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बचपन और मासूमियत

ठीक ही कहा जाता है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं। मासूमियत, पवित्रता, सच्चाई और राग-द्वेष से परे साफ-सुथरा जीवन कहीं देखना हो तो बच्चों में ही मिल सकता है। अंगरेजी के प्रकृति प्रेमी कवि वर्ड्सवर्थ का विचार है कि बच्चा ही ईश्वर के सबसे करीब होता है और यही कारण है कि वह जन्म लेने पर स्वर्ग की मधुर स्मृतियों को याद करते हुए रोता है।

प्रतीकात्मक फोटो (सोर्स- एजंसी)

ठीक ही कहा जाता है कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं। मासूमियत, पवित्रता, सच्चाई और राग-द्वेष से परे साफ-सुथरा जीवन कहीं देखना हो तो बच्चों में ही मिल सकता है। अंगरेजी के प्रकृति प्रेमी कवि वर्ड्सवर्थ का विचार है कि बच्चा ही ईश्वर के सबसे करीब होता है और यही कारण है कि वह जन्म लेने पर स्वर्ग की मधुर स्मृतियों को याद करते हुए रोता है। वहां जो छूट गया उसकी याद उसे द्रवित करती हैं और भौतिक जीवन के समस्त आकर्षण ईश्वर की करीबी से दूर आ जाने की भरपाई नहीं कर पाते। उन्हें बनाते भी बड़े ही हैं और बिगाड़ते भी बड़े ही हैं। जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, लोगों के संपर्क में आता जाता है और जिस किसी के भी संपर्क में आता है उससे वह कुछ न कुछ सीखता है। शुरुआत घर से ही होती है और फिर आसपास के लोग, शहर और धीरे-धीरे यह सामाजिक दायरा बढ़ता जाता है।

बच्चा चूंकि जिज्ञासु होता है, अत: वह हरेक से कुछ न कुछ सीखता ही है फिर भले ही वह अच्छाई हो या फिर बुराई। समाज के संपर्क में आते-आते उसकी मासूमियत, सहजता, पवित्रता व जन्मजात सहृदयता समाप्त होती जाती है। उसका स्थान वे सारी चीजें लेती जाती हैं जिन्हें हम भौतिक सफलता के लिए जरूरी मानते हैं। इसी में क्रूरता, कुटिलता, जालसाजी, चालाकी, फरेब भी हैं और सफलता के लिए किसी भी हद तक जाने की जिद व कुछ भी कर गुजरने का जज्बा भी। माकूल परिवेश, वातावरण और परिस्थितियां मिलने पर सहानुभूति, सद्भाव, ईमानदारी, सही काम करने का साहस और त्याग की भावना भी अंकुरित होती है। पर ये भाव अपवाद स्वरूप भी जाग्रत होते हैं। तभी तो जॉर्ज बनार्ड शॉ ने स्कूल कॉलेज से पढ़ कर निकलने वालों को ‘स्कूल मेड मास्टर्स’ कहा था, यानी वहां से पढ़-लिख कर अच्छे विद्यार्थी व नागरिक नहीं, बल्कि शैतान निकलते हैं। बेशक यह उनकी अपनी शैली में आधुनिक चमक दमक पर टिप्पणी थी।

दो घटनाएं हैं करीब पच्चीस साल पुरानी। पंजाब व मध्य प्रदेश के बीच सोलह साल के लड़कों का मैच हो रहा था और दोनों ही टीमें खुल कर पूरी खेल भावना से खेल रही थीं। तभी देखा कि पंजाब के कोच बाउंड्री लाइन पर गए और वहां तैनात खिलाड़ी के द्वारा कप्तान को संदेश भेजने लगे। उनकी हिदायत के बाद कप्तान ने लेग स्टंप पर अटैक करना शुरू किया व वहां खास क्षेत्ररक्षक भी तैनात किए व शॉर्ट पिच गेंदें आनी शुरू हुर्इं। सारा खेल बदल गया। यानी कोच व उस्ताद लोग ही दांव-पेच सिखा कर अपना स्वाभाविक और नैसर्गिक क्रिकेट खेल रहे बच्चों का खेल बिगाड़ कर उसे हार-जीत प्रधान बना देते हैं और अच्छा खासा खेल पेशेवर राजनीति का शिकार हो जाता है।

दूसरी घटना कानून-व्यवस्था व न्याय से जुड़ी पुलिस से संबंधित है। हुआ यूं कि तब करीब बारह वर्ष की उम्र के मेरे बेटे के पासपोर्ट के फॉर्म की जांच-पड़ताल के लिए पुलिस थाने से फोन आया। वह स्कूल से लौटा और अपने मित्र के साथ थाने पहुंचा। वहां उससे कहा गया कि वह सौ रुपए दे क्योंकि कागज, पेन व फॉर्म भरने में खर्च तो आता ही है। उसे नहीं पता था और सौभाग्य से उसके पास सौ रुपए थे तो उसने दे दिए। वह घर लौटा और उसने जब यह बताया कि थाने पर उससे रिश्वत ली गई है। तब उसे पहली बार पता चला था कि रिश्वत क्या होती है। जिन सामाजिक बुराइयों के बारे में बच्चे जानते तक नहीं, उनके बारे में ऐसे नकारा लोग ही उन्हें बताते हैं। झूठ, फरेब, मक्कारी, जालसाजी के बारे में वे बड़ों से ही सीखते हैं और जब से मोबाइल और वह भी स्मार्ट फोन का चलन बढ़ा है, झूठ व झांसेबाजी की घटनाएं भी बढ़ी हैं।

बच्चे घर में व आसपास जैसा वातावरण, व्यवहार, बातचीत, तौर-तरीके व संस्कार देखते हैं, वही वे अपनाते लगते हैं। यदि वे लोगों को प्यार, दोस्ती, परस्पर सम्मान, दया, त्याग, सच, ईमानदारी व मेहनत करते हुए देखेंगे तो इन्हीं गुणों को अपनाएंगे और यदि बेईमानी, झूठ, फरेब, झांसेबाजी, गाली-गलौज, लड़ाई-झगड़े व नफरत के माहौल में बड़े होंगे तो वे भी इन दुगुर्णों के शिकार होंगे। यह जिम्मेदारी बड़ों की है कि वे उन्हें अच्छा व साफ-सुथरा व स्वस्थ वातावरण दें। उन्हें बनाते भी बड़े हैं और बिगाड़ते भी वे ही हैं। बच्चों को अपनी नैसर्गिक व जन्मजात मासूमियत, पवित्रता और शुचिता के साथ खुले वातावरण में बिना अनावश्यक रोक-टोक व दबाव तथा डर के किलक कर बड़ा होने दीजिए। दुनियादारी के दाव पेंचों से उन्हें दूर ही रखिए। बचपन निर्बाध बहती हुई पवित्र नदी के सदृश है। उसे निर्रथक बंधनों व बाधा से रोक कर प्रदूषित न करें।

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