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दुनिया मेरे आगे: मन हुनरमंद है

मन की सेहत एक जरूरी आदत होनी चाहिए, वैसे ही जैसे भूख लगने पर पेट की आग शांत करना। मन को रसमय रखना बहुत बड़ी बात है। संसार की चकाचौंध और भागमभाग के बीच मन की हर धड़कन को बोझिल होने से बचाए रखना है।

Author Published on: February 16, 2019 5:49 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

पूनम पांडे

कई बार ऐसा भी होता है कि किसी शोर या कोलाहल की जरूरत नहीं होती। बस, पूरी दिनचर्या किसी मौन वार्तालाप में बहुत ही खूबसूरती से गुजर जाती है। हमसे बोले बगैर ही उड़ती तितली या हवा की महक, धूप की तेजी, सांझ का रंग- सब कितना कुछ प्यारा-प्यारा बतिया कर चले जाते हैं। मन की अपनी रूमानियत ही अलग है। मन की एक खास प्रकृति, खास संरचना होती है। उसे हर समय शोर, कोलाहल, चीखना-चिल्लाना नहीं सुहाता। मन इन सबसे थक जाता है तो रोगी हो जाता है। उसके बाद मन को खामोशी, एकांत और हरियाली प्रफुल्लित कर देते हैं। हवा के अलमस्त झोके के साथ आया कोई फूल हमें किसी फिल्म को देखने की खुशी से भी ज्यादा खुश कर जाता है। मन को इन्हीं से तो प्यार होता है। दूर आसमान में फैले नीले सुकून में मन सांस लेता है और ऐसा सुख प्राप्त कर लेता है जो दिव्य है। मन की सेहत एक जरूरी आदत होनी चाहिए, वैसे ही जैसे भूख लगने पर पेट की आग शांत करना। मन को रसमय रखना बहुत बड़ी बात है। संसार की चकाचौंध और भागमभाग के बीच मन की हर धड़कन को बोझिल होने से बचाए रखना है। हो सकता है कि संसार में बुनियादी जरूरत सबकी अलग-अलग हों, लेकिन मन को नियंत्रित रखना तो फिर भी संभव है ना।

यहां पर आत्मानुशासन बहुत सहायक सिद्ध होता है। इस अनुशासन में मन को इतना समझदार होना ही चाहिए कि यह असली सौंदर्य बोध है क्या? महान साहित्यकार जार्ज बर्नार्ड शा साहित्य के साथ सौंदर्य-प्रेमी भी थे। उनका अधिकांश समय इन दोनों के अध्ययन में ही गुजरता था। एक बार उनका एक प्रशंसक उनसे मिलने आया। उस समय बर्नार्ड शा सौंदर्य का ही चिंतन कर रहे थे। प्रशंसक ने उनसे सवाल किया- हद है, आप सुंदरता के उपासक हैं, मगर आपके सामने रखी मेज पर गुलाब का फूल तक नहीं रखा है? यह सुन कर बर्नार्ड शा ने कहा- मुझे आपका सर बहुत पसंद आया, बहुत खूबसूरत है, अब क्या इसको काट कर मेज पर सजा लूं?

बर्नार्ड शा की बात सटीक थी। प्रशंसक शर्म से पानी-पानी हो गया। मशहूर रूसी-अमेरिकी उपन्यासकार, दर्शन शास्त्री और सिने पटकथा लेखक आयन रैंड का एक प्रसिद्ध कथन है कि ‘पावन आत्मा पर कभी शासन नहीं किया जा सकता।’ क्या हम इससे यह आशय लें कि सरल और पवित्र व्यक्तित्व अपनी गुणवत्ता के चलते दुनिया में सदैव पूजे जाते रहे हैं? लेकिन इससे भी बड़ी और गहरी बात गेटे ने कही है कि जो अपने मन की सरगम नहीं सुन सकता, वो बाहर क्या तो सुनेगा और समझेगा। किसी लेखक ने कहा है कि हमारा मन कोई आम का पेड़ तो नहीं है जिस पर हर साल रसीले फल लगते हैं और हम उसी क्षण उन्हें तृप्ति भर खा भी सकते हैं। कभी-कभी उलटा भी हो जाता है।

हम यश की कामना से मुक्त हों और असफल होने की तैयारी मन में हो तो ही काम में प्रवृत्त होना चाहिए और मगन होकर रहना चाहिए। संतुष्ट और सुकून भरा मन हर हाल में मगन रहने वाला होता है। दरअसल, मन के पास अलौकिक ताकत, अपार शक्ति भी संचित है। बस, इसे पहचानना पड़ता है। मन के लिए सब संभव है और इसका विस्तार सितारों तक है।

एक बार की बात है एक निराश और परेशान नवयुवक मनोवैज्ञानिक सलाहकार के पास आया। सलाहकार से बोला कि वह सभी की नजर में बिल्कुल निकम्मा और बेकार हो गया है, किसी काम का नहीं रहा। सलाहकार ने मुस्कुरा कर कहा कि ‘अरे… नहीं। इतनी जल्दी अपने बारे में फैसला मत लो। ऐसा करो, कल सुबह मेरे पास फिर से आओ, तब तक कोई तीन बेकार, बेकाम की चीजों का पता लगा कर मुझे बताओ। उसके बाद आपकी समस्या का समाधान खोजता हूं।’

नवयुवक को सलाहकार की बातों पर हंसी आ गई। यह तो बहुत आसान काम था। नवयुवक को रास्ते मे गोबर का ढेर मिला, कुत्ता मिला, झाड़ी मिली। उसकी खोज पूरी हो गई। नवयुवक की नजर में ये सब बेकार चीजें थीं। वह अगले दिन आया और सलाहकार को बताया कि गोबर, कुत्ता और झाड़ी किसी काम के नहीं। तब सलाहकार ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा- ‘मेरे दोस्त, गोबर से उपले बनते हैं, खाद बनती है, गोबर गैस बनती है। कुत्ता मानव का सबसे वफादार दोस्त है, घर की चौकीदारी करता है और झाड़ी फसल के लिए बाड़ बनाने के काम आती है, सूख गई तो र्इंधन भी है।’ नवयुवक यह सुन कर भौंचक्का रह गया। अब उसने हिम्मत बटोर कर कहा- मैं भी किसी का दोस्त बन सकता हूं। बाड़ की तरह सुरक्षा दे सकता हूं। उसका आत्मविश्वास जाग गया। वह समझ गया कि मन की ऊर्जा से वह भी कुछ सार्थक कर सकता है।

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