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सबक के बजाय

महेंद्र राजा जैन मुझे लगता है कि सोलह दिसंबर 2012 की घटना की खौफनाक रात दिल्ली के साथ-साथ देश भर के लोग अभी भूले नहीं होंगे। संवेदनाएं आमतौर पर घटनाओं से प्रभावित होती हैं, लोग दुखी होते या राहत की सांस लेते हैं। पिछले साल पांच दिसंबर की रात ने एक बार फिर से लोगों […]

महेंद्र राजा जैन

मुझे लगता है कि सोलह दिसंबर 2012 की घटना की खौफनाक रात दिल्ली के साथ-साथ देश भर के लोग अभी भूले नहीं होंगे। संवेदनाएं आमतौर पर घटनाओं से प्रभावित होती हैं, लोग दुखी होते या राहत की सांस लेते हैं। पिछले साल पांच दिसंबर की रात ने एक बार फिर से लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था कि सुरक्षित दिल्ली के तमाम दावों के बावजूद देश की राजधानी महिलाओं के लिए अब भी कितनी महफूज है। सच यह है कि अभी भी कुछ नहीं बदला है। अगर कुछ अंतर है तो केवल यह कि दिसंबर 2014 की घटना की शिकार लड़की जीवित बच गई और लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। तकरीबन दो साल पहले की तरह के आंदोलन के तेवर बन रहे थे। शायद इस दबाव में दिल्ली पुलिस ने इस मामले के अभियुक्त को उसके उत्तर प्रदेश के घर से गिरफ्तार किया। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को बिना लाइसेंस के चलने वाली रेडियो टैक्सी पर रोक लगाने को कहा और इस घटना से संबद्ध रेडियो-टैक्सी चलाने वाली कंपनी उबर के अधिकारियों से पूछताछ की। लेकिन यहां मुख्य सवाल यह नहीं है कि इस संबंध में क्या किया जा रहा है या किया जाएगा। इससे भी आगे बहुत कुछ है जो हम सभी के लिए चिंताजनक है। लेकिन हमारे लिए सांत्वना की बात कहीं नहीं है। अकेले दिल्ली नहीं, देशभर में महिलाओं को उनके घरों के बाहर सुरक्षा के लिए कुछ भी नहीं किया गया लगता है।

इस तरह के मामलों में संबंधित अधिकारियों का ढुलमुल रवैया और समूची व्यवस्था में लगी घुन सवालों के घेरे में है। तब अधिकारियों का कहना था कि उबर कंपनी दिल्ली में वर्षों से अवैध रूप से टैक्सी चला रही है। अगर अधिकारियों को यह पता था, तो उस कंपनी के विरुद्ध कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह मानना तो भोलापन है कि दिल्ली के परिवहन अधिकारियों को इसका पता न हो। निश्चय ही परिवहन विभाग इस संबंध में जानबूझ कर आंखें मूंदे रहा। यह बात केवल उबर के संबंध में नहीं है। अवैध रूप से रेडियो टैक्सी चलाने वाली अन्य कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात की गई। लेकिन आखिर हुआ क्या? उबर कंपनी ने एक बार फिर दिल्ली में अपनी टैक्सी सेवा शुरू करने की घोेषणा कर दी है। क्या यह भी याद दिलाना जरूरी है कि सोलह दिसंबर 2012 को जिस बस में वह घटना हुई थी, वह भी अवैध रूप से चलाई जा रही थी। जाहिर है, परिवहन अधिकारियों ने अब तक उस घटना से कोई सबक नहीं लिया।

इस संबंध में दूसरी महत्त्वपूर्ण चूक अभियुक्त ड्राइवर के संबंध में हुई। यह निश्चय ही सभी के लिए आश्चर्य की बात है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ उत्तर प्रदेश के थानों में बलात्कार करने और बलात्कार की कोशिश के तीन मामले दर्ज हैं, वह इस प्रकार खुलेआम टैक्सी चलाता आ रहा था। ऐसा लगता है कि न तो उबर कंपनी के अधिकारियों को और न ही दिल्ली की पुलिस को इस ड्राइवर के आपराधिक इतिहास का पता था। अगर ऐसा कोई सूचनाओं का राष्ट्रीय ब्योरा होता जो देश भर के सभी पुलिस थानों में होता, तो उबर कंपनी में नियुक्ति के पहले ही वह ड्राइवर पकड़ा जाता। खुद उबर कंपनी ने उस ड्राइवर के पिछले रिकार्ड की जांच की होती, तो उसे उस पर चल रहे आपराधिक मामलों के बारे में पता चल जाता। लेकिन अपनी उदासीनता के चलते उसने नहीं किया। जो हो, कम से कम इस घटना से सरकार को यह सबक मिल जाना चाहिए कि वह राष्ट्रीय स्तर पर यथाशीघ्र इस प्रकार के अपराधियों का समूचा ब्योरा तैयार करने का काम शुरू करे।

अवैध रूप से रेडियो-टैक्सी चलाने वाली कंपनियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की बात समझ में आती है, लेकिन यह समस्या का सही हल नहीं है। अधिकारियों को उन तत्त्वों और परिवहन विभाग के वैसे अधिकारियों का भी पता लगाना चाहिए, जिनकी नाक के नीचे यह धंधा चलता रहा और वे आंखें मूंदे पड़े रहे। ऐसे सभी लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। दरअसल, पूरी व्यवस्था में ही घुन लगी हुई दिखती है और उसमें सुधार की आवश्यकता है। लेकिन अक्सर मुझे ऐसा लगता है कि इस प्रकार से आपराधिक तत्त्वों को पुलिस का कोई भय नहीं है। अगर मेरा यह अनुमान गलत नहीं है तो इसमें भी कोई संदेह नहीं कि पुलिस कभी भी चैन की नींद नहीं ले पाएगी।

 

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