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मनोविज्ञान की छांव

भविष्य की जरूरतों को देखते हुए स्कूल-कॉलेजों में पारंपरिक विषयों के अलावा कई नए विषय भी पढ़ाए जा रहे हैं। लेकिन एक जरूरी विषय मनोविज्ञान हम सबसे छूटता रहा है। हालांकि इस विषय को स्वतंत्र रूप से पाठ्यक्रम के प्रमुख विषयों के तौर पर चुनने में सुविधा होती है और इसमें डिप्लोमा, डिग्री और पीएचडी तक किया जा सकता है।

Author January 1, 2019 4:25 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

एकता कानूनगो बक्षी

भविष्य की जरूरतों को देखते हुए स्कूल-कॉलेजों में पारंपरिक विषयों के अलावा कई नए विषय भी पढ़ाए जा रहे हैं। लेकिन एक जरूरी विषय मनोविज्ञान हम सबसे छूटता रहा है। हालांकि इस विषय को स्वतंत्र रूप से पाठ्यक्रम के प्रमुख विषयों के तौर पर चुनने में सुविधा होती है और इसमें डिप्लोमा, डिग्री और पीएचडी तक किया जा सकता है। लेकिन क्या यही समय नहीं है, जब इसे भी नैतिक शिक्षा, खेलकूद, पूरक भाषाओं के ज्ञान की तरह हरेक स्तर पर साथ-साथ पढ़ाया जाना शुरू कर दिया जाना चाहिए? नीतिशास्त्र (मॉरल साइंस) के रूप में एक पतली-सी पुस्तिका से हमारा परिचय प्रारंभिक शिक्षा के दौरान जरूर करवाया जाता है, जिसमें जीवन मूल्यों से लेकर सामान्य शिष्टाचार, लोक व्यवहार आदि जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों को कुछ समय में घुट्टी पिला कर पढ़ा भर देने की औपचारिकता संपन्न करा दी जाती है। अगर इस विषय को गंभीरता से लिया जाता तो समाज में आत्महत्या, निराशा, क्रोध, बलात्कार, शोषण, मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के समाचार आए दिन नहीं सुनने को मिलते।

हुआ कुछ यों कि शॉर्ट-कट में सफलता के लिए हमने ऊपरी ढांचा बहुत मजबूत और आकर्षक बना लिया, पर अंदर से सब खोखला रह गया। जरा-सी विपरीत परिस्थिति हमें हिला देती है, विवेक और पर्याप्त सोच-विचार और अच्छे-बुरे का अनुमान लगाए बिना हम जल्दबाजी में गलत और आत्मघाती निर्णय ले लेते हैं। यह दुखद है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने किताबी ज्ञान और स्वस्थ शरीर बनाने को तो प्राथमिकता में रखा, लेकिन मन की मजबूती के लिए कुछ खास नहीं किया गया। हमने शिक्षा के दौरान दुनिया भर के बारे में बहुत कुछ जान लिया, लेकिन खुद को नहीं समझ पाए। ऐसी स्थिति में दूसरे के मन और उनकी भावनाओं को समझने की क्षमता का विकास तो बहुत दूर की बात है।

हम अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग खुद तो प्रसन्न, संतुष्ट और खुश रहते ही हैं, अपने आचरण और व्यवहार से अन्य के चेहरों पर भी मुस्कुराहट बिखेर देते हैं। सामान्य से मनोविज्ञान का आम आदमी के जीवन में कितना महत्त्व है, उसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। समर्थ और संपन्न परिवार के एक बुजुर्ग हैं, जिनकी देखभाल के लिए सब लोग जुटे रहते हैं। समय पर दवा, खानपान का ध्यान, अच्छे कपड़े, पर्याप्त साफ-सफाई होने के बावजूद उनकी सेहत गिरती गई। अनेक डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी खास फर्क नहीं पड़ा। एक दिन उनके यहां एक पुराने मित्र मिलने आए तो खूब पुरानी बातें हुर्इं, ठहाके लगे। परिणाम यह रहा कि दूसरे दिन उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स में काफी अंतर देखा गया। अगर घर के सदस्यों को बुजुर्ग सदस्य की मन:स्थिति थोड़ी-बहुत भी समझ आए तो परिस्थिति काफी बेहतर हो सकती है। दवा के साथ कुछ पल सुख-दुख की बातें, कुछ हंसी-मजाक, यह सब कितना जरूरी है, हम सब जानते हैं। अगर हममें थोड़ी भी मनोविज्ञान की समझ है तो हम बीमार से कभी भी उसकी बीमारी संबंधी अधिक बातचीत नहीं करेंगे। उससे वैसी बात करेंगे, जिससे उसके भीतर उत्साह का संचार हो सके और वह अपने आपको बेहतर महसूस कर सके।

घर के बच्चों के साथ भी हमारा व्यवहार तभी सही हो सकता है, जब हमने थोड़ा-बहुत बाल मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की हो। अक्सर देखा गया है कि माता-पिता की नजर बच्चे के किसी एक या दो पक्ष पर केंद्रित हो जाती है। जबकि समय के साथ कई बदलाव बच्चे में आते रहते हैं। उसके मनोभावों को समझना और उसके दोस्त बन कर रहना, इसके लिए हमारे अंदर बच्चे के मन को समझने की क्षमता की जरूरत है। जब हम खुद को ही नहीं समझ पा रहे हैं, तब उसकी मन:स्थिति को समझना हमारे लिए बहुत कठिन होगा।

हमारे यहां संस्थाओं में मानव संसाधन विकास विभाग होता है, लेकिन बहुत कम ऐसी संस्थाएं हैं जहां यह विभाग कर्मचारियों संबंधी आंकड़ों के व्यवस्थापन के अलावा अपने कार्मिकों के मन की क्षमताओं के विकास के लिए कुछ अलग से प्रयास करता होगा। यह एक ऐसा विषय है, जिसमें लगातार सीखते और शोध करते रहने की जरूरत है। मनोविज्ञान की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थी भी अक्सर अपने ही मन की गुत्थी सुलझाने में सफल नहीं हो पाते। मनोविज्ञान हमें खुद से और लोगों से जोड़ने का माध्यम होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सोचने-समझने में दूसरों के कहे को ध्यान से सुनना भी बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। केवल पुस्तकें पढ़ कर हम मनोविज्ञान को समझ नहीं सकते। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अच्छे श्रोता भी बन सकें। साथ ही अपने भीतर की आवाज को भी गहरे उतर कर सुनें। दूसरे को जब सुनें, तब सिर्फ उसके शब्दों को नहीं, उसके अर्थों, कारण और परिस्थिति को भी सुनें, जो उसे यह सब कहने और करने को मजबूर कर रहा है। परिणामस्वरूप हमारे अंदर विवेकशीलता आएगी और सही निर्णय लेंगे और क्रोध, आक्रोश भी खत्म हो सकेगा।

अगर हम मनोविज्ञान की थोड़ी भी समझ रखते हैं तो उनकी परेशानियों को वास्तविकता से समझ कर उनकी हौसला अफजाई करेंगे। जब हम खुद के और दूसरों के मन को, उनकी परेशानियों को समझ लेंगे तो और अधिक स्वाभाविक हो सकेंगे। एक-दूसरे का बेहतर खयाल रख सकेंगे, मनुष्य को मनुष्य की तरह देख पाएंगे, जिम्मेदार बनेंगे, पूर्वाग्रहों से बचेंगे। शायद इसी तरह जीवन की कई मुश्किलों से भी बचा जा सकता है। बीता सो बीता, कम से कम अब नया हो!

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