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बाजार के बीच

बाजार की आक्रामकता जब शहरों में घुसना शुरू ही हुई थी, उसी दौरान मालूम हुआ कि सुपर मार्केट नाम का बाजार शुरू हुआ है और वहां सब कुछ मिलता है। मजेदार यह कि जो चीज चाहिए, उठा कर देख सकते हैं, अपने हाथों से ही चुन कर ट्रॉली में ले सकते हैं।

Author January 12, 2019 4:15 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फोटो सोर्स : Indian Express)

मनोज निगम

बाजार की आक्रामकता जब शहरों में घुसना शुरू ही हुई थी, उसी दौरान मालूम हुआ कि सुपर मार्केट नाम का बाजार शुरू हुआ है और वहां सब कुछ मिलता है। मजेदार यह कि जो चीज चाहिए, उठा कर देख सकते हैं, अपने हाथों से ही चुन कर ट्रॉली में ले सकते हैं। कोई देखने-बताने वाला नहीं। उससे पहले किराने की दुकान से सामान लेते थे। कोई सामान छूने पर दुकान वाला घूर कर देखा करता था। दिल्ली-मुंबई वाले आते थे तो सुपर मार्केट के बारे में बताते थे। एक उत्सुकता थी कि काश अपने शहर में भी इस तरह का कोई सुपर बाजार होता! शहर के पॉश इलाके में जहां एक ओर आइएएस, आइपीएस अधिकारियों, मंत्रियों की कॉलोनी है, दूसरी ओर व्यवसायियों और एचआइजी यानी उच्च आय वर्गीय लोगों के रिहायशी इलाके में प्रियदर्शिनी स्व-सेवा केंद्र। शुरुआती दौर में यहां की रौनक देखते ही बनती थी। तरह-तरह का सामान, विभिन्न तरह के ब्रांड। ट्रॉली में भरे सामान के साथ कोई परिचित दिख जाता तो शान बघारते कि हम तो यहीं से सामान लेते हैं। यही वह समय भी था जब झागल और प्याऊ हमारे आसपास से दूर होते जा रहे थे, बाजार की आक्रामकता बढ़ती जा रही थी और संयुक्त परिवार तेजी से टूटना शुरू हो चुके थे। वैसे भी इन इलाकों में लोग इतनी ऊंचाइयों पर थे कि नीचे का उनको कुछ दिखता नहीं था और वे देखना भी नहीं चाहते थे।

अब प्रियदर्शिनी स्व-सेवा केंद्र को प्रियदर्शिनी कहा जाने लगा है। उसमें गिनती के ही ग्राहक हैं और शायद ग्राहकों से ज्यादा वहां के कर्मचारी होंगे। प्रतियोगिता के दौर में कई सारे मॉल खुल चुके हैं जो लुभावने तरीके अपना कर ग्राहकों को लुभा रहे हैं और ग्राहक इस मॉल से उस मॉल में दौड़ लगा रहे हैं। प्रियदर्शिनी के काउंटर पर अधिकतर लोग बुढ़ापे की निशानियां लिए दिखते हैं। एक बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं। जाने कैसे उनको सेल्स यानी बिक्री विभाग में रखा गया है। वे बोलते समय थोड़ा हकलाते हैं। जब भी उनसे मिलना होता है, यही सोचता हूं कि ये ऊंचे-ऊंचे चमचमाते मॉल-बाजारों में, चिकने-चुपड़े ‘सेल्स’ के लोगों के बीच कोई हकलाने वाला या ‘असुंदर’ व्यक्ति नहीं दिखता। सामान बहुत सस्ता नहीं मिलता, लेकिन अच्छा मिल जाता है। उस सज्जन व्यक्ति को बरसों से देख रहा हूं। उनकी मुस्कुराट का कायल हूं। एक यह भी कारण है कि विभिन्न मॉलों में सस्ते सामान की उपलब्धता के बाद भी महीने में एक बार आ जाता हूं।

हर मौसम में चाहे गरमी हो, बारिश हो या ठंड। हर वक्त एक और तस्वीर दिखती है। इस बाजार के आंगन में ही एक प्याऊ है, जो कि कभी पानी की रही होगी। उसके पास एक चार पहियों की ट्रॉली है, जिसमें कुछ कपड़े और एक बर्तन होता है। एक कम्बल में से कुछ हरकत होती दिखती है तो मालूम होता है कि यह कोई व्यक्ति भी है। न तो प्याऊ पर किसी का ध्यान होता है, न इस वृद्ध दादी पर और न ही इस प्रियदर्शिनी मार्केट पर। बाजार इस शहर में अब धीरे-धीरे महानगर की शक्ल लेने को आतुर है। कहा जाता है कि महानगरों में कोई किसी का नहीं होता। प्रियदर्शिनी की बात अलग है। अक्सर देखता हूं कि यहां के कर्मचारी इस वृद्धा का बहुत ध्यान रखते हैं। जब भी मौका मिलता है तो देखता हूं कि मार्केट बंद होने से पहले ही इस दादी को प्याऊ के नीचे से उठा कर मुख्य दरवाजे के पास बने चबूतरे पर उनका बिस्तर लगाते हैं, पानी रखते हैं और फिर बड़े ही प्यार से उनको ले जाकर बैठा देते हैं, ताकि वे आराम से सो सकें। कोई दूसरा बाजार होता तो दूर-दूर तक इस भिखारन को रहने की तो क्या, खड़े होने की जगह देना भी न तो मालिक को सुहाता और न ग्राहकों को। कहते हैं, दादी सुबह के समय अपनी छोटे पहियों की ट्रॉली से पास के गुरद्वारे जाती हैं, फिर दोपहर तक यहां आ जाती हैं। किसी अनाथालय या वृद्धाश्रम में नहीं जातीं।

बताते हैं कि किसी गाड़ी वाले ने उनके पांव कुचल दिए थे। उनके पति की मौत भी यहीं आसपास हुई थी। इस जगह से इसी कारण उनको लगाव है और प्रियदर्शिनी के लोगों का उनसे लगाव है। यहां के कर्मचारियों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन इस वृद्धा की देखरेख में कोई कसर छोड़ते नहीं दिखते। मारकाट के इस महानगरीय दौर में इतनी संवेदनशीलता देखने को मिलती है तो लगता है अभी भी उम्मीद बाकी है। इसी कारण बार-बार यहां आने का मन करता है। यह जानते हुए भी कि यहां एमआरपी पर छूट नहीं मिलती। पूरा शहर नए साल की चकाचौंध में डूबा है, लेकिन मेरे लिए तो अब भी प्रियदर्शिनी ही सुपर बाजार है।

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