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प्यार का बिस्कुट

क्षमा शर्मा रविवार की एक सुबह घर की झाड़-पोंछ कर रही थी। बालकनी की खिड़कियों को बाहर से साफ करते हुए मेरी नजर नीचे एक नौजवान पर पड़ी। वह अपनी मोटर साइकिल साफ कर रहा था। जाहिर है, रविवार के दिन सबके अपने-अपने काम। पास ही लेब्राडोर नस्ल का एक कुत्ता खड़ा था। कुत्ते के […]

Author June 6, 2015 2:15 PM

क्षमा शर्मा

रविवार की एक सुबह घर की झाड़-पोंछ कर रही थी। बालकनी की खिड़कियों को बाहर से साफ करते हुए मेरी नजर नीचे एक नौजवान पर पड़ी। वह अपनी मोटर साइकिल साफ कर रहा था। जाहिर है, रविवार के दिन सबके अपने-अपने काम। पास ही लेब्राडोर नस्ल का एक कुत्ता खड़ा था। कुत्ते के शरीर पर जो चमक थी, उसे देख कर लगता था कि अभी वह किशोर है। युवावस्था में बस कदम रखने ही वाला है। तभी हाथ में गेंद लिए एक छोटा बच्चा उधर आ पहुंचा। कुत्ते को एक पल के लिए देख कर ठिठका, फिर बोला- ‘भइया, कुछ करेगा तो नहीं।’ ‘कुछ नहीं, बस थोड़ा-सा काटेगा।’ लड़के ने मुस्कराते हुए कहा। बच्चा जिधर से आया था, उधर ही भाग गया। लड़का उसे पुकारता ही रह गया- ‘अरे आ जाओ… काटता नहीं है।’

मगर बच्चा नहीं लौटा। मैंने ऊपर से ही कुत्ते को पुचकारा तो अपने चारों ओर देखते हुए वह जोर से भौंका, मानो अपनी निजता में खलल पड़ जाने पर एतराज जता रहा हो। ‘ये लो, मैं तो तुझे प्यार से बुला रही हूं और तू भौंक रहा है।’ मैंने एक तरह से मीठी शिकायत दर्ज की। मेरी बात सुन कर मोटर साइकिल साफ करते नौजवान ने मुझे देखा और मुस्कराया। मैंने पूछा- ‘क्या नाम है इसका?’ उसने बताया- ‘लाइका।’ अचानक मेरी कल्पना ने उड़ान भरी और ऐसा लगा कि मुझे खुशियों का एक तोहफा मिला। कल को इसके पिल्ले होंगे… इसी जैसे प्यारे। मैं भी उन्हें कुछ-कुछ खिलाया करूंगी। फिर मैंने उस लड़के से पूछा- ‘बिस्कुट खाती है?’ उसने कहा- ‘हां, सिर्फ मैरी गोल्ड।’

यानी ‘लाइका’ सेहत को लेकर सचेत है! डॉक्टर अक्सर इन्हीं बिस्कुटों को खाने की सलाह देते हैं। अस्पतालों में भी ये ही मिलते हैं। कहते हैं कि इनमें बहुत कम कैलोरी होती है। ज्ञान बघारते हुए मैंने अपने हाथ का झाड़न एक तरफ फेंका। अंदर जाकर हाथ धोकर डिब्बे से बिस्कुट निकाले और खिड़की पर फिर आ खड़ी हुई। ‘लाइका’ को पुचकारते हुए एक बिस्कुट नीचे फेंका, जो ठीक उसके पास जाकर गिरा। अचानक कहीं छिपा बैठा एक कौवा बिस्कुट की तरफ झपटा, मगर कुत्ते को देख कर वापस कदम्ब के पेड़ पर चला गया। लेकिन लाइका ने खाना तो दूर, उड़ती नजर से बिस्कुट को देखा और पीठ फेर ली और किसी दार्शनिक के अंदाज से पेड़ पर बैठे कौवे को देखने लगी, मानो कह रही हो कि बच्चू, जरा पास तो आओ, फिर बताऊं तुझे! मेरे आश्चर्य को भांपते हुए लड़के ने कहा- ‘आंटी, यह नहीं खाएगी। फेंकी हुई चीज नहीं खाती है। मैं उठा कर इसे खिलाना भी चाहूं तो नहीं खाएगी। अगर हम इसके बरतन में भी कुछ फेंक कर दें, तो भी नहीं खाती है।’

मैंने कहा- ‘अरे, यह तो बड़ी अकड़ वाली है। हो भी क्यों नहीं, इसका भी आत्मसम्मान है। कुत्ता है तो क्या हुआ! कहीं इसने ‘दीवार’ फिल्म का वह डॉयलाग तो नहीं सुन लिया जो अमिताभ बच्चन के बचपन का किरदार निभाते हुए बाल कलाकार ने बोला था कि वह फेंके हुए पैसे नहीं उठाता है और पास खड़ा पुलिस इंस्पेक्टर उसकी इस अदा पर कुर्बान हो गया था।’ मेरी बात सुन कर वह लड़का हंसा और बोला- ‘अरे आंटी ऐसा नहीं है। मम्मी-पापा ने इसे बिगाड़ दिया है। वे सब चीजें इसे अपने हाथ से खिलाते हैं। इसलिए यह अब हर एक से उम्मीद करती है कि इसके पास आकर हाथ से ही खिलाए।’ बेचारा बिस्कुट वहीं पड़ा था। लाइका के डर से कौवा भी पेड़ की डाल पर बैठा लालच से देख रहा था। नीचे नहीं आ पा रहा था।

लाइका की अकड़ को देख कर कौन कह सकता है कि कुत्ते अपने मनोभावों को व्यक्त नहीं करते। सिर्फ कुत्ते क्यों, अधिकतर जानवर बेहद भावुक होते हैं। वे मनुष्य पर इतना विश्वास करते हैं और मनुष्य उनकी उपयोगिता खत्म होते ही, उन्हें कसाई के हाथों बेचने से भी नहीं चूकता। कई वर्ष पहले अंगरेजी के अखबार ने एक खबर छापी थी कि दिल्ली में पालतू कुत्ते जब बूढ़े हो जाते हैं, तो लोग उन्हें अपने घर से दूर कहीं छोड़ आते हैं, ताकि वे कभी वापस न आ सकें। जो इतने लाड़-प्यार से पले होते हैं, वे बाहरी दुनिया का मुकाबला नहीं कर पाते। न ही सड़क के कुत्तों की तरह का खान-पान सीख पाते हैं और जल्दी ही मर जाते हैं। इनकी हालत देख कर घर के बूढ़ों की याद आती है।

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