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दुनिया मेरे आगे: धारणाओं की धुरी

कुछ समय पहले राजस्थान के टोंक जिले के एक राजकीय स्कूल में बच्चों द्वारा आयोजित बाल मेले में भाग लेने का मौका मिला। आमतौर पर स्कूलों में बाल मेला शिक्षकों की मदद से गणित, हिंदी, विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन आदि विषयों से संबंधित किसी एक मुख्य विषय या थीम को चुन कर आयोजित किए जाते हैं, जिनमें प्रयोग करना, पहेलियां सुलझाना, माथापच्ची और खेल आदि गतिविधियां शामिल होती हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Express archives)

कुछ समय पहले राजस्थान के टोंक जिले के एक राजकीय स्कूल में बच्चों द्वारा आयोजित बाल मेले में भाग लेने का मौका मिला। आमतौर पर स्कूलों में बाल मेला शिक्षकों की मदद से गणित, हिंदी, विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन आदि विषयों से संबंधित किसी एक मुख्य विषय या थीम को चुन कर आयोजित किए जाते हैं, जिनमें प्रयोग करना, पहेलियां सुलझाना, माथापच्ची और खेल आदि गतिविधियां शामिल होती हैं। लेकिन ये बाल मेला परंपरागत बाल मेलों से अलग था, जिसे शिक्षकों के साथ बातचीत करके बच्चों ने आपस में मिल कर आयोजित किया था। दरअसल, शिक्षकों और स्कूल के बच्चों ने मिल कर निर्णय लिया कि इस बाल मेले में वे क्या करेंगे। काफी विचार-विमर्श के बाद बच्चे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मेले में खाने-पीने से संबंधित भोजन की सामग्री बेचने की दुकान लगाएंगे और अन्य बच्चे अपनी रुचि के अनुसार सामग्री खरीदेंगे। फिर कुछ बच्चों ने समान बेचने और दुकान लगाने के लिए अपना-अपना नाम प्रस्तावित किया। सभी बच्चों की सहमति से अलग-अलग कक्षाओं से लगभग पच्चीस बच्चों को मेले में दुकान लगाने के लिए चुना गया और अन्य बच्चों को साफ-सफाई, सजावट और अन्य गतिविधियों का कार्य दिया गया।

स्कूल प्रधानाचार्य की तरफ से निर्देश दिया गया कि मेले वाले दिन सभी बच्चे बिना किताब-कॉपी के बस्ते के स्कूल आएं और मेले में खरीदारी करें। स्कूल में पढ़ने वाले लगभग तीन सौ पचास बच्चे मेले में आए और उनमें से बहुतों ने खरीदारी की। स्कूल के बच्चों ने बाजार से सामान खरीद कर खुद और घर वालों की मदद से भेलपुरी, चना-छोले, मूंगफली, पापड़ और गोलगप्पे आदि सामग्री तैयार करके अपनी-अपनी दुकान लगाई। कुछ बच्चों ने बाजार से सामग्री खरीद कर बेची। सभी ने दुकान से अपनी मनपसंद चीजें खरीद कर चाव से खाया। मेले के बाद बच्चों ने कमरों को सजाया और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। अंत में प्रधानाचार्य ने सभी बच्चों और शिक्षकों को एकत्रित करके मेले के अनुभवों पर विस्तार से चर्चा की। मसलन, मेले में किस बच्चे ने क्या सामान बेचा, समान बेच कर कुल कितने रुपए की बचत हुई, मेले में बेचने के लिए सामग्री कैसे तैयार की, सामान बेच कर उनको कैसा लग रहा है, क्या दुकान और रेहड़ी लगा कर सामान बेचना बुरा है, और मेले में सबसे ज्यादा और सबसे कम सामान किसने बेचा आदि। शिक्षकों और बच्चों ने प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा की, जिसके माध्यम से बच्चों के अंदर व्यापार, लाभ-हानि और इस तरह के काम के प्रति सम्मान और समझ बढ़ी।

मैंने जिज्ञासावश जब प्रधानाचार्य से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि आमतौर सब्जी बेचने, खाने-पीने की चीजें बेचने और अन्य ऐसे काम करना समाज में सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता है। अगर पढ़-लिख कर कोई व्यक्ति दुकान चलाने का काम करता है तो उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है, जबकि कोई भी काम बुरा नहीं है। स्कूल में भी बच्चों से इस विषय पर अधिक बातचीत नहीं की जाती है। इसलिए जाने-अनजाने में बच्चों के अंदर इस प्रकार की भावना विकसित हो जाती है कि इस तरह के काम करना ठीक नहीं है। बच्चों के अंदर इस प्रकार की भावना विकसित न हो, इसलिए उनके दिमाग में यह विचार आया कि बच्चे खुद इस प्रकार के कार्य करके देखें, ताकि उन्हें पता चल सके कि इन कामों में कितनी मेहनत करनी पड़ती है और ये भी जीविका के साधन बन सकते हैं। घर-परिवार, स्कूल और समाज में जब भी हम बच्चों से बातचीत करते हैं और प्रश्न पूछते हैं कि तुम पढ़-लिख कर क्या बनना चाहते हो, तब अक्सर बच्चों के इस तरह के जवाब आते हैं कि वह पढ़ लिख कर शिक्षक, इंजीनियर, डॉक्टर और पुलिस आदि बनना चाहते हैं। कोई बच्चा यह उत्तर नहीं देता है कि वह पढ़ लिख कर दुकान खोलेगा, सब्जी बेचेगा या फिर इस प्रकार का कोई अन्य काम करेगा।

बच्चे अपने आसपास के वातावरण से सीखते हैं। माता-पिता, शिक्षक और समाज के अन्य लोग बच्चों को अक्सर बताते हैं कि तुम्हें बड़े होकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और बड़ा अधिकारी आदि बनना है। गाहे-बगाहे घर-परिवार में बच्चों को ताना देते हुए कहा जाता है कि अगर तुम ठीक से पढ़े-लिखे नहीं तो फलां व्यक्ति की तरह मजदूर बनोगे, सब्जी बेचोगे और या फिर दुकान खोलोगे आदि। जब बच्चे बार-बार इस तरह की बातें सुनते हैं तो उनके मन में ऐसे कामों के प्रति हीन भावना विकसित होने लगती है और फिर धीरे-धीरे वे इन कामों को करने वाले लोगों को भी हीन भावना या हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। लेकिन अगर गौर करें तो दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जो खुद सब्जी, खाने-पीने की वस्तु बेच कर और दुकान आदि लगा कर अच्छे से अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। कुछ लोग छोटी से दुकान से शुरुआत करते हैं और धीरे-धीरे बड़े व्यापारी बन जाते हैं।

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