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धुएं का जहर

क्या आज पूरा विश्व प्रदूषण की मार नहीं झेल रहा है? देश की राजधानी दिल्ली विश्व भर में प्रदूषण को लेकर अपनी कितनी किरकिरी करा रही है, किसी से छिपा नहीं है। जहरीले धुएं की चादर में दिल्ली को लपेटने का जिम्मेदार डीजल, पेट्रोल से चलने वाली गाडियां और पड़ोसी राज्यों में जलने वाली पराली को माना गया।

Author December 27, 2018 4:28 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

अनीता यादव

पिछले दिनों दिल्ली की एक बस्ती में जाना हुआ। वहां अधिकतर घर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर दिल्ली में बसे दिहाड़ी मजदूरों के थे। घर के नाम पर छोटे-छोटे कमरे। कमरों के बाहर चूल्हा और उस पर रखी देगची यानी बर्तन में पकती साग-भाजी। चूल्हे से निकलता कसैला धुआं और धुएं के बीच चिमटे से आंच को कम या ज्यादा करती महिलाएं। दिन भर मजदूरी का काम करने के बाद शाम को रोज वे खुद को इसी धुएं में झोंके रखती थीं, खाना बनाने के लिए। गैस चूल्हा न हो, ऐसा नहीं था! किसी सरकारी योजना के तहत मिला गैस कनेक्शन था। लेकिन जब मैंने यह पूछा कि गैस होते हुए भी क्यों आखें धुएं में फोड़ रही हो, तो उनका जवाब किसी भी पर्यावरण-प्रेमी या चिंतक को परेशान करने वाला था। उन्होंने बताया कि गैस पर केवल चाय बनती है। आसपास लकड़ी और घास-फूस रूप में जलावन आसानी से मिल जाता हैं। इससे गैस बच जाती है। गैस इसलिए कम खर्च करनी पड़ती है कि भरे सिलेंडर की ऊंची कीमत सबके लिए वहन करना आसान नहीं रह गया है।

जिस गली से मेरा रोज ही निकलना होता है, वहां हर दस कदम पर बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं, ठेला या रेहड़ी वाले सर्दी शुरू होते ही कोयला, उपले या लकड़ी जला कर हाथ सेंकते दिखते हैं। ऐसे दृश्य दिल्ली की छोटी-बड़ी गलियों में आम हैं। सर्दियों में ऐसी खबरें भी आमतौर पर सुनने को मिलती हैं कि अंगीठी से कमरे को गरम करने के लिए उसे अंदर रख कर सोए लोगों की दम घुटने से मौत हो गई। ये घटना और दुर्घटनाएं हमारे आसपास चलचित्र-सी घटती रहती हैं, जिसे हम नजरअंदाज कर देते हैं। क्या आज पूरा विश्व प्रदूषण की मार नहीं झेल रहा है? देश की राजधानी दिल्ली विश्व भर में प्रदूषण को लेकर अपनी कितनी किरकिरी करा रही है, किसी से छिपा नहीं है। जहरीले धुएं की चादर में दिल्ली को लपेटने का जिम्मेदार डीजल, पेट्रोल से चलने वाली गाडियां और पड़ोसी राज्यों में जलने वाली पराली को माना गया। यह सच भी है और कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता। दिल्ली में भारी वाहनों की रोक से लेकर सड़क पर निजी वाहनों के मामले में सम-विषम प्रयोग हो या पराली जलाने को अपराध के दायरे में लाने के कदम- सब उठाए गए। कृत्रिम बारिश तक की चर्चा भी गरम रही।

इस सबके बावजूद प्रदूषण की परत उतरती नहीं दिखी। दिल्ली में प्रदूषण का एक बड़ा घटक ‘पीएम 2.5’ है। ये धूल और धुएं के छोटे-छोटे कण हैं जो हवा में घुल कर सांस के माध्यम से फेफड़ों में पहुंच कर सांस से जुड़ी समस्याएं पैदा करते हैं। इससे बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। ये ‘पीएम कण’ सीधे मनुष्य के फेफड़ों पर आघात करते हैं जो कहीं और से नहीं, बल्कि सड़कों पर वाहनों के समंदर के साथ-साथ हमारे घरों के चूल्हे-अंगीठी, आसपास होने वाले निर्माण कार्य, सूखी मिट्टी वाली जमीन पर झाड़ू लगाने आदि दैनिक कार्यों से भी उत्सर्जित होते हैं।

हम सबका प्रकृति से संबंध अटूट है। लेकिन इस संबंध को मात्र एक दिन के ‘पर्यावरण दिवस’ मनाने में बांध देना स्थिति को भयावह करने के लिए काफी है। प्रदूषण घटाने के वैश्विक स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी या सेमिनार आयोजित करने से भर से काम चलने वाला नहीं। समय आ गया कि कुछ बदलाव हमें जमीनी स्तर पर अपने दैनिक क्रियाकलापों में करने होंगे। अपनी आदतें बदलनी होंगी। छोटे बदलाव ही बड़े परिवर्तन के मूल में रहे हैं, इससे शायद हम सब वाकिफ होंगे। जाहिर है, हम सबको छोटे लाभ-लोभ त्यागने होंगे। वाहनों के बेलगाम इस्तेमाल से लेकर लकड़ी, कोयले जैसे र्इंधन का इस्तेमाल बंद करना होगा। इसके लिए लोगों को जागरूक करने में मीडिया और सिनेमा की बड़ी भूमिका हो सकती है। समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन और स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी भी लोगों के बीच जाकर सबको स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करें और यह बताएं कि धूम्रपान ही नहीं, जलावन से उत्पन्न जहर भी कितना खतरनाक है, जिसे रोज हम फेफड़ों में भर रहे हैं।

अब इस वक्तव्य यानी ‘अगली पीढ़ी को क्या देंगे’ से बात आगे बढ़ चुकी है। अब तो चिंता इस स्तर तक पहुंच चुकी है कि वर्तमान पीढ़ी ही कितने दिन सांस ले पाएगी! ऐसी कठिन स्थितियों में बाजार हमेशा फायदा उठाने की ताक में रहता है। पहले पानी बेचा ‘मिनरल वाटर’ को पेयजल रूप में घोषित कर। नतीजतन, घर-घर में ‘वाटर प्यूरिफायर’ यानी पानी को शुद्ध करने वाले यंत्र आ गए। आज स्वच्छ हवा के नाम पर ‘एयर प्यूरिफायर’ घरों की हवा को साफ करने का दावा करने के लिए बेचे जाने लगे हैं। यह सोचने की जरूरत है कि इन सबके पीछे कौन हो सकता है। अब भी अगर हम नहीं चेते तो समय को मुट्ठी से रेत की मानिंद फिसलने से कोई नहीं रोक पाएगा!

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