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वे पांच दिन

कुछ समय पहले दिल्ली के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों और पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में एक आंदोलन चला- ‘पैड्स अगेंस्ट सेक्सिज्म’। उद्देश्य था महिलाओं..

Author नई दिल्ली | August 29, 2015 11:17 am

कुछ समय पहले दिल्ली के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों और पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय में एक आंदोलन चला- ‘पैड्स अगेंस्ट सेक्सिज्म’। उद्देश्य था महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाओं और अंध-विश्वासों के खिलाफ जागरूकता लाना। साथ ही इस बारे में सामाजिक मानसिकता को चुनौती देना। यों इस आंदोलन की शुरुआत एक जर्मन महिला ने बड़े ही अनोखे अंदाज में की थी। उन्होंने सेनेटरी नैपकिनों पर यौन हिंसा और मासिक पूर्वग्रहों के खिलाफ संदेश लिखे और उन पैड्स को सार्वजनिक स्थलों पर लगा दिया।

सोशल मीडिया के इस दौर में यह घटना तेजी से चर्चित हुई। उनके संदेश दूर-दूर तक पहुंचे। दिल्ली में जामिया मिल्लिया और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने वहीं से इनके सूत्र पकड़े। जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय में लिंगभेदी सोच के खिलाफ पैगाम वाले सेनेटरी पैड्स पेड़ों पर चिपकाए गए। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्राओं ने ‘कम एंड सी माई ब्लड’ (आओ मेरा रक्त देखो) बैनर के साथ के दक्षिणी परिसर में जुलूस निकाला। उसके बाद यह मुद्दा चर्चित बना हुआ है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के उसी जुलूस में छात्राएं जिन दूसरे नारों वाले प्लेकार्ड लेकर चल रही थीं उनमें से एक पर लिखा था- किचन, टेंपल, पिकल। इन शब्दों के आगे ‘क्रॉस’ का निशान बना था। यानी उन पांच दिनों में इन तीनों की मनाही है। उस स्लोगन को देख कर मुझे सहसा वह माहौल याद आया, जिसमें हम भारतीय महिलाएं पलती-बढ़ती हैं। ठीक से होश संभालने के पहले ही हमें बताया जाता है कि उन पांच दिनों में ये स्थान और चीज हमारे लिए वर्जित हैं।

किशोरावस्था के दौरान यह तो नहीं बताया जाता कि उन दिनों में स्वच्छता और सेहत का खास खयाल कैसे रखना चाहिए, यह जरूर बताया जाता है कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए। हालांकि यह एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन हमेशा यही बताया गया कि इस बारे में खुले में बात नहीं की जाती। बताना ही हो, तो फुसफुसाहट में या फिर संकेतों में। इसके लिए कई ‘कोड वर्ड’ प्रचलित रहे हैं। मसलन, ‘डाउन हैं’।

हैरतअंगेज यह कि मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वास और वर्जनाएं शहरी परिवारों में भी उसी तरह घर बनाए हुए हैं, जैसाकि ग्रामीण या छोटे शहरों में। सेनेटरी पैड का चलन बढ़ने के साथ उच्च आय वर्ग की महिलाओं के लिए ये दिन कुछ सुविधाजनक हुए हैं, मगर निम्न आय वर्ग की और ग्रामीण महिलाओं के लिए ये दिन अधिक दुश्वारी के होते हैं। उन्हें इसके बारे में न तो पर्याप्त जानकारी होती है, न उनके पास इतने संसाधन हैं कि सेनेटरी पैड खरीद सकें। इस कारण वे सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली चीजें अपनाती हैं। मसलन, गंदे कपड़े, पुराने अखबार और यहां तक कि राख और रेत भी। नतीजतन, उनके लिए वे पांच सिर्फ कष्टप्रद नहीं होते, बल्कि संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों का कारण भी बन जाते हैं।

खुद अपने शरीर के बारे में जानकारी नहीं होने के कारण महिलाएं समाज-परिवार के बनाए अतार्किक कायदों को मानती चली जाती हैं। परंपरावादी लोग उन दिनों में स्त्रियों के लिए सब कुछ निषिद्ध करने के पक्ष में यह विचित्र तर्क देते हैं कि इसी बहाने महिलाओं को आराम मिल जाता है। सच यह है कि महिलाओं को चौका-बर्तन जैसे विभिन्न प्रकार के घरेलू कार्यों से उन दिनों में भी निजात नहीं मिलती। इसके बावजूद सवाल है कि क्या आराम देने के लिए बहाने या अतार्किक रिवाजों की जरूरत होनी चाहिए?

अनेक सर्वेक्षणों का निष्कर्ष है कि आज भी केवल दस-बारह प्रतिशत महिलाएं सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर पाती हैं। कुछ सरकारी योजनाओं के तहत खासतौर पर स्कूली बालिकाओं को मुफ्त नैपकिन बांटे जाते हैं, ताकि उन दिनों में वे कक्षाओं से गैरहाजिर न रहें। लेकिन यह उद्देश्य कितना सफल रहा है, इस बारे में हमारे पास कोई निश्चित जानकारी नहीं है। कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने भी सेनेटरी नैपकिन के प्रति जागरूकता लाने और उन्हें उपलब्ध कराने की दिशा में अपनी भूमिका निभाई है। साथ ही उन महिलाओं को मासिक धर्म की शारीरिक प्रक्रिया की जानकारी देने, इससे जुड़े अंध-विश्वासों से मुक्ति दिलाने और आम स्वास्थ्य के प्रति उन्हें सचेत करने के प्रशंसनीय प्रयास किए हैं।

मगर विश्वविद्यालयों में छात्राओं के आंदोलन का संदर्भ अलग है। उन्होंने मासिक धर्म से जुड़ी मानसिकता पर प्रहार किया है। उनका तरीका ‘शॉक थेरेपी’ यानी झटका देकर बुराई दूर करने का है। वे बताना चाहती हैं कि मासिक धर्म में शर्म या छिपाने की कोई बात नहीं है। यह किसी दूसरी शारीरिक प्रक्रिया की तरह है। अच्छी बात है कि आज की नवयुवतियां पुरानी सोच और जकड़न भरी मानसिकता से उबर रही हैं। बल्कि उस मानसिकता पर चोट कर रही हैं। यह हमारे समाज के लिए शुभ लक्षण है।

(पम्मी सिंह)

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