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दुनिया मेरे आगे: अनुभवों की राजनीति

जीवन में परिश्रम करने के दौरान कष्ट सहने के बाद ही अनुभव हासिल होते हैं। अनुभव जीवन की सर्वोच्च पूंजी है, यदि उन्हें हम समयानुरूप खर्च करें तो वह और भी बढ़ती जाती है। कबीर दास जी ने कहा भी है कि- ‘आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पूछै बात। सो गूंगा गुड़ खाई कै, कहे कौन मुख स्वाद।।’

Author February 13, 2019 5:05 AM
प्रतीकात्मक फोटोः इंडियन एक्सप्रेस

विलास जोशी

यह दुनिया और दुनियादारी बहुत ही अजीब चीज हैं। इसे समझने के लिए एक जिंदगी काफी नहीं हैं, क्योंकि हमारा जीवन दो हिस्सों में बटा है। एक ‘किताबी जिंदगी’ है तो उसका दूसरा हिस्सा ‘अनुभव की किताब’। किताबों से हमें विचार मिलते है, जबकि जिंदगी से अच्छे-बुरे अनुभव। हमें जीवन में अनंत अनुभव मिलते हैं। उनके कुल जमा जोड़ का नाम है- समझ या परिपक्वता। जिंदगी अनुभव से समझी या जानी जाती है। एक कृषि शास्त्री को उनके शोध ग्रंथ के आधार पर डाक्टरेट की उपाधि मिली। उसके बाद एक दिन वे एक खेत में गए और खेतिहर मजदूर से मिले। बातों-बातों में उन्होंने उससे यह मालूम कर लिया कि उस खेत में कौन-कौन से पेड़ हैं, किस पेड़ पर कौन सा फल लगता है, एक एकड़ जमीन में कितनी फसल उगती है आदि। फिर वे दूसरे गांव गए और एक किसान से मिले। किसान बोला- साहब, आप तो कृषि शास्त्री की उपाधि से विभूषित हैं और खेती-किसानी के बारे में सब कुछ जानते हैं, फिर आपके सामने मैं क्या चीज हूं भला! फिर वे एक खेत में गए और किसान से बोले- मुझे लगता है कि इस पेड़ पर आम नहीं लगेंगे। किसान बोला- साहब, यह तो मैं बहुत पहले से जानता हूं कि इस पेड़ पर आम नहीं लगेंगे क्योंकि यह पेड़ आम का है ही नहीं।

दरअसल, वे कृषिशास्त्री इसके पूर्व कभी खेत-खलिहानोें में गए ही नहीं थे। उनको ‘कृषि शास्त्री’ और ‘डाक्टरेट’ की उपाधियां किताबों के कारण मिली थीं। फिर इसके पूर्व तक उन्होंने अपनी जिंदगी सिर्फ विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में बिताई थी। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘ठोकर लगे और दर्द हो तभी मैं कुछ नया सीख पाता हूं’। सच तो अनुभव एक ऐसा रत्न है, जिसका मूल्य रुपए-पैसों और संपत्ति में कभी नहीं आंका जा सकता। जीवन में परिश्रम करने के दौरान कष्ट सहने के बाद ही अनुभव हासिल होते हैं। अनुभव जीवन की सर्वोच्च पूंजी है, यदि उन्हें हम समयानुरूप खर्च करें तो वह और भी बढ़ती जाती है। कबीर दास जी ने कहा भी है कि- ‘आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पूछै बात। सो गूंगा गुड़ खाई कै, कहे कौन मुख स्वाद।।’

जीवन के यथार्थ में व्यथा और वेदना जो अनुभव हमें दे जाती हैं, वह किसी भी विश्वविद्यालय की किताबों में पढ़ने को नहीं मिल सकती। पिछले दिनों मुझे एक व्याख्यान सुनने का अवसर मिला, जिसमें एक दिलचस्प कहानी सुनने को मिली। बनारस में हजारों साल पहले चलन था कि राजा जनता जनार्दन के बीच से ही चुना जाता था। बस शर्त यह होती थी कि पांच साल बाद उसे सिंहासन छोड़ कर नदी के उस पार के भयानक जंगल में चले जाना होता था। वहां जंगली जानवर उसे मार कर खा जाते थे। ये सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। कई लोग राजा बने, तय समय तक राजा का विलासी जीवन जिया और अंत में जंगली जानवरोें का शिकार बन उन्हें बेहद बुरी मौत मिली। इस क्रम में एक नाविक को राजा बनने का अवसर मिला। राजा बनते ही उसने पहले अपने पूर्व हुए राजाओं की व्यथा-कथा को समझा।

कहते हैं आदमी दूसरों के अनुभवों से भी बहुत कुछ सीख सकता है। उसने भी उनके दारुण अंत से अनुभव लेकर नदी पार के जंगल की सफाई कराने का काम शुरू किया। जब वह जंगल अच्छी तरह साफ हो गया तब उसने आम लोगों के लिए जीवन की आवश्यक वस्तुओं की वहां व्यवस्था भी करा दी। यह देख कुछ लोग वहां जाकर रहने भी लगे। जब उस नाविक का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसे नदी के पार जाना पड़ा, तब उसे एक नया बसा-बसाया राज्य मिला और वह वहां भी राजकाज करने लगा। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि उसने पिछले राजाओं से सबक सीख कर अपना और दूसरों का जीवन भी सुखमय कर दिया।

यदि हम अपने और दूसरों के कड़वे अनुभवों से सबक लेकर अपने जीवन में सुधार लाते हैं तो यह सब हमारे परिवार और समूचे समाज के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करता है। यदि हम अपने जीवन रूपी खेत में अनुभव के बीज बोएंगे, तो यकीनन खुशियों की फसल लहलहाएगी। अनुभव एक ऐसी अदृश्य दृष्टि है, जो हमें ठोकर लगने के पहले ही सचेत कर देती है कि आगे नुकीला पत्थर है जो हमें नुकसान पहुंचा सकता है। यदि हम अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं तो उसके लिए यह बहुत जरूरी है कि अपने जीवन उद्देश्यों और लक्ष्यों को अपने और दूसरों के अनुभवों की कसौटी पर उन्हें परखें। यही परख आपको अपने अंतिम ध्येय तक पहुंचाने में सहायक होगी। कबीरदास जी की यह बात अनुभव को लेकर ही कही होगी कि- ‘कागद लिखै सो कागदी की ब्योहारी जीव। आतम दृष्टि कहां लिखै जित देखै तित पीव।।’

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