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दिखावे के महल

हाल ही में साढ़े सात सौ करोड़ का बंगला मीडिया की सुर्खियां बना। इसके पहले हमने साढ़े चार सौ करोड़ के बंगले की सुर्खियां देखी थीं। इतना महंगा मकान बिकने..

Author नई दिल्ली | September 24, 2015 1:54 AM

हाल ही में साढ़े सात सौ करोड़ का बंगला मीडिया की सुर्खियां बना। इसके पहले हमने साढ़े चार सौ करोड़ के बंगले की सुर्खियां देखी थीं। इतना महंगा मकान बिकने का कोई रिकॉर्ड प्रॉपर्टी बाजार में उपलब्ध नहीं है। ये दोनों सुर्खियां हमारे सामने इस तरह से आर्इं, मानो भारत अब विश्व के उन संपन्नतम देशों की कतार में आ गया है, जिनके यहां अब ऐसी हैसियत रखने वाले लोग हैं जो अरबों का मकान खरीद सकते हैं। हमारे देश में यह एक विचित्र मानसिकता है जो ऐसे कार्यों को महिमामंडित करती है। खैर, साढ़े सात सौ करोड़ का बंगला खरीदने वाले हैं पुणे के कारोबारी साइरस पूनावाला। इसके एक सप्ताह पहले ही सवा चार सौ करोड़ रुपए में मालाबार हिल्स इलाके में जटिया हाउस को उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला ने खरीदा था। अब बिड़ला छोटे पड़ गए।

दक्षिण मुंबई के ब्रीच कैंडी स्थित इस बंगले को लिंकन हाउस के नाम से जाना जाता है। अमेरिकी काउंसलेट इसे 2011 से ही बेचने की कोशिश कर रहा था, पर उसे उसके मनमाफिक यानी साढ़े आठ सौ करोड़ रुपए का मूल्य देने वाले खरीदार नहीं मिल रहे थे। लेकिन साइरस ने मोलभाव करके काउंसलेट को मना लिया। लिंकन हाउस का परिसर दो एकड़ में है। बिल्टअप एरिया करीब पचास हजार वर्ग फीट है। यह बंगला ग्रेड-तीन लेवल का है। यानी पूनावाला चाहें तो बंगले में बदलाव कर सकते हैं। लिंकन हाउस पहले वांकानेर हाउस था। वांकानेर के राजा प्रताप सिंह झाला के बंगले को 1957 में अमेरिका ने लीज पर लेकर काउंसलेट दफ्तर बनाया था। तब इसे लिंकन हाउस कहा जाने लगा।

सवाल है कि क्या साइरस पूनावाला ने कुमार मंगलम बिड़ला का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए इस बंगले की इतनी ऊंची कीमत दी है? परंपरागत मान्यता यह थी कि आमतौर पर व्यापारी एक-एक पैसा सोच-समझ कर खर्च करता है। लेकिन भूमंडलीकरण और बाजार के वर्चस्व वाले मौजूदा युग में व्यवहार का यह चरित्र बदला है। आज के ज्यादातर बड़े कारोबारी बहुत शानो-शौकत से जीवन जीते हैं, महंगी गाड़ियों में सवार होकर गाड़ियों के काफिले में चलते हैं, महंगे सूट पहनते हैं, यात्रा में भी खर्च करते हैं, महंगे होटलों में रुकते हैं। इसी में रहने के लिए शानदार बंगला बनाने या खरीदने का चलन भी बढ़ा है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि साइरस पूनावाला ने यह बंगला व्यवसाय यानी उसके निर्माण में फेरबदल कर बेचने नहीं, रहने के लिए खरीदा है।

याद किया जा सकता है कि इसके पहले मुकेश अंबानी ने मुंबई में ही ऐसा बंगला बनवाया जो दुनिया में अनूठा हो। यह कहा जा सकता है कि पूंजीशाहों या खरबपतियों के बीच इस तरह की प्रतिस्पर्धा भी चल रही है। दरअसल, हमारे पड़ोस में कोई अच्छा मकान बनता है तो हम भी उससे बेहतर बनाने का ख्वाब पालने लगते हैं। पड़ोस के घर में कोई ऐसी चीज आई जो हमारे यहां नहीं है तो हमारे घर में भी उसकी मांग होने लगती है।

सोचने की बात है क्या इन अमीरों की कमाई केवल इनकी है कि ये जिस तरह चाहें उसे खर्च करें? सच यह है कि इन अमीरों की घोषित-अघोषित संपत्ति में लाखों लोगों का धन लगा है। जब हम किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं तो हमारा अंशदान भी उसमें हो जाता है। उन पर उनका एकाधिकार नहीं हो जाता। लेकिन इतनी बड़ी रकम का ऐसा उपयोग एक ओर भारत में कुछ लोगों के हाथों में आती अकूत संपत्ति को दर्शाता है तो दूसरी ओर वे वंचित वर्ग हैं, जिनके लिए बड़े शहरों में एक मकान खरीदना कठिन है। देश के लाखों लोगों के पास एक साधारण छत नहीं है सिर ढंकने के लिए। इस स्थिति में कोई व्यक्ति रहने के लिए खरबों का मकान बनवाए या खरीदे तो उसे समाज में किस नजर से देखा जाना चाहिए? क्या उसका महिमामंडन होना चाहिए, जैसा हो रहा है? जरा सोचिए, साढ़े सात सौ करोड़ या साढ़े चार सौ करोड़ का दस प्रतिशत भी अगर वह गरीबों के घर बनवाने पर खर्च कर देता तो न जाने कितने लोगों को छत नसीब हो जाती।

विडंबना देखिए कि ये कारोबारी जब सरकार के साथ बैठकों में आते हैं तो खुद को इतना परेशान बताते हैं कि अगर सरकारी सहायता न मिले तो उनके लिए कारोबार करना कठिन हो जाएगा। लेकिन कम से कम इन दो बंगलों के सौदों से ऐसा लगता नहीं कि हमारे देश के बड़े उद्योगपति और कारोबारी वाकई मंदी या आर्थिक संकट के शिकार हैं। इस तरह देश और जनता के धन को अपना मान कर या बना कर निजी सुख के लिए खर्च करने की कोई विवकेशील व्यक्ति प्रशंसा नहीं करेगा।

(अवधेश कुमार)

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