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दुनिया मेरे आगे: बदलती सूरत

देहरादून के कई सरकारी प्राथमिक स्कूलों की चारदिवारी, कमरों की दीवारों को देखने और वहां के बच्चों से मिलने, उनसे बातें करने के बाद पता चलता है कि उनके बीच पढ़ने-लिखने के हुनर, कहानी-कविता बनाने और सुनाने के कौशल का विकास कितनी तेजी से सकारात्मक दिशा में हो रहा है।

Author December 5, 2018 5:09 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

विपिन चौहान

यही कोई साढ़े तीन दशक पहले की बात रही होगी। मेरे गांव में जब भी कोई समस्या आती थी और प्रधान भी उसका समाधान ढूंढ़ने में नाकाफी साबित होते थे तो फरियाद हमारे गुरुजी यानी हमारे सरकारी स्कूल के हेडमास्टर के पास पहुंचती थी। फिर स्कूल की छुट्टी के बाद हेडमास्टर, प्रधान और गांव के दो-चार बुद्धिजीवी लोगों की बैठक शुरू हो जाती थी। ये बैठकें तब तक चलती रहतीं, जब तक कि उस खास समस्या से छुटकारा न मिल जाए। शादी, नौकरी, खेती-बाड़ी, मुकदमा या आपसी मनमुटाव आदि में कोई समस्या आने पर लोग हल के लिए हेडमास्टर जी के पास पहुंचते थे।

समय बीतता गया, सोच बदलती गई, एक समय ऐसा भी आया कि शिक्षकों के प्रति सोच नकारात्मक होने लगी। हालांकि इसके जिम्मेवार पूरी तरह से वे भी नहीं थे, क्योंकि इस दौरान स्कूली शिक्षा से दूर रहे समाज के एक बड़े तबके ने स्कूल में अब जाकर पहुंचना शुरू ही किया था। जाहिर है, शिक्षकों के सामने एक बड़ी चुनौती थी इन्हें शिक्षित करने की और वह भी बिना किसी अतिरिक्त संसाधन के। इस सबके चलते एक ओर शिक्षा लेने आने वाले बच्चों की संख्या में लाखों का इजाफा हुआ, दूसरी ओर पर्याप्त शिक्षकों से लेकर संसाधनों तक के अभाव के चलते स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आई। इस बात को कुछ लोगों ने बढ़-चढ़ कर फैलाया। नतीजतन, पिछले लगभग दो-तीन दशकों में सरकारी स्कूल में शिक्षकों को काफी कुछ सहना पड़ा है।

आज हालात बदलने लगे हैं। बहुत सारे शिक्षकों ने अपने स्कूलों के बच्चों का विश्वास हासिल कर लिया है। ऐसे तमाम उदाहरण आज हमारे इर्द-गिर्द दिखाई पड़ते हैं। यकीन न हो तो स्कूलों में जाना शुरू कीजिए। आपको स्कूल की दीवारों से बातचीत करने के मौके मिलेंगे जो आपको इसके जीवंत होने का अहसास कराएंगे। दीवारों पर टंगे चार्ट, पोस्टर आपको स्कूल में बच्चों के आनंदित होने के सबूत देंगे। ऐसे तमाम शिक्षक आसानी से मिल जाएंगे जो बच्चों को उनके माता-पिता से बेहतर तरीके से जानने लगे हैं।

देहरादून के कई सरकारी प्राथमिक स्कूलों की चारदिवारी, कमरों की दीवारों को देखने और वहां के बच्चों से मिलने, उनसे बातें करने के बाद पता चलता है कि उनके बीच पढ़ने-लिखने के हुनर, कहानी-कविता बनाने और सुनाने के कौशल का विकास कितनी तेजी से सकारात्मक दिशा में हो रहा है। सरकारी स्कूलों में इतने प्रतिभाशाली बच्चे मिल जाते हैं, जिनके बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा पाता। जाहिर है, यह वहां के शिक्षकों की प्रतिबद्धता, सरोकार, योग्यता और क्षमता की वजह से संभव हो रहा है जो न केवल सरकारी स्कूलों के प्रति बने नकारात्मक नजरिए को बदल रहे हैं, बल्कि सीखने-सिखाने में रोज नए आयाम जोड़ जा रहे हैं और शिक्षा को उसके वास्तविक मुकाम की और ले जा रहे हैं।

जरूरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में सेवारत लोग अपनी भययुक्त पदानुक्रम छोड़ कर शिक्षक के लिए ऐसी स्थितियां तैयार कर पाएं कि शिक्षक अपना अधिकतम समय स्कूल में बच्चों के साथ गुजार सकें, उनकी अकादमिक जरूरतों के लिए कार्यरत संस्थाएं उनकी मदद के लिए हमेशा उनके साथ कदम से कदम मिलाती नजर आएं और शिक्षकों की अकादमिक चुनौतियों को उनके साथ मिल-बैठ कर इनके प्रभावी समाधान कर पाएं। शिक्षक भी लगातार अपने शिक्षण पर चिंतन करें, अपने ऐसे शिक्षक साथियों का सहयोग लें जो अपने स्कूलों में प्रभावी शिक्षण कर पाए हैं।

हम सब अपनी दक्षताओं पर चिंतन को ऐसे भी देख सकते हैं कि हम एक कक्षा में एक सत्र के लिए पढ़ाने पहुंचते हैं तो अपनी शिक्षण दक्षता को हम तीन श्रेणियों में रख कर आत्म-चिंतन कर सकते हैं। पहली, क्या हमारा ध्यान इस पहलू पर ज्यादा है कि बच्चों को इस अवधि में कैसे व्यस्त रखा जाए! दूसरी, क्या हमें पहली बात की ज्यादा फिक्र के बजाय इस बात की ज्यादा चिंता है कि हम सीमित समय में अपनी विषय वस्तु को बेहतर तरीके से क्रियान्वयित कर पाएं! और तीसरी, क्या हमारी चिंता और चिंतन का विषय यह है कि हम कैसे अपने शिक्षण से सभी बच्चों को लाभ पहुंचा पाएं!

कुछ शोधकर्ताओं ने भी आत्मचिंतन के कुछ सरल तरीके सुझाएं हैं। मसलन, यह देख लें कि क्या हम हर साल अपनी कक्षाओं में एक ही तरीके की सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर इसका जवाब ‘हां’ है तो हमें खुद को अपने चिंतनशील होने की स्थिति पर केंद्रित करने की जरूरत है। देखना होगा कि इससे हम बच्चों को कितना कुछ सीखने-समझने में मदद कर रहे हैं। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि दो शिक्षक थे, जिन्हें कक्षाओं में पढ़ाते हुए दस-दस साल का अनुभव हो गया था। मगर एक को सिर्फ एक साल का अकादमिक अनुभव माना जाएगा, क्योंकि उसने बाकी नौ साल सीखने-सिखाने के पुराने तरीकों का इस्तेमाल किया था। जबकि दूसरे को दस साल का अनुभव, क्योंकि उसने हर साल के अनुभव का फायदा उठाते हुए सीखने-सिखाने के तौर-तरीकों को बेहतर बनाया।

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