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हेमंत कुमार फ्रांस की निवासी और जर्मनी की शोधार्थी कैमिली बुआ इन दिनों बिहार के दौरे पर हैं। वे बिहार में पलायन के इतिहास पर शोध कर रही हैं। कुछ दिन पहले पटना में जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान के दफ्तर में कैमिली से मुलाकात हुई। संस्थान के निदेशक श्रीकांत ने हमारा […]

Author April 10, 2015 11:15 PM

हेमंत कुमार

फ्रांस की निवासी और जर्मनी की शोधार्थी कैमिली बुआ इन दिनों बिहार के दौरे पर हैं। वे बिहार में पलायन के इतिहास पर शोध कर रही हैं। कुछ दिन पहले पटना में जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान के दफ्तर में कैमिली से मुलाकात हुई। संस्थान के निदेशक श्रीकांत ने हमारा परिचय कराया। कैमिली ने हमें ‘नमस्कार’ कहा। वे हमसे हिंदी में बात कर रही थीं, लेकिन हमारे मुंह से अंगरेजी निकल रही थी। हम इस उम्मीद में थे कि कैमिली की हिंदी के सीखे हुए कुछ शब्दों का भंडार खत्म होने ही वाला है, फिर वे अंगरेजी में बोलने लगेंगी! बातचीत के बीच में श्रीकांतजी ने पूछा- ‘कैमिली! लगता है आपने हिंदी सीख ली है।’ उन्होंने सकुचाते हुए कहा कि हां, थोड़ी-थोड़ी सीखी है। कैमिली का जवाब सुन कर मैंने कहा- ‘आप तो अच्छी हिंदी बोल रही हैं!

कितने दिनों में और कहां सीखी?’ कैमिली ने बताया कि मैंने जर्मनी में छह महीने में हिंदी बोलना और लिखना सीख लिया। हमने चौंक कर कहा- ‘कमाल हो गया! आपने महज छह माह में लिखना-बोलना सीख लिया!’ कैमिली ने हंसते हुए बताया कि हिंदी के बिना यहां काम कैसे करती, इसलिए सीख लिया। हमने कैमिली से कहा कि आपकी हिंदी, हम हिंदी वालों से कमजोर नहीं है।

इस पर कैमिली ने कहा- ‘आप लोग मेरी हिंदी की तारीफ कर रहे हैं, मुझसे हिंदी में बात कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली में अपने काम के सिलसिले में जितने लोगों से मेरा मिलना हुआ, उनसे मैं हिंदी में बात कर रही थी और वे तमाम लोग मुझसे अंगरेजी बोल रहे थे।’ यह सुन कर कमरे में मौजूद सभी हंसे। लेकिन इस हंसने के पीछे थोड़ी शर्मिंदगी भी थी। हमने कहा- ‘धौंस जमाने के लिए यहां लोगों को बिना जरूरत के भी अंगरेजी बोलना जरूरी लगता है।’

वे दक्षिणी फ्रांस के शहर मर्सेय की रहने वाली हैं। हमारे आग्रह पर हमारी सुविधा के लिए उन्होंने शहर का नाम अंगरेजी और हिंदी में लिख कर बताया। हमारे साथ बैठे गौरव ने कैमिली से जानना चाहा कि क्या फ्रांस में भी लोग अपने बच्चों को अंगरेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाना पसंद करते हैं! कैमिली ने हंसते हुए कहा- ‘नहीं! हमारे देश में पढ़ाई-लिखाई फ्रेंच भाषा में ही होती है। सच बताऊं तो फ्रेंच और अंगरेजी के बीच अघोषित जंग-सी चली आ रही है।’ कैमिली के मुंह से ‘जंग’ सुन कर श्रीकांतजी ने कहा- ‘क्या आपको पता है, जंग हिंदी नहीं, उर्दू का शब्द है?’ कैमिली ने जवाब दिया- ‘मैं हिंदुस्तानी बोल रही हूं, जिसमें हिंदी है और उर्दू भी।’ कैमिली का जवाब सुन कर ठहाका लगा।

कैमिली जर्मनी के गॉटिंगन विश्वविद्यालय में सीईएमआइएस यानी आधुनिक भारतीय अध्ययन केंद्र की छात्रा हैं और रवि आहूजा इनके रिसर्च गाइड हैं। अपने शोध के सिलसिले में उन्हें गया, जहानाबाद, मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी जाना है। मौजूदा दौर में पलायन के आयाम पर चर्चा छिड़ी तो कैमिली ने कहा कि मैं तो पलायन के इतिहास पर काम कर रही हूं, इसलिए वर्तमान में हो रहा पलायन मेरा विषय नहीं है! कैमिली जब पिछले साल मार्च में पटना आई थीं, तब वे रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में ठहरी थीं! सुविधा और सुरक्षा के लिहाज से श्रीकांतजी के आग्रह पर उन्हें एएन सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के छात्रावास में रियायती दर पर कमरा मिल गया था। इस बार भी वे वहीं टिकी हैं।

हमारे साथ बैठे फैयाज ने कैमिली से पूछा कि क्या आपको हमारे यहां का खाना पसंद है? कैमिली ने कहा कि हां, मुझे यहां का खाना अच्छा लगता है। फैयाज ने कहा कि यहां तो खाना में काफी मसाले होते हैं, आप कैसे खाती होंगी तो उन्होंने जवाब दिया कि सब चलता है। कैमिली का जवाब सुन कर गौरव ने धीरे से मुझे कहा- ‘एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के मेस का खाना अच्छा नहीं होता है।’ मैंने उसे सफाई देने की कोशिश की कि वहां के खाने में तेल-मसाला कम रहता है। शायद इसी वजह से कैमिली को अच्छा लगता है। दरअसल, कैमिली को सुविधाओं से नहीं, अपने काम से मतलब है। इसलिए उन्हें खाने या ठहरने की जगह को लेकर कोई शिकायत नहीं है।

हम सबको कैमिली बहुत ही आत्मीय और अपने ही घर-परिवार के बच्चों की तरह निश्छल और जिज्ञासु लगीं। हमने उनसे उनके परिवार के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया- ‘मां और एक बड़ा भाई वैज्ञानिक है। छोटा भाई इंजीनियर है।’ मैंने बीच में ही कहा कि अगर हम आपकी जगह होते तो कहते कि मेरा बड़ा भाई और मेरी मां साइंटिस्ट हैं। ‘सांइटिस्ट’ बोल कर हम सामने वाले के सिर पर चढ़ने की चाहत रखते हैं और आप ‘वैज्ञानिक’ बता कर यहां के लोगों के दिल में उतरने की कोशिश करती हैं! उनसे बातचीत चल रही थी और हम अपने आईने की ओर देखने पर मजबूर हो रहे थे!

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