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सफर में कमीज

विनोद कुमार पिछले दिनों मुंबई जाना पड़ा। ट्रेन का सफर था, सो रास्ते में पढ़ने के लिए सलमान रुश्दी का उपन्यास ‘आधी रात की संतानें’ रख लिया। इत्तिफाक से मुंबई की पृष्ठभूमि उपन्यास का बड़ा हिस्सा है। साठ के दशक के शुरुआती दिनों का वह बंबई अब मुंबई में बदल गया है। इसमें मुंबई के […]

Author June 3, 2015 5:54 PM

विनोद कुमार

पिछले दिनों मुंबई जाना पड़ा। ट्रेन का सफर था, सो रास्ते में पढ़ने के लिए सलमान रुश्दी का उपन्यास ‘आधी रात की संतानें’ रख लिया। इत्तिफाक से मुंबई की पृष्ठभूमि उपन्यास का बड़ा हिस्सा है। साठ के दशक के शुरुआती दिनों का वह बंबई अब मुंबई में बदल गया है। इसमें मुंबई के बारे में कहा गया है कि वह दिखता तो एक हाथ जैसा है, मगर वास्तव में मुंह है, हमेशा खुला हुआ, हमेशा भूखा, भारत के हर कोने से अनाज और हुनर को भकोसता हुआ। एक दिलकश जोंक, फिल्मों, कमीजों और मछलियों के अलावा कुछ भी नहीं पैदा करता हुआ।

खैर, जब मुंबई से लौटने लगा तो सोचा कुछ लेता चलूं। दादर के जिस होटल में ठहरा था, उससे निकलते ही बाहर दूर-दूर तक फुटपाथ पर दुकानें लगी थीं। फुटपाथ की दुकानें मुझे हमेशा बेहद आकर्षित करती रही हैं। सन 1972 में मैंने दिल्ली में एक फुटपाथी दुकान से महज पैंतीस रुपए में एक शानदार कोट खरीदा था। दादर में चहलकदमी करने के लिहाज से दादर स्टेशन से अपने होटल के बीच फैली फुटपाथी दुकानों पर हर रात कुछ देर टहलने का सिलसिला बन गया। वहीं दुकानदारों में एक प्रौढ़ व्यक्ति भी था। खूंटियों जैसी दाढ़ी, उदास आंखें। सामने टेबल पर पड़ी ढेर सारी सफेद कमीजें। मैं उसकी दुकान के सामने रुका, झिझकते हुए कमीजों की तरफ देखते हुए। एक गत्ते पर लिखा था- ‘एक दाम सौ रुपए।’ दुविधा थी, पता नहीं कैसी कमीजें हों। उसे लगा कि शायद मैं कमीज खरीदूं। पल भर के लिए उसकी आंखें थोड़ी-सी प्राणवान हो उठीं। अपनी दुविधा से घिरा मैं आगे बढ़ गया। यह सिलसिला कई दिनों तक चला।

मुझे मुंबई के कपास उद्योग के बारे में पहले से पता था। 1887 में वहां कपड़े की पहली फैक्ट्री लगी थी, ‘स्वदेशी’ के नाम से। देश में आजादी की लड़ाई शुरू हो गई थी और यह स्वदेशी शब्द जन भावनाओं से नत्थी हो गया था। फिर देखते-देखते सैकड़ों कपड़ा मिलें वहां खुल गर्इं। मफतलाल, बॉम्बे डाइंग, डीसीएम और न जाने कितने नाम, जो पूरे देश में लोकप्रिय हो उठे। लाखों मजदूर उन कारखानों में काम करते थे। लेकिन देखते-देखते सब तबाह हो गया। बहाना बनी यूनियनबाजी। 1982 में उभरे थे दत्ता सामंत। आॅटो मोबाइल उद्योग के श्रमिकों के आंदोलन और उपलब्धियों से लोकप्रिय हुए, कपड़ा उद्योग के श्रमिकों के बीच आए। उम्मीद जगाई कि वहां भी वेतन आदि में सुधार होगा।

एक लंबी लड़ाई शुरू हुई। लेकिन मांग सिर्फ मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं थी। 1947 के बॉम्बे इंडस्ट्रीयल एक्ट और मान्यताप्राप्त राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ की इजारेदारी को समाप्त करना भी मांगों में शामिल था। कॉटन कारखानों के ढाई लाख श्रमिकों की हड़ताल लंबी चली। लेकिन राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। दत्ता सामंत कांग्रेस के उस वक्त के शक्तिशाली नेता अंतुले से जुड़े थे। इस तरह कांग्रेस के करीबी ही हुए। लेकिन इंदिरा गांधी को लगा कि अगर कॉटन मजदूरों का आंदोलन सफल हो गया तो उनका प्रभाव बंदरगाह के मजदूरों में भी बढ़ेगा। इसलिए कॉटन मिल की हड़ताल से कड़ाई से निबटा गया। महीनों चली बंदी के बाद जब हड़ताल समाप्त हुई तो आगे-पीछे अधिकतर कारखाने हमेशा के लिए बंद हो चुके थे। कुछ मुंबई के बाहर चले गए। अब भी मुंबई घूमते वक्त उन कपड़ा मिलों के खंडहर शहर में जहां-तहां देखे जा सकते हैं।

बहरहाल, मुझे लगा कि हो सकता है वह फुटपाथ पर कमीज बेचने वाला दुकानदार किसी कपड़ा मिल का मजदूर रहा हो। वहीं किसी मिल से कमीज लाकर बेचता हो। इस लिहाज से उससे एक कमीज खरीद ही लेनी चाहिए! मुंबई से वापसी की पिछली रात हम पति-पत्नी उसकी दुकान के पास जाकर खड़े हो गए। मेरी पत्नी मुझसे इस बात के लिए परेशान रहती हैं कि मैं किसी दुकान पर खिंचा चला जाता हूं, लेकिन खरीदता नहीं। उन्होंने मुझे पहले से ही ताकीद कर दी थी कि अगर उस दुकानदार के टेबल के पास खड़े होंगे तो कमीज खरीदनी पड़ेगी। मैंने भी तय कर लिया था कि कमीज लेनी है। यों भी सौ रुपए में तो आजकल कमीज की सिलाई भी नहीं आती। दुकानदार पहले तो निर्लिप्त भाव से मुझे देखता रहा।

मैंने जैसे ही कहा कि कमीज लेनी है तो फुर्ती से उठा। ‘ठहरो, मैं देता हूं।’ उसने ढेर के बजाय तह की गई कमीजों में से छांट एक कमीज मेरी तरफ बढ़ा दी। पूरी तरह सूती कपड़े की एक सफेद कमीज। खुशी-खुशी कमीज लेकर हम वापस होटल के कमरे में आए। सुबह हवाई अड््डे जाने के लिए तैयार होने लगा। वही कमीज पहनने के लिए निकाला और अफसोस से भर गया। मुंबई की उस सौगात, यानी कमीज में कॉलर के नीचे लिखा था- ‘मेड इन चाइना।’ सूती कपड़ा मिलों के लिए मशहूर मुंबई के प्रति भावुक होकर मैंने जो कमीज खरीदी, वह चीन की बनी थी।

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