शामिल होते गए हैं।

पुराने जमाने के आसान नुस्खों के बरक्स नए जमाने के महंगे कॉस्मेटिक्स को अपना कर हम क्या मात्र वैसी कठपुतली नहीं हो गए हैं, जिनकी डोर किन्हीं चतुर उत्पादकों और व्यापारियों की हाथों में है? जबकि यह खेल भी स्थायी नहीं होता। क्षणिक दृश्य उपस्थित होता है। थोड़े समय में ही कॉस्मेटिक्स का विपरीत असर जब दिखने लगता है तो बाजार में इन्हें ठीक करने के नए उत्पाद आ जाते हैं। फिर भी बात नहीं बनती तो विज्ञापन की तस्वीरों में ‘फिल्टर्स ऐप’ काम करने लगते हैं, जो आपके चेहरे की कमियों को छिपाने का दावा करते हैं। इसके बाद अगला दृश्य आता है, जिसमें आपके हाथों में एक ट्यूब होती है। उसमें वही उबटन मौजूद होता है जो आपने खुद से दूर कर दिया था- ‘आउटडेटेड’ समझ के!

इसके अलावा भी हमने अपने इस जीवन-नाट्य में कठपुतली का किरदार निभाया है। बाजार और बाजारवाद की अंगुलियों से संचालित होते हुए यह भी समझ नहीं पा रहे कि हम कठपुतली नहीं मनुष्य हैं, जिसे बुद्धि और समझ का उपहार जन्म के साथ प्राप्त हुआ है। हमारी आस्था, विश्वास और यहां तक कि हमारी भाषा, विचार और शिष्टाचार पर भी इसका गहरा असर आया है। एक तरह से हमारा व्यवहार और आचरण भेड़ों के समूह की तरह हो गया है। एक ऐसे सामूहिक गान का हिस्सा होते जा रहे हैं हम, जिसमें आंख बंद करके सबके सुर में सुर मिलाना ही श्रेष्ठ और सुखद माना जा रहा है। जबकि ये हमारे लिए नुकसानदायक स्थिति है।

निजी तौर पर हमारी मौलिकता की भक्षक है। इस तरह की वैचारिक शून्यता एक तरह की नई प्रजाति को जन्म दे रही है, जिनका उपयोग लगभग उसी तरह हो रहा है, जैसे किसी प्रयोगशाला में जीव-जंतुओं के साथ किया जाता रहा है। किसी नई वस्तु की बात हो या नए विचारों की, विवेक, समझ और साहस के साथ उसका पूरा आकलन करना बेहद जरूरी हैं, ताकि भविष्य में ईमानदार संभावनाओं को सही आयाम मिले और अपने फायदे के लिए हमे कोई कठपुतली न बना सके।

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