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स्कूल में सांप

जाबिर हुसेन बजाहिर यह खबर इतनी ‘छोटी’ थी कि पढ़े-लिखों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाई। बीते सप्ताह मध्य बिहार की एक ‘जागरूक’ बस्ती में बाधू दास के बेटे राहुल की कक्षा में पढ़ाई के दौरान सांप काटने से मौत हो गई। कक्षा चार का छात्र राहुल रोज की तरह उस दिन भी अपनी […]

Author December 22, 2014 12:10 PM

जाबिर हुसेन

बजाहिर यह खबर इतनी ‘छोटी’ थी कि पढ़े-लिखों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाई। बीते सप्ताह मध्य बिहार की एक ‘जागरूक’ बस्ती में बाधू दास के बेटे राहुल की कक्षा में पढ़ाई के दौरान सांप काटने से मौत हो गई। कक्षा चार का छात्र राहुल रोज की तरह उस दिन भी अपनी कॉपी-किताब लेकर स्कूल आया था। मास्टर साहब समय पर स्कूल कम ही आते हैं, सो राहुल अपने सहपाठियों के साथ चटाई-बोरी पर किताबें फैला कर बैठ गया। कुछ समय बीता तो मास्टर जी खैनी लिटाते कक्षा में दाखिल होते दिखाई दिए। उनके आते ही कक्षा में अनुशासन की हवा बही। सबने अपनी किताबें खोल दीं, कॉपियां संभाल लीं और मास्टर जी की ओर मुखातिब हो गए। मास्टरजी कक्षा के एक छोर पर रखी अधटूटी कुर्सी पर झपकियां लेने लगे थे।

तभी कक्षा के एक किनारे बैठे बाधू दास के बेटे राहुल ने अपनी भारी चीख से सबको चौंका दिया। कोई कांटा-सा चुभ गया था उसके पैर में। पूरी कक्षा का ध्यान उसकी ओर गया। मास्टरजी की झपकियां भी टूटीं और उन्हें यह कुछ शरारती बच्चों की हरकत नजर आई। धमकी भरे लहजे में वे पूरी कक्षा को डांटने-फटकारने लगे। मगर राहुल की चीख बढ़ती जा रही थी। सही अर्थ में वह छटपटा रहा था। साथियों ने देखा कि उसके पैर में अंगुलियों के जरा ऊपर एक गहरा काला निशान उभर आया था, जिससे खून की बूंदें टपक रही थीं। एक ने उसे हाथों का सहारा देकर कक्षा के बाहर ले जाने की कोशिश की। तभी बोरी के नीचे से एक बड़ा सांप बिल में प्रवेश करता दिखाई दिया।
कक्षा के सभी विद्यार्थी सांप को देख कर रोते-चिल्लाते बरामदे की ओर भागे। मास्टर जी पहले ही नौ दो ग्यारह हो चुके थे। पूरे स्कूल में ‘सांप-सांप’ का शोर मच रहा था। शोर बस्ती वालों को भी सुनाई दिया। तब तक बाधू दास का बेटा राहुल जमीन पर पड़ा छटपटाता रहा। ‘सांप’ का शोर सुन कर बस्ती के किसी ‘समाज सेवी’ ने झाड़-फूंक वाले ओझा को बुला लिया। ओझा अपना लटका-झटका संभाले कक्षा के टूटे-फूटे फर्श पर अवतरित हुए। तंत्र-मंत्र की उबाऊ प्रक्रिया में समय तो लगना ही था! बाधू दास के बेटे, राहुल के दिन पूरे हो चुके थे। सांप के जहर ने उसे मौत की नींद सुला दिया था।

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तब तक पूरी बस्ती में शोर मच गया था कि बाधू दास का बेटा स्कूल में सांप काटने से मर गया। पलक झपकते पूरी बस्ती चौराहे पर आ गई। बाधू दास का परिवार सड़क के बीचोंबीच दहाड़ें मार कर रो रहा था। मां-बाप की उम्मीदों का सहारा राहुल सड़क पर बेजान पड़ा था। पटना से गया की ओर जाने वाली चौड़ी सड़क कई घंटे बाधित रही। तब कहीं जाकर गाड़ियों को राहत पहुंचाने की खातिर इलाके के एक अधिकारी मौके पर आए। परिवार को दिलासा दिया, समझाया-बुझाया, और बाधू दास को बच्चे की लाश उठाने पर राजी कर लिया।

इस प्रकार, इस छोटी-सी खबर का अंत हो गया। इसके साथ ही बिहार के एक बदहाल स्कूल की टूटी-फूटी जमीन पर बिल से निकल कर बच्चों को डंसने वाले सांप की कहानी भी नेताओं से जुड़ी खबरों के अंधेरे में कहीं खो गई।

जमाना हुआ कि इवान इलिच ने समाज को स्कूल से मुक्ति दिलाने का विचार दुनिया के सामने रखा था। उस समय कक्षा में ‘सर्प-शिक्षा’ जैसी परिस्थिति अवश्य ही सामने नहीं आई रही होगी। पर आज कक्षाओं में बच्चों के बीच जो कचरा-अधकचरा ज्ञान परोसा जा रहा है, वह किसी सर्पदंश से कम है क्या? एक प्रकार का जहर है, जो मासूम बच्चों के कोमल मन में प्रवेश कराया जा रहा है! यह जहर अपने भविष्य के प्रति उन्हें किस हद तक आश्वस्त रहने देगा!

राज्यों की राजधानी और दीगर बड़े शहरों में पूरी तरह वातानुकूलित स्कूलों की बाढ़-सी आ गई है। इनमें बच्चों को वातानुकूलित छात्रावासों में रहने-सहने के अत्याधुनिक गुर सिखाए जाते हैं। जो बच्चे अपने आरामदेह घरों में परिवार के साथ रहते हैं, उन्हें स्कूल लाने-ले जाने के लिए वातानुकूलित गाड़ियों की व्यवस्था रहती है। यह पूछने से क्या लाभ कि इन स्कूलों में प्रति विद्यार्थी क्या खर्च आता है!

‘सर्प-शिक्षा’ के इस घटाटोप में बाधू दास की संतान के लिए भविष्य के सपनों का जो मकड़जाल बिछा है, उसमें क्या आपको शिक्षा और ज्ञान की किरणें फूटती दिखाई देती हैं? देश के खजाने से अरबों रुपए हर साल किसी ‘अभियान’, किसी ‘मिशन’ के तहत खर्च हो रहे हैं। पर गांव की बुनियादी इकाइयों में दरकती जमीन से जहरीले सांपों का निकलना बंद नहीं हो रहा। आज का यह छोटा अंधकार हमें कल के किसी बड़े अंधकार की ओर तो नहीं ले जा रहा!

 

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