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दुनिया मेरे आगे: परिवेश का पाठ

अगर प्रारंभिक स्तर पर विद्यालय में शिक्षण एक ऐसी भाषा में होता है जिसे स्थानीय परिवेश, आदिवासी और अल्पसंख्यक बच्चे नहीं जानते हैं, तब ऐसी स्थिति में बच्चे बिना कुछ समझे यांत्रिक रूप से शिक्षक की बातों का दोहराव करते हैं। जैसे, अक्सर हिंदी भाषी क्षेत्रों में बच्चे अंग्रेजी की कक्षाओं में शिक्षक की बातों का दोहराव करते हैं।

Author Published on: February 8, 2019 5:20 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Express archives)

हाल ही में प्राथमिक शिक्षा से जुड़े एक सर्वेक्षण के दौरान राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के आदिवासी इलाके में स्थित एक स्कूल में कक्षा तीन के बच्चों से बातचीत करने का मौका मिला। दरअसल सर्वेक्षण के लिए कक्षा तीन के बच्चों की परीक्षा लेनी थी और उससे पहले बच्चों को परीक्षा से संबंधित निर्देश समझाने थे। निर्देश समझाते हुए मैंने महसूस किया कि बच्चे मेरी बात को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं। स्थिति को देखते हुए विद्यालय में मौजूद एक शिक्षक से मैंने इस बारे में बात की। परीक्षा के निर्देशों में लिखा था कि निर्देश और प्रश्न उस भाषा में समझाने हैं जिसमें बच्चे सहज हों और आसानी से समझ जाएं। लेकिन मैंने जब शिक्षक से बच्चों के संदर्भ में बातचीत की तो उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा- ‘बच्चों को हिंदी कम समझ आती है।’ मैं शिक्षक से मदद मांगता, उससे पहले शिक्षक ने कहा- ‘देखिए सर, ये अनपढ़ आदिवासियों के बच्चे हैं, इनको पढ़ना-लिखना नहीं आता है, ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पाते हैं’.. इत्यादि।

परिस्थिति को देखते हुए एक अन्य शिक्षक की मदद से बच्चों की परीक्षा ली। शिक्षक ने बच्चों को उनकी परिवेशीय भाषा में ही निर्देश दिए, प्रश्नों को समझाया और बच्चों द्वारा रखी गई जिज्ञासाओं पर अपने विचार रखे। परीक्षा के बाद जब शिक्षक के साथ मिल कर बच्चों द्वारा हल किए गए प्रश्न पत्रों की जांच की गई तो उम्मीद से बेहतर परिणाम पाया। अधिकतर बच्चों ने प्रश्नों का उत्तर देते समय अपनी परिवेशीय भाषा के शब्दों का चयन किया और सही उत्तर लिखा। यह विद्यालय के असंख्य उदाहरणों में से केवल एक है जो विद्यालय में परिवेशीय भाषा के महत्त्व पर बल देता है।

दुनिया में मनुष्य को सभी प्राणियों में सर्वोच्च माना गया है जिसकी एक अहम वजह भाषा है। मनुष्य ने भाषाई विकास के साथ अपनी संस्कृति विकसित की है। यही एक बड़ा फर्क है जो उसे अन्य प्राणियों की जमात से अलग करता है। अत: मनुष्य के सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाषा का अहम योगदान रहता है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चा सबसे पहले अपने परिवेश की चीजों से रूबरू होता है। उसके बाद धीरे-धीरे अवलोकन और अनुभवों से वह सीखता है। इसलिए बच्चे के सीखने में उसकी परिवेशीय भाषा का अहम योगदान रहता है, क्योंकि घर-परिवार में वह अपनी परिवेशीय भाषा के माध्यम से ही बातचीत करता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, कोई भी मनुष्य पहले अपने परिवेश की भाषा के आधार पर सीखता है, उसके बाद दूसरी भाषा के संपर्क में आता है।

अगर प्रारंभिक स्तर पर विद्यालय में शिक्षण एक ऐसी भाषा में होता है जिसे स्थानीय परिवेश, आदिवासी और अल्पसंख्यक बच्चे नहीं जानते हैं, तब ऐसी स्थिति में बच्चे बिना कुछ समझे यांत्रिक रूप से शिक्षक की बातों का दोहराव करते हैं। जैसे, अक्सर हिंदी भाषी क्षेत्रों में बच्चे अंग्रेजी की कक्षाओं में शिक्षक की बातों का दोहराव करते हैं। इस कारण बच्चों में भाषा की मदद से चिंतन क्षमता का विकास नहीं हो पाता है और फिर बच्चे अन्य स्कूली विषयों में भी पिछड़ जाते हैं। इसी कारण अनेक बच्चे पढ़ना-लिखना और अन्य स्कूली विषयों को सीखे बिना ही स्कूल छोड़ देते हैं। वैश्विक स्तर पर साक्षरता के क्षेत्र में होने वाले अनेक शोध बताते हैं कि विद्यालय में प्रारंभिक वर्षों में मातृभाषा में शिक्षण न होने से बच्चों के स्कूल छोड़ने की संभावना बढ़ जाती है, जबकि प्रारंभिक वर्षों में बच्चे की मातृभाषा में शिक्षण होने से स्कूल छोड़ने की दर में कमी आई है।

दरअसल, बच्चा जन्म के साथ ही परिवेशीय भाषा सीखना शुरू कर देता है और फिर परिवेशीय भाषा में बातचीत करने और चीजों को समझने-समझाने की क्षमताओं के साथ विद्यालय में दाखिल होता है। अगर बच्चे की क्षमताओं का इस्तेमाल पढ़ाई के माध्यम के रूप में मातृभाषा का चुनाव करके किया जाए तो इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं। इसलिए शिक्षकों से उम्मीद की जाती है कि वे उन सभी विषयों पर बातचीत करें जिनके बारे में बच्चों को पूर्वानुभव और ज्ञान होता है। अगर बच्चे अपनी परिवेशीय भाषा में शिक्षा ग्रहण करते हैं तो बच्चों के अभिभावकों को भी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में जुड़ाव का मौका मिलता है। यह बच्चे के बौद्धिक और सामाजिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण होता है।

प्रारंभिक वर्षों में शिक्षक की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि वह परिवेशीय भाषा में संवाद, चिंतन और विचार-विमर्श को दैनिक शिक्षण प्रक्रियाओं में शामिल कर बच्चों को प्रोत्साहित करे, ताकि प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण होने से पहले बच्चे शिक्षण की अन्य भाषाओं से परिचित हो जाएं और आगे की शिक्षा के लिए अपनी पसंद की भाषा में, अपनी पसंद की शिक्षा का चयन कर सकें।

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