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स्मृतियों में शरद भाई

यशवंत कोठारी वे 1977 की सर्दियों के दिन थे। शरद जोशी किसी कवि सम्मेलन के सिलसिले में उदयपुर आए और एक होटल में ठहरे हुए थे। मैं उनसे मुलाकात करने होटल में ही पहुंचा। मेरा नाम सुनते ही शरद भाई तपाक से बाहर आए और गर्मजोशी से मिले। उन्होंने कहा- ‘यार पार्टनर, तुम्हारा नाम तो […]

Author May 21, 2015 8:18 AM

यशवंत कोठारी

वे 1977 की सर्दियों के दिन थे। शरद जोशी किसी कवि सम्मेलन के सिलसिले में उदयपुर आए और एक होटल में ठहरे हुए थे। मैं उनसे मुलाकात करने होटल में ही पहुंचा। मेरा नाम सुनते ही शरद भाई तपाक से बाहर आए और गर्मजोशी से मिले। उन्होंने कहा- ‘यार पार्टनर, तुम्हारा नाम तो जाना-पहचाना है।’ मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि देश का लब्ध-प्रतिष्ठित लेखक मुझे जानता है। बातचीत के दौरान उन्होंने उदयपुर-दर्शन की इच्छा व्यक्त की। होटल से हम दोनों सिटी पैलेस, म्यूजियम, सहेलियों की बाड़ी, फतेहसागर घूमने करने निकल पड़े। दाल-बाटी की संगत की। उन दिनों वे ‘उत्सव’ फिल्म के संवाद लिख रहे थे। घूमते हुए वे वसंत सेना पर बड़ी बेबाक टिप्पणियां करते रहे। वसंत, होली आदि भी वे लगातार बोलते रहे। मैं उनकी बातें सुनने का लाभ लेता रहा। कवि सम्मेलन में जाते-जाते शाम तक ठंड बढ़ने की संभावना थी, इसलिए उन्होंने एक शाल मंगवा ली।

उनसे इस पहली मुलाकात के कुछ समय बाद मैं मुंबई गया। वहां मानसरोवर होटल में एक बार फिर उनसे मुलाकात हुई। बातचीत हिंदी व्यंग्य लेखन और नाटकों पर चल पड़ी। उन्होंने कई मित्रों पर बड़ी आत्मीयतापूर्ण टिप्पणियां कीं। इसके बाद वे कवि सम्मेलन के सिलसिले में ही जयपुर आए। तब तक मैं भी स्थानांतरित होकर जयपुर आ गया था। उनसे मिलने जाते हुए इस बार मैं अपने साथ उनकी पुस्तक ‘यथासंभव’ ले गया था। किताब को उन्होंने देखा और मुझसे लेकर उस पर लिख दिया- ‘प्रिय भाई यशवंत को उसके द्वारा क्रय की गई उसे ही सप्रेम। -शरद जोशी, 23.3.1985।’ उस दिन मैंने उनसे स्वतंत्र लेखनजीवी होने के गुण पूछे। वे कुछ गंभीर होकर बोले- ‘बड़ा मुश्किल है, पत्रकारिता या फिल्म जगत।’ शाम तक उनके साथ घूमते रहे। एमआइ रोड से उन्होंने बच्चियों के लिए कुछ दुपट्टे खरीदे। अपनी बहन से मिलने के लिए पानों के दरीबे में मुड़ गए और मैं अपने घर की ओर चल पड़ा।

शरद भाई जब भी मिले, पूरी आत्मीयता और अपनेपन के साथ। मुझे कभी नहीं लगा कि वे मुझसे काफी वरिष्ठ हैं। जब वे ‘हिंदी एक्सप्रेस’ के संपादक बने तो उसके तुरंत बाद उनका पत्र आया- ‘जल्दी सामग्री भेजें।’ मगर मैं ही आलसी साबित हुआ। बाद में वे जब गोरेगांव के यशवंत नगर में रहने लगे तो एक बार उन्होंने मुझे कहा था- ‘तुम्हारे नाम के नगर में रहता हूं!’ वे मेरी पुस्तकों, रचनाओं की यदा-कदा प्रशंसा और कई बार कठोर समीक्षा भी करते थे। उनसे तीन-चार बार की मुलाकात में ही मुझे लग गया था कि मैं उनसे काफी कुछ सीख सकता हूं। लेकिन घड़े में घड़े जितना ही समाता है।

शरद भाई का जन्म इक्कीस मई, 1931 को उज्जैन में हुआ था। उनका निधन पांच सितंबर 1991 को मुंबई में हुआ था। परिक्रमा, किसी बहाने, जीप पर सवार इल्लियां, हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, यथासंभव, नावक के तीर, नदी में खड़ा कवि, यथासमय, घाव करे गंभीर आदि उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। उन्हें चकल्लस पुरस्कार, काका हाथरसी पुरस्कार और 1990 में पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा गया। शरद जोशी के व्यंग्य सामान्य, सहज, बोलचाल की भाषा में गहरे कटाक्ष करते हैं। समाज के सभी हिस्सों पर वे तीखा प्रहार करते हैं और शोषण, विसंगति, विकृति- सब पर उनका ध्यान जाता है। वे प्रबुद्ध पत्रकार, यशस्वी संपादक और अद्वितीय व्यंग्यकार रहे जो लंबे समय तक व्यंग्य की नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते रहेंगे। साहित्य, राजनीति, भाषा आदि लगभग हर विषय पर उन्होंने बेधड़क लिखा या टिप्पणियां कीं।

पद्मश्री से सम्मानित इस लेखक को आज भी बार-बार पढ़ने की इच्छा होती है। उनकी किताब ‘यथासंभव’ और नाटक ‘अंधों का हाथी’ मुझे खासतौर पर पसंद हैं। वे अक्सर कहते थे- ‘भारत की जमीन पर व्यंग्य ही सबसे ज्यादा फैलने वाली फसल है।’ आजकल के हालात देखने पर कई बार लगता है कि शरद भाई बिल्कुल ठीक कहते थे। उन्हें याद करते हुए कई बार भावुक हो जाता हूं तो सोचता हूं कि काश, शरद भाई इतनी जल्दी नहीं जाते। कुछ और अच्छी रचनाएं देकर हिंदी की गरीबी दूर करते। मगर अफसोस कि अब वे नहीं हैं, केवल उनकी रचनाएं हैं हमें उनकी याद दिलाने के लिए। शरद भाई ने बाद में ‘उत्सव’, ‘मन का आंगन’ जैसी फिल्में दीं तो दूरदर्शन पर ‘ये जो है जिंदगी’, ‘विक्रम बेताल’ जैसे धारावाहिक भी दिए। उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार नहीं मिला। मगर ऐसा होता तो शायद अकादेमी के ही सम्मान में इजाफा होता!

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