ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: वसंत की अगवानी

यह जानना-देखना सुखद है कि अब प्राय: सभी शहरों-महानगरों में कहीं-न-कहीं, किसी फुटपाथ पर भी, भांति-भांति के छोटे बड़े गमले बिकते हुए दिखाई देते हैं। किसी साइकिल पर, या ठेले पर, माली फूल-पौधों को बेचने के लिए, कहीं रोपने के लिए तत्पर दिखाई पड़ते हैं।

Author February 9, 2019 5:34 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

मुझे फूल वाले परिसर बहुत पसंद हैं। फिर ये परिसर चाहे किसी मुहल्ले में घरों की कतार वाले हों या बहुमंजिले फ्लैटों वाले। बहुत बड़े आंगनों-बगीचियों वाले घरों में तो लाजिमी तौर पर पेड़-पौधे होते ही हैं और उनमें प्राय: एक बाउंड्री वाल भी होती है। पर हम यहां उन घरों की बात प्रमुख रूप से नहीं कर रहे हैं, हम तो कर रहे हैं उन घरों-फ्लैटों की बात जो अपेक्षाकृत छोटे हैं और जिनमें अपनी कोई छोटी-बड़ी बगीची होती नहीं है, जब तक कि वे ग्राउंड फ्लोर वाले ऐसे फ्लैट न हों, जिनके पिछवाड़े, फूल-पौधों के लिए कुछ जमीन होती है। बहरहाल, छोटे घरों और फ्लैटों में से चाहे छोटी-सी बगीची वाले घर हों या बहुमंजिले फ्लैट, फूल-पौधे प्राय: गमलों में ही उगाए जाते हैं। उन्हें किसी बालकनी, कोने या मुंडेर पर रखा जाता है और उन फूल-पौधों की चिंता भी की जाती है; पानी देने की, खाद की, दवाओं के छिड़काव आदि की ताकि फूल-पौधों में कीड़े न लगें। जाहिर है कि ये फूल-पौधे मनुष्य की उसी इच्छा का परिणाम हैं कि आसपास कुछ हरियाली हो, फूलों के रूप में कुछ रंग हों, और घर-फ्लैट की सौंदर्यबोधी भूख भी कुछ तो मिटे।

यह जानना-देखना सुखद है कि अब प्राय: सभी शहरों-महानगरों में कहीं-न-कहीं, किसी फुटपाथ पर भी, भांति-भांति के छोटे बड़े गमले बिकते हुए दिखाई देते हैं। किसी साइकिल पर, या ठेले पर, माली फूल-पौधों को बेचने के लिए, कहीं रोपने के लिए तत्पर दिखाई पड़ते हैं। उनके अपने कुछ बंधे हुए ग्राहक भी होते हैं। ऐसे पुष्प प्रेमी भी समाज में हैं ही, जो थोड़ी-सी जगह में भी बगिया बना लेते हैं, स्वयं जाकर किसी नर्सरी से फूल-पौधे लाते हैं, कई तो बाकायदा एक विशेषज्ञ की तरह की जानकारी भी रखते हैं, यही कि कौन-से फूल सर्दियों के हैं, कौन-से गर्मियों-वसंत के! वे उनके नाम-गुण आदि भी जानते हैं और उनके पास बाकायदा ऐसी पुस्तकें-पत्रिकाएं भी होती हैं जो फूल-पौधों-वनस्पपियों की जानकारी देने वाली होती हैं।

दिल्ली एनसीआर में भी एक सुखद बात यह लगती ही है कि न तो ऐसे लोगों की कमी है, न ऐसे प्रयत्नों की कि परिसर में घरों-फ्लैटों में तो फूल पौधे रहें ही, परिसर के छोटे-मोटे पार्क में भी रहें। नोएडा के जिस परिसर में मैं रहता हूं, वहां प्रसन्न करने वाले पेड़-फूल-पौधे हैं, और प्राय: सभी ने अपने-अपने फ्लैट में कुछ फूल-पौधे गमलों में रखे हैं, जो निगाह में आते हैं, या किसी के यहां जाने पर आपका ‘स्वागत’ करते हैं।

सोचता हूं, इस वृहद फूल-पौधों वाले संसार की बातें, हमारी चर्चा से प्राय: ओझल रहती हैं। इन फूल-पौधों की अनिवार्यता पर सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर जोर न दिया जाता हो, सो बात नहीं, पर हमने इनको लेकर, रिहायशी परिसरों में ऐसी औपचारिक-अनौपचारिक मंडलियां बनाई नहीं हैं, या बनाई भी हैं तो बहुत कम, जहां सामूहिक रूप से फूल-पौधों के ‘उन्नयन’ की बात सोची जाए, छुट्टियों में किशोर-किशोरियों को भी फूल-पौधों को उगाने की प्रक्रिया पर कुछ बताया जाए, कौन-सा फूल किस नाम से पुकारा जाता है, यह उन्हें मालूम हो, उन्हें ही क्यों बड़े-बुजुर्गों को भी बहुत-सी जानकारियां कहां होती हैं!

हमारे परिसर में एक कुमार साहब हैं, वे मालियों के साथ, किसी माली की तरह जुटे रहते हैं। कुछ उनके प्रयत्नों से भी यह संभव हुआ है कि हर फूल-पौधे के आगे, जो परिसर के प्रांगण में हैं- उसके मेन गेट पर, क्लब के गेट पर, लॉन पर, पार्क में- उन सबके नामों की तख्तियां लगी हैं, इससे स्वयं मुझे बहुत-सी जानकारियां हुई हैं। हमारे परिसर में ही, एक प्रकार साहब भी थे, वे परिचितों को, फूल-पौधे भी भेंट करते थे। सुबह उनके यहां मित्रों की एक छोटी-सी मंडली ही जुटती थी, चाय-चर्चा पर और अगर उस मंडली में सहसा कोई ऐसा परिचित-अपरिचित आ जाता था जो फूल-पौधों में विशेष दिलचस्पी दिखाता था, तो सब कुछ छोड़ कर वे उसी के साथ व्यस्त हो जाते थे। मराठी-मूल के थे। लखनऊ में रहे थे। अवकाश के बाद नोएडा आकर बसे थे। संगीत प्रेमी थे।

मैंने दो-एक बार जब किसी फूल-पौधे के बारे में जानकारी चाही तो, अगर उन्हें स्वयं वह मालूम न थी तो मिनटों में मुझे उपलब्ध कराई। हां, कितना बड़ा संसार है फूलों का, उनसे जुड़े शब्दों का, जिनका स्मरण मात्र मन को कुछ तो खिला ही देता है: ‘धीरे से आना बगियन में…’ का ‘बगियन’ हो, या क्यारी, फुलवारी या बाग-बगीची कुंज, पुष्प-लता, कलियां-पंखुड़ियां, तितलियां भ्रमर, कुसम-कानन!… भला कोई अंत है!

हम महानगर वासियों के आसपास अगर इन सबकी थोड़ी बहुत मौजूदगी न हो, इन सबकी थोड़ी-बहुत स्मृतियां, तो वह कितना नीरस लगने लगे। वसंत आ रहा है, उसकी अगवानी, भला हम फूलों के बिना कर सकते हैं, क्योंकि वह जितना अपने को धूप-हवा में व्यस्त करता है, उतना फूलों वनस्पतियों में भी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App