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पुस्तक संस्कृति

शैलेंद्र पिछले साल दिसंबर का आखिरी हफ्ता था। उस दिन सुबह के लगभग नौ बजने को थे। कोहरे की चादर अब भी पसरी हुई थी। बेलघरिया स्थित निवास के पास ही रक्तदान शिविर लगाया गया था, एक स्थानीय क्लब की ओर से। माइक से रक्तदान करने की अपील के साथ-साथ इसके महत्त्व और सामाजिक दायित्व […]

Author February 23, 2015 11:38 am

शैलेंद्र

पिछले साल दिसंबर का आखिरी हफ्ता था। उस दिन सुबह के लगभग नौ बजने को थे। कोहरे की चादर अब भी पसरी हुई थी। बेलघरिया स्थित निवास के पास ही रक्तदान शिविर लगाया गया था, एक स्थानीय क्लब की ओर से। माइक से रक्तदान करने की अपील के साथ-साथ इसके महत्त्व और सामाजिक दायित्व के प्रति लोगों को आगाह किया जा रहा था। बीच-बीच में एक खास न्योता भी दिया जा रहा था स्थानीय लोगों को पुस्तक मेले में शिरकत करने के लिए। मेला भैरव गांगुली कॉलेज परिसर में लगा था। प्यारी-सी असरदार आवाज में दिया जा रहा न्योता दिल को भा रहा था। मुझे बहुत अच्छी लगी यह पहल। मैं जिस इलाके में रहता हूं, वहां भी छोटे आकार का यह पुस्तक मेला सालों से लगता आ रहा है। ये मेले फरवरी के आखिरी हफ्ते तक चलते हैं।

खैर, किताबें इंसानी वजूद के लिए कितनी खास हैं, यह बताया जा रहा था उद्घोषणाओं में। पश्चिम बंगाल में बहु-प्रतिष्ठित, बहु-प्रचारित, बहु-पुस्तक प्रेमी खिंचू कोलकाता पुस्तक मेले के अलावा लगभग हर जिले, कस्बे और बड़े मुहल्लों में भी इलाकाई स्तर पर पुस्तक मेलों का आयोजन होता है। कुछ के प्रचार अखबारों में और छोटे परदे पर भी होते हैं। किताबों के बगैर इंसानी वजूद की कल्पना नामुमकिन है- इस अहसास को जगाने वाली उद्घोषणाएं निश्चित रूप से किताबों के प्रति प्रेम और लगाव पैदा करने-बढ़ाने में मददगार होती होंगी। किताबें देखिए, किताबें खरीदिए, किताबें पढ़िए, शब्द-संस्कार को बनाए रखिए… ऐसे निरंतर प्रसारित आग्रह अपनी सार्थक भूमिका अदा करते हैं। यह विश्वास पुस्तक मेलों में जाकर और भी प्रगाढ़ होता है। इन पुस्तक मेलों में शब्द-प्रेमियों की आमद बढ़े, इसके लिए काव्य पाठ, सामयिक मुद्दों पर परिचर्चाएं, पुस्तक विमोचन, गीत-संगीत के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। यही नहीं, मेला परिसर के किसी कोने में फूलों की प्रदर्शनी लगाई जाती है तो किसी छोर पर चित्र प्रदर्शनी।

ऐसे छोटे पुस्तक मेलों में नई-नई किताबों के चयन के साथ-साथ कवियों-लेखकों और पुस्तक प्रेमियों की उपस्थिति देखते बनती है। हर किसी को बेसब्री से पुस्तक मेलों का इंतजार रहता है। लघु पत्रिकाओं के लिए तो ये संजीवनी का काम करते हैं। इन मेलों में दर्जनों लघु पत्रिकाओं के छोटे-छोटे स्टॉल दिख जाते हैं। बांग्ला की ज्यादातर लघु पत्रिकाएं इन मेलों के मद्देनजर अपने विशेषांकों की तैयारी में मुस्तैद रहती हैं। नए-पुराने लेखक-कवि इसे माकूल समय मान कर नई किताबें लाने की तैयारी में जुटे रहते हैं। विभिन्न स्टॉलों पर इनकी किताबें रखी जाती हैं, साथ ही कुछ मेले में घूम-घूम कर भी सीधे पाठकों को किताबें बेचते हैं। सभी लेखक-कवि बड़े या यों कहें कि बड़े प्रकाशकों की सूची में तो होते नहीं, सो बहुत सारे अपनी अंटी ढीली कर चालीस-साठ पृष्ठों के लघु आकार वाले कविता, कहानी या विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर संग्रह निकालते हैं। कीमत भी कम रखते हैं, बीस से पचास या साठ रुपए। बहुत से पुस्तक प्रेमी इन्हें खरीदते हैं और बड़े प्रेम से लेखकों के आॅटोग्राफ भी लेते हैं। मित्र-परिचितों में भी ये किताबें बंटती हैं। कुछ मित्र मना करने पर भी किताबों के मूल्य चुकाते दिख जाते हैं। आनंददायक होता है इस तरह का मंजर।

लेकिन यही मंजर बंगाल के हिंदी भाषी समाज में लगभग नदारद है। ऐसे मेलों में गिनती के ही हिंदी भाषी पुस्तक प्रेमी, अध्यापक या लेखक-पत्रकार दिखते हैं। दुखद यह कि युवा वर्ग में भी संतोषजनक उत्साह नहीं। कई मेलों में तो हिंदी किताबों के स्टॉल तक नहीं होते। शायद पुस्तक मेले के आयोजकों की पहल या कोशिश नहीं होती कि दूसरी भारतीय भाषाओं के लोगों को भी इनसे जोड़ा जाना चाहिए। यह कोशिश हिंदी के प्रकाशकों या अनियतकालीन लघु पत्रिका निकालने वाले संपादकों की ओर से तो होनी ही चाहिए। कोलकाता पुस्तक मेले में इस समाज की थोड़ी-बहुत उपस्थिति जरूर होती है। गिनती के स्थानीय प्रकाशकों के अलावा कुछ बड़े प्रकाशक भी दिल्ली से शिरकत करने इसमें आते हैं। गिनती के स्थानीय प्रकाशक भी। पाठक जुटते हैं, लेकिन बांग्ला भाषी पुस्तक प्रेमियों की तरह की दीवानगी एक सपना-सा लगता है।

दिल्ली में इस बार फिर विश्व पुस्तक मेले की खूब धूम रही। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पूरे हिंदी अंचल में छोटे-छोटे पुस्तक मेलों को लेकर कोई खास उत्साह नहीं दिखता। इधर कुछ बड़े-मझौले शहरों में जरूर ऐसी पहल शुरू हुई है। उम्मीद करनी चाहिए कि देर-सबेर पुस्तक प्रेम को बढ़ाने के लिए हिंदी क्षेत्रों में भी ऐसी पहल शुरू होगी। समाज को संवेदनशील और जागरूक बनाने के लिए यह बेहद जरूरी है। क्या लघु पत्रिकाओं के संपादकों और छोटे-मझोले शहरों और जनपदों के प्रकाशकों को इस दिशा में सोचना नहीं चाहिए?

 

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