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दुनिया मेरे आगे: साहित्य का जीवन

पुस्तकालयों की स्थिति छोटे शहरों में दयनीय है। स्कूलों में तो अब पुस्तकालय अध्यक्ष के पद ही समाप्त किए जा रहे हैं। युवा पीढ़ी को लक्षित करके ‘पल्प साहित्य’ में जो परोसा जा रहा है, वह मात्र युवाओं की मानसिकता को भांप कर लिखी गई कहानियां हैं, जिनमें कुछ उनके संघर्ष तो कुछ रोमांस का तड़का...

प्रतीकात्मक तस्वीर

आज की युवा पीढ़ी का साहित्य से रिश्ता बड़ी तेजी से छीजता जा रहा है। हाल में ऐसे कुछ अनुभवों ने मुझे भी फिक्र में डाल दिया। एक ट्रेन यात्रा के दौरान कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों का समूह उत्तर भारत की यात्रा जा रहा था। मैंने देखा कि उनमें से अधिकतर युवा जहां यात्रा के लिए जा रहे थे, उस जगह के बारे में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से कुछ विशेष नहीं जानते थे। उनका समस्त ज्ञान ‘गूगल बाबा’ से प्राप्त जानकारी तक सीमित था। जब मैंने उन जगहों के साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्त्व के बारे में चर्चा की तो उन्हें आश्चर्य हुआ, लेकिन कोई जिज्ञासा भाव प्रकट नहीं हुआ। उनमें से अधिकतर बीटेक और एमबीए के छात्र थे। लेकिन उन्होंने हिंदी साहित्य में सिर्फ प्रेमचंद, निराला, महादेवी आदि का नाम सुना था, क्योंकि उनकी रचनाएं उनके दसवीं या बारहवीं तक के पाठ्यक्रम में थीं।

नए लेखकों को पढ़ने का उनके पास न समय है, न इच्छाशक्ति। एक नौजवान कहने लगा- ‘आजकल सब कुछ मोबाइल पर उपलब्ध है, ई-बुक्स हैं, तो किताब इतनी महंगी कौन खरीदे?’ मेरे पूछने पर उसने कुछ लोकप्रिय अंग्रेजी लेखकों की किताबों सहित कुछ अन्य किताबें पढ़ी होने की बात बताई, क्योंकि वे व्यक्तित्व विकास, मार्केटिंग, मानवीय व्यवहार आदि के विषय में हैं। जबकि बॉलीवुड की हरेक हलचल का उन्हें अद्यतन ज्ञान था। हमारा मीडिया भी व्यापारिक हितों के लिए ऐसी खबरों को खास तवज्जो दे रहा है। कुछ माह पहले एक कविता पाठ कार्यक्रम में जाना हुआ था। वहां निर्णायक के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर कहूं तो बहुत अफसोस होता है सोच कर कि हमारी युवा पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है! अधिकतर कविताएं प्रेम टूटने की स्थितियों और नारी को लेकर व्यक्त रुग्ण मनोभावों पर थीं। न उन्हें छंद का ज्ञान था, न मुक्त छंद कविता का। कविता के नाम पर वे इंटरनेट की सामग्री बटोर लाए थे।

कुछेक विद्यार्थी, जिनकी कविताएं मौलिक थीं और जिनमें साहित्य की वैचारिक और गंभीर समझ थी, उन्हें छात्र-छात्राएं सुनने की जगह शोर मचाने में अधिक रुचि ले रहे थे। साहित्य उत्सवों में भी युवाओं की उपस्थिति अधिकतर सेलिब्रिटियों वाले पांडालों में ही रहती है, गंभीर साहित्यकारों की चर्चा में कम। दरअसल, हमारी युवा पीढ़ी को सोशल मीडिया की लत लग चुकी है, जिसके कारण उसकी पठन-पाठन क्षमता गहरे तक प्रभावित हुई है। सस्ते और दोहराए गए चुटकुलों, फूहड़, अश्लील वीडियो और राजनीतिक विद्वेष से भरी सामग्री परोसी जा रही है। गलत इतिहास और महापुरुषों के बारे में भ्रामक जानकारी परोस कर उनकी सोच को विकृत किया जा रहा है। एक सर्वे के अनुसार एक युवा औसतन तीन से चार घंटे सोशल मीडिया पर खराब कर रहा है।

इसमें भी बंटवारा हो चुका है। फेसबुक अब प्रौढ़ व्यक्तियों, राजनेताओं के प्रचार और व्यापार का प्लेटफार्म रह गया है। वहां युवा कम हो रहे हैं। युवाओं का पंसदीदा प्लेटफार्म इंस्ट्राग्राम, वाट्सऐप है, जहां उनकी उपस्थिति लगातार देखी जा सकती है। ट्विटर पर राजनेताओं के आरोप-प्रत्यारोप और सेलीब्रिटियों का कब्जा अधिक है। साहित्य के विषय विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं से हटा दिया जाना और बारहवीं तक हिंदी को अनिवार्य विषय के रूप में हटा देना आदि ऐसे नीतिगत फैसले हैं, जिन्होंने साहित्य की दूरी युवाओं से और बढ़ाई है। दूसरे, हिंदी में साहित्येतर विषयों जैसे व्यक्तित्व विकास, अभियांत्रिकी, प्रबंधन, चिकित्सा आदि की उच्च स्तरीय और विदेशी साहित्य की अनूदित पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं। पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की कोई पहल विशेष रूप से उत्तर भारतीय समाज में नजर नहीं आती। वहां कपड़ों, महंगे गैजेट्स आदि पर हजारों रुपए खर्च किए जा सकते हैं, लेकिन पुस्तकों पर नहीं।

पुस्तकालयों की स्थिति छोटे शहरों में दयनीय है। स्कूलों में तो अब पुस्तकालय अध्यक्ष के पद ही समाप्त किए जा रहे हैं। युवा पीढ़ी को लक्षित करके ‘पल्प साहित्य’ में जो परोसा जा रहा है, वह मात्र युवाओं की मानसिकता को भांप कर लिखी गई कहानियां हैं, जिनमें कुछ उनके संघर्ष तो कुछ रोमांस का तड़का लगा कर भाषायी भदेसपन और गालियों की छौंक के साथ परोसा जा रहा है। इस तरह के विकृत साहित्य से युवाओं में न तो संवेदनाएं विकसित नहीं होंगी, न देश की वास्तविक परिस्थितियों की आर्थिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक समझ बनेगी। ऐसे में देश की युवा पीढ़ी का देशप्रेम उसके प्रति समर्पण और समस्याओं का ज्ञान सतही ही रहेगा। पढ़ने की आदत बनाने के लिए जो एकांत, एकाग्रता और वातावरण की आवश्यकता होती है, उसकी आज के कोलाहल से भरी व्यस्त दिनचर्या में उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन उसके लिए हमें ‘रीडिंग कॉर्नर’ विकसित करने होंगे। कुछ शहरों में ऐसे निजी पुस्तकालय चल रहे हैं। तमाम बाधाओं के बाद भी हमें अपने युवाओं को इस दिशा में मोड़ना होगा, इसके लिए सस्ते मूल्य पर साहित्य और साहित्येतर उत्कृष्ट पुस्तकें उपलब्ध कराने और पुस्तकालयों की शृंखला को देश भर में मजबूत करने जैसे ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा पाठकों की कमी और किताबों की बिक्री का रोना चलता रहेगा।

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