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नॉस्टेल्जिया की कीमत

हरजेंद्र चौधरी मेरे जन्म-ग्राम में कुछ ऐसी पुरानी परंपराएं और जगहें हैं, जो तरह-तरह की किंवदंतियों का हिस्सा रही हैं। वहां के एक पुराने तालाब को आज भी तीर्थ कहा जाता है। उसके बारे में किंवदंती है कि इस तालाब का संबंध पांडवों से रहा है और इसके नीचे गहराई में शीशे से निर्मित सीढ़ियां […]

Author March 24, 2015 08:46 am

हरजेंद्र चौधरी

मेरे जन्म-ग्राम में कुछ ऐसी पुरानी परंपराएं और जगहें हैं, जो तरह-तरह की किंवदंतियों का हिस्सा रही हैं। वहां के एक पुराने तालाब को आज भी तीर्थ कहा जाता है। उसके बारे में किंवदंती है कि इस तालाब का संबंध पांडवों से रहा है और इसके नीचे गहराई में शीशे से निर्मित सीढ़ियां दबी हुई हैं। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि ब्रिटिश शासन के दौरान इस तीर्थ पर हर साल मेला लगता था और दूर-दूर से स्नानार्थी धर्मलाभ के लिए यहां आया करते थे। दुर्भाग्य से एक बार यहां बाहरी और स्थानीय लोगों के बीच किसी बात पर लट्ठ बज गए और कानून-व्यवस्था की समस्या के मद्देनजर हिसार के अंगरेज कमिश्नर ने वार्षिक मेले पर प्रतिबंध लगा दिया। गांव की ‘प्राचीनता’ और ‘महानता’ का प्रमाण माना जाने वाला यह तीर्थ दशकों पहले ‘जोहड़’ में परिणत हो चुका, पर यह पुनरुत्थानवादी-सी किंवदंती जनमानस में जिंदा है कि यह गांव पांडव-कालीन है।

गांव के दक्षिणी छोर पर एक पुराना मंदिर है, जिसे ‘माता फूलम देवी का मंदिर’ कहा जाता है। हर वर्ष चैत्र माह के हर बुधवार को यहां मेला लगता है और आडंबरी धार्मिकता में होती जा रही बढ़ोतरी के इस दौर में खूब भीड़ जुटती है। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे सुदूर नगरों से, यहां तक कि विदेशों में रहने वाले अनेक मूल निवासी भी, लंबी-लंबी यात्राएं करके चैत के किसी एक बुधवार को यहां माथा झुकाने आते हैं।

जापान के ओसाका विश्वविद्यालय में अध्यापन-काल के दौरान भारत में छुट्टियां बिताते समय मैंने भी अपना एकाध बुधवार इस मेले के लिए खाली रखा था। मुझे अपने बचपन में देखे गए और आजकल के मेले में बहुत फर्क महसूस होता है। यह फर्क मेले के आकार-मात्र का न होकर आयोजकों और दर्शनार्थियों के व्यवहार में झलकती मानसिकता का भी है। आज श्रद्धा-स्थलों पर तामझाम और दौलत का वर्चस्व अनेक रूपों में दिखाई पड़ता है। शहरी ही नहीं, ग्रामीण लोगों के धार्मिक-सामाजिक व्यवहार में भी पैसे के लालच और बाजार के प्रभाव का प्रसार-विस्तार पूरी तरह झलकता है।

मंदिर में प्रसाद-स्वरूप पहले केवल पूड़े चढ़ते थे, अब मिठाइयां भी चढ़ती हैं। श्रद्धापूर्वक बनाए-चढ़ाए गए पूड़ों को मंदिर-प्रांगण में खुले में डाल दिया जाता है, जबकि लड्डू-शक्करपारे-बूंदी-बर्फी आदि मिठाइयों को पीपों में भर कर रखा जाता है। बाहर खेतों के बीच और सड़क के दोनों ओर की अस्थायी दुकानों-रेहड़ियों पर चीन-निर्मित खिलौने, चटपटे व्यंजन (चाउमिन और पिज्जा समेत) गीतों-भजनों वाले कैसेट और सीडी आदि मिलते हैं। वाहनों की संख्या अधिक होने से ट्रैफिक जाम और पार्किंग की समस्या हो जाती है। धक्का-मुक्की के बीच चोरी आदि की घटनाएं भी होने लगी हैं। युवा-शक्ति धींगा-मुश्ती में लगी है। कुश्ती-दंगल की परंपरा अब बूढ़ों की स्मृति में ही शेष है। मेले के आयोजन से जुड़े लोग माता-मंदिर के एक हिस्से में रसीद-बुक लिए बैठे होते हैं और दर्शनार्थियों को दान-चंदा देने के लिए प्रेरित करते रहते हैं।

नगरों-महानगरों में रहने वाले ग्राम-बंधु से वे बहुत ऊंची उम्मीद रखते हैं। कोई एक सौ एक रुपए दे तो ये कहेंगे कि एक कट्टा सीमेंट तो कर दो! ग्यारह सौ रुपए देने वाले से एक ट्रक र्इंटों का दान करने का आग्रह करेंगे। सुनने में लगेगा कि यह आग्रह रुपए-पैसे के लिए नहीं, बल्कि मंदिर और दर्शनार्थियों की सुविधाओं के विस्तार के लिए है। इस विस्तार पर कितना धन खर्च हुआ या होगा, इस हिसाब-किताब की कोई पारदर्शी व्यवस्था नहीं है।

साल-दो साल में एकाध दिन के लिए अपने जन्म-ग्राम आने वाले प्रवासी अपनी ग्राम-देवी की कृपा-प्राप्ति के लिए और अपनी जड़ों के खिंचाव से खिंचे चले आते हैं। ‘नॉस्टेल्जिया’ की हदें छूती यह ‘जड़-लालसा’ आज तक ‘अहा ग्राम्य-जीवन…’ वाले छायावादी भाव-बोध के धुंधले दायरों से बाहर नहीं निकल पाई है। ‘नॉस्टेल्जिया-भाव’ इस तथ्य से अछूता बना रहता है कि परिवर्तन (और बाजार भी) एक ही जगह घटित नहीं होता, चतुर्दिक व्यापता है। ‘गो-धूलि’ दूर से देखने में स्वर्णिम लगती है, उसके बीच जाने पर वही धूल नाक में गुदगुदी और फेफड़ों में खलबली मचा देती है।

यह किसी एक गांव की बात न होकर हिंदी-क्षेत्र के बदलते देहात की कहानी है। बाहर जा बसे मूल-ग्रामीणों की पैतृक संपत्ति के रूप में गांव में जो घर और जमीनें हैं, उन्हें आमतौर पर उनके ग्रामवासी भाई-बंधु या अड़ोसी-पड़ोसी इस्तेमाल करते हैं। एकाध दिन के लिए आने वाले ये प्रवासी अपने ग्रामीण भाई-बंधुओं और अड़ोसी-पड़ोसियों का अस्थायी सेवा-भाव देख कर चुपचाप लौट जाते हैं। उनके घरों-जमीनों का ‘इस्तेमाल’ साल-दर-साल बदस्तूर चलता रहता है। मंदिर वाले हिसाब-किताब की तरह ही खेती-बाड़ी का हिसाब-किताब भी अस्पष्ट बना रहता है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली पहली शहरी पीढ़ी (विदेशवासी अधेड़ पीढ़ी भी) अपनी चटकती-गलती-उखड़ती जड़ों से जुड़ी रहने के चक्कर में ‘नॉस्टेल्जिया’ की कीमत चुकाती रहती है।

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