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आभासी दुनिया के अंधेरे

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक सेल्फियों फेसबुक, ट्विटर और वाट्सऐप पर लगातार संपर्क में रहने वालों ने एक तरह से खुद अपना जीवन आवेगपूर्ण मुहाने पर ला खड़ा कर दिया है। यह जीवन का वह मुकाम बन गया है, जहां मानसिक शांति के लिए कोई जगह नहीं है। एक तरह से हरेक व्यक्ति अपने साथ अपना ही ‘लेटर बॉक्स’ लिए घूम रहा है।

Author January 10, 2019 3:14 AM
तस्‍वीर का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए गया है।

रजनीश जैन

मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक सेल्फियों फेसबुक, ट्विटर और वाट्सऐप पर लगातार संपर्क में रहने वालों ने एक तरह से खुद अपना जीवन आवेगपूर्ण मुहाने पर ला खड़ा कर दिया है। यह जीवन का वह मुकाम बन गया है, जहां मानसिक शांति के लिए कोई जगह नहीं है। एक तरह से हरेक व्यक्ति अपने साथ अपना ही ‘लेटर बॉक्स’ लिए घूम रहा है। ‘पहुंचते ही खत लिखना’ या ‘अपनी खैर-खबर देते रहना’ या ‘खतो-किताबत करते रहा करो’ जैसे वाक्य अब कोई नहीं बोलता। नई पीढ़ी को तो यह भी नहीं मालूम कि इन शब्दों में कितनी आत्मीयता और आग्रह छिपा हुआ होता था। कुछ लिख कर उसके जवाब का इंतजार कितना रोमांचकारी होता था, अब बयान नहीं किया जा सकता। तकनीक ने कई ऐसी चीजों को बाहर कर दिया है जो आत्मिक लगाव की पहचान हुआ करती थीं। प्रेमियों के बीच होने वाले पत्राचार ने कई लोगों को साहित्यकार बना दिया था। अपने जज्बात कागज पर उड़ेल कर उन्हें प्रेमी तक पहुंचाने का रोमांच आज महसूस नहीं किया जा सकता। मिर्जा गालिब ने लिखा था- ‘कासिद के आते-आते खत इक और लिख रखूं, मैं जानता हूं वो जो लिखेंगे जवाब में’ या फिल्मी गीतों में प्रमुखता से नजर आई ‘लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में…’ या ‘मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर, तुम नाराज ना होना’ या ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है…’ जैसी भावनाएं आज न समझाई जा सकती हैं, न उनके समझने की उम्मीद की जा सकती है।

कई खूबियों वाले स्मार्ट फोन ने सबसे नकारात्मक असर जो समाज को दिया है, वह है आत्ममुग्ध और आत्मकेंद्रित स्वभाव। खुद की फोटो निकलना और उसे निहारना एक ऐसा जुनून बन चुका है जिसने व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना दिया है। अकेले मोबाइल फोन की वजह से हुई दुर्घटनाओं के इतने वाकये हो चुके हैं कि उन्हें अब सामान्य मान लिया गया है। अब स्मार्टफोन की वजह से हुए सामाजिक प्रभावों पर गौर करना जरूरी हो गया है। वह समय गया जब पूरा मोहल्ला व्यक्ति के संपर्क में रहता था, लेकिन चंद ‘लाइक’ और कुछ ‘कमेंट’ की चाहत ने उसे अकेलेपन की ओर धकेल दिया है। आभासी दुनिया के मित्र उसकी दुनिया बन गए हैं। बड़ी मित्र-संख्या का दम भरने वाले अधिकतर लोगों के सामने इस तरह की हास्यास्पद स्थिति निर्मित होती रही है, जब उनकी पोस्ट पर बिला नागा टिप्पणी करने वाले लोग उनके सामने से बगैर मुस्कराए गुजर जाते हैं। व्यक्ति क्षण-क्षण समाज से कटता जा रहा है, पर उसे अभी अहसास नहीं हो रहा है।

प्रदर्शन-प्रियता हरेक मनुष्य की जन्मजात सहज प्रवृत्ति रही है। सोशल मीडिया ने इसे विस्फोटक स्तर पर ला खड़ा किया है। नितांत निजी पलों को भी लोग बेखौफ इन वेबसाइटों पर साझा करने से नहीं हिचकिचाते। भले ही लोग उनके इस कृत्य पर मजाक बनाते हों। किसी अवसर विशेष पर कहीं और से आए संदेशों को फॉरवर्ड करते समय भी महसूस नहीं होता कि इन उधार की पंक्तियों में स्नेह और प्रेम की रिक्तता है।
उम्मीद थी कि स्मार्टफोन दूरियों को पाटने में मदद करेंगे, पर उनका उल्टा ही असर होता दिख रहा है। औपचारिकता ने सहजता को बेदखल कर दिया है। जन्मदिन हो या और कोई विशेष अवसर, अब लोग पहले से कहीं ज्यादा बधाइयां भेजते हैं, लेकिन यह काम भी केवल इसलिए किया जाता है कि सामने वाले को जताया जा सके कि हमें उसकी फिक्र है। सोशल मीडिया ने हमारे लिए इतने सारे ‘इमोजी’ और ‘स्टिकर’ विकसित कर दिए हैं कि हमें दिमाग को तकलीफ देने की जरूरत नहीं पड़ती। हर अवसर के लिए हमारे पास रेडीमेड शुभकामनाओं का भंडार है।

जरूरत से व्यसन बन चुके मोबाइल फोन का जीवंत उदाहरण देखना हो तो किसी रेल या बस यात्रा को देखिए। पिछले माह भोपाल से हैदराबाद की लंबी रेल यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ था तो स्मृतियों में दो दशक पहले इसी तरह दक्षिण भारत प्रवास की झलकियों की याद आई। उस दौरान हरेक यात्री के पास एक किताब जरूर होती थी। महज एक दशक पहले तक सफर में यात्री कुछ न कुछ पढ़ते नजर आते थे। अब शायद ही कोई ऐसा शख्स दिखता है जिसके पास किताब हो। अब हर झुकी गर्दन सिर्फ अपने मोबाइल में गुम नजर आती है। ट्रेन के बाहर बदलता परिदृश्य और प्रकृति किसी को भी नहीं लुभाती। कई अध्ययनों और शोध में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि आंखों के सामने से गुजरने वाले शब्द मस्तिष्क में चित्रों का निर्माण करते हैं। यह काम मस्तिष्क के विकास के लिए बेहद अहम है। दूसरी ओर नन्ही स्क्रीन पर नाचते चित्र सिर्फ आंखों को थकाने के अलावा कोई सकारात्मक काम नहीं करते। कम से कम मस्तिष्क की सक्रियता के लिए तो कुछ भी नहीं! कोई माने या न माने, मगर एक दिलचस्प जापानी हास्य कहावत को अमल में लाने का समय आ गया लगता है- ‘मोबाइल फोन ने आपके कैमरे को बाहर किया, आपके म्यूजिक सिस्टम को बाहर किया, आपकी किताबों को बाहर किया, आपकी अलार्म घड़ी को बाहर किया! प्लीज, अब उसे आपके परिवार और मित्रों को बाहर न करने दें!’

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