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भावों की भाषा

कहा जाता है कि भाषा मनुष्य को संपूर्ण चराचर जगत से अलग करती है। यह भाषा ही है जिसके चलते मनुष्य अपनी अलग संस्कृति विकसित कर पाया। भाषा के आधार पर ही मनुष्य को जानवरों से श्रेष्ठ समझे जाने की मान्यता रही है। ऐसे में जब भी अकेले बैठ कर पशु-पक्षियों को देखता हूं तो भीतर कहीं एक साथ सैकड़ों प्रश्नों से मुखातिब होना पड़ता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (File)

कहा जाता है कि भाषा मनुष्य को संपूर्ण चराचर जगत से अलग करती है। यह भाषा ही है जिसके चलते मनुष्य अपनी अलग संस्कृति विकसित कर पाया। भाषा के आधार पर ही मनुष्य को जानवरों से श्रेष्ठ समझे जाने की मान्यता रही है। ऐसे में जब भी अकेले बैठ कर पशु-पक्षियों को देखता हूं तो भीतर कहीं एक साथ सैकड़ों प्रश्नों से मुखातिब होना पड़ता है। आमतौर पर ऐसे अनुभव जीवन में सहज ही होते रहते हैं, जहां भाषा मनुष्य और जानवर के बीच का फर्क बताती है। गांवों में कई बार खेती को नुकसान पहुंचाने वाले आवारा पशुओं को बांध कर भूखा रखा जाता है। ऐसे में वे निरीह पशु किस तरह अपने मौन में छिपी पीड़ा को प्रदर्शन करते होंगे? या फिर पालतू पशुओं को चारा डालने में हुई देरी पर उनकी किस तरह की प्रतिक्रिया होती होगी? इसी तरह देखें तो मनुष्यों में कोई छोटा बच्चा भूख लगने पर किस तरह रोकर अपनी जरूरत की भाषा गढ़ता है?

दरअसल, जानवरों के बारे में अक्सर पढ़े-लिखे लोगों को यह कहते सुनता हूं कि जानवरों के पास कोई भाषा नहीं होती तो सोचता हूं कि हर कोई अपने घर तक आए जानवरों को दुत्कार देता है और पंछियों को उड़ा देता है, बिना यह सोचे कि ये सभी जगहें जिन्हें हम सभ्य कहे जाने वाले इंसानों ने कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया है। हो सकता है कि कभी यहां इन पशु-पक्षियों के पुरखों के आसरे रहे होंगे, वरना ये सब हमारे पास क्या लेने आते!

भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में शहरीकरण ने साहित्य में भी पशु-पक्षियों की जगह कृत्रिम उत्पादों को भरने के भरसक प्रयास किए हैं। किसी समय किस्से या कहानियों में इंसानों के साथ बाकी जीवों का आना-जाना भी सहज मगर विशिष्टता लिए होता था। अन्यथा प्रेमचंद के ‘झबरे’ और महादेवी के गिल्लू को कौन-सी भाषा आती थी? एक बार घर लौटते समय पिताजी के साथ आए एक नन्हें शावक की बरबस ही याद आ जाती है। उसने दूसरे आवारा जानवरों के आक्रामक रवैये से बचने के लिए पिताजी का आसरा लिया और इनके साथ घर तक आ गया। रास्ते में जब उसने अपनी भूख का इजहार किया होगा तो इन्होंने किसी ढाबे से लेकर उसे दूध पिला दिया था। पता नहीं, किन वजहों से उसे ‘जर्मन’ कह कर पुकारा जाने लगा। इसके बाद किसी की जुबान से अपना नाम ‘जर्मन’ सुन कर वह दौड़ा चला आता था। गांव भर के बच्चों के साथ ‘बच्चों’ की तरह खेलता और अभिभावक-सा खयाल रखता। कभी खेत में काम करने जाती हुई किसी स्त्री के साथ चला जाता तो कभी उधर से गुजरते किसी पुरुष के साथ लौट आता।

सोचता हूं कि जब वह पूरे गांव का चहेता बन गया, फिर भी उस पहले दिन की बात को उसने अपने जेहन में जैसे छिपा कर रखा होगा! यह हम कई बार देखते थे कि जब पिताजी के देर से आने पर भी वह उसी तरह उनके समक्ष प्रेम का प्रदर्शन करता था। दुत्कारने पर भी कभी उनके पांवों में लोटता, कभी सीधा खड़े होने की कोशिशें करता, तरह-तरह की आवाजें निकालता और अपने होने से कहीं ज्यादा वह उन्हें रिझाने का एक अवसर न छोड़ता। उसके रहते मां अपनी गाय, भैंस और बकरियों की रखवाली के लिए निश्चिंत रहती। कई बार हम लोग जब पढ़ने वापस शहर आते तो स्टेशन तक हमारे पीछे-पीछे चला आता, जैसे छोड़ने आया हो और उसे वापस जाने के लिए दुत्कारने पर भी एक न सुनता। सोचता हूं कि हर दुत्कार के पीछे छिपा प्रेम उसे कैसे समझ आ जाता था!
अपने जेहन में उठे अनगिनत प्रश्नों की कड़ी में आखिर प्रश्न यही होता की जब पशु-पक्षियों की कोई भाषा नहीं होती तो वे इतनी सहजता से कैसे अपने मनोभावों का प्रदर्शन कर जाते होंगे। लेकिन अगर घंटों तक पशु-पक्षियों के साथ वक्त बिताया जाए तो हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि सभ्य समाज में जानवर कहलाने वाले जीव अक्सर प्रेम की भाषा को इस कदर समझते हैं कि अपने प्रति प्रदर्शित प्रेम की पाई-पाई चुकाने को हर क्षण तत्पर रहते हैं।

हम देखते हैं कि यों तो कोई पंछी जरा-सी आहट होने पर उड़ जाता है, लेकिन अगर कभी किसी पक्षी को एकटक आंखों में आंखें डाल कर देखा जाए तो वह कुछ पलों के लिए उड़ना भूल कर अपने नए साथी के भावों की भाषा पढ़ने की कोशिश जरूर करता है। पिछले दिनों ‘जर्मन’ के गुजर जाने की खबर सुनी तो एक बार दिल बैठ गया। मगर जब पूरा किस्सा सुना कि किस तरह पास के शहर से आए हुए पशु चिकित्सकों ने बूढ़े होकर आंखों कि रोशनी चली जाने से मरणासन्न अवस्था में पहुंच चुके ‘जर्मन’ के लिए गांव के छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक को चिंतित पाया, तो महसूस हुआ की ‘जर्मन’ के प्रेम की भाषा भी पूरा गांव समझता था।

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