ताज़ा खबर
 

मेरी कमाई

राजकिशोर जब से मैंने सांस्थानिक नौकरियां छोड़ीं या कुछ छूट गर्इं, तब से मेरी कमाई मुख्यत: पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों से ही होती रही है। मेरी रचनाएं छपती देख कर कुछ दूर-मित्र समझते हैं कि मेरी मासिक कमाई लाखों में है। काश, ऐसा हो पाता। तब मैं जब भी कोलकाता जाता, विमान से जाता। हिंदी जगत […]

Author July 27, 2015 1:57 PM

राजकिशोर

जब से मैंने सांस्थानिक नौकरियां छोड़ीं या कुछ छूट गर्इं, तब से मेरी कमाई मुख्यत: पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों से ही होती रही है। मेरी रचनाएं छपती देख कर कुछ दूर-मित्र समझते हैं कि मेरी मासिक कमाई लाखों में है। काश, ऐसा हो पाता। तब मैं जब भी कोलकाता जाता, विमान से जाता। हिंदी जगत में व्यापकता है, गहराई नहीं है। समाचारपत्रों के लिए लेख जितने श्रम और मनोयोग से लिखे जाते हैं, उनकी तुलना में पारिश्रमिक जीरे के बराबर मिलता है। शायद इसीलिए भारत की आम मानसिकता यह है कि जो शख्स किसी संस्था से संबंधित नहीं है, वह दो कौड़ी का है। शायद इसलिए कुछ लेखकों और पत्रकारों ने स्वयं संस्था बनने का निर्णय किया और उनमें से अनेक सफल भी हुए।

जीवन ‘दर्द अब जाके उठा, चोट लगे देर हुई’ का अनवरत सिलसिला है। कई बार ऐसा भी होता है कि चोट लगी पर दर्द उठा ही नहीं। या चोट नहीं लगी, फिर भी दर्द से कराहते फिर रहे हैं। चोट का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह काल्पनिक भी हो सकती है। इसी काल्पनिक चोट से हितोपदेश का सिंह, सियार द्वारा यह बताने पर कि कुएं में एक और सिंह छिप कर बैठा है, कुएं में कूद गया था। मैंने अनेक लेखकों और पत्रकारों को काल्पनिक कारणों से दुखी होते हुए देखा है। मुझे संतोष है, मैंने ऐसा कोई दर्द नहीं पाला।

हम जितना यथार्थ में जीते हैं उससे ज्यादा कल्पना में, यह मान कर मैं कहना चाहता हूं कि ‘रविवार’ की नौकरी छोड़ कर अगर मैं कोलकाता के एक बैंक में राजभाषा अधिकारी हो गया होता- जिसका प्रस्ताव मुझे मिला था, तो मेरा जीवन ज्यादा सुखी होता। थोड़ी बोरियत तो होती, पर पत्रकारिता भी 1990 के बाद बोरियत-हीन कहां रह गई! पैसा अच्छा मिलता और अवकाश इतना कि अभी तक मैंने जितना लिखा है, मेरे पाठक क्षमा करें, उससे दुगुना तो लिखता ही। अभी पेंशन के रूप में निरंतर श्रम मिला हुआ है, तब निर्वाह योग्य रकम भी मिलती। यह और बात है कि इसका मुझे गम नहीं है, पर गम न होने से यथार्थ बदल नहीं जाता। यह तसल्ली जरूर है कि अब तक का जीवन अकारथ नहीं गया। जो मिला, उससे मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं।

लेकिन पराड़करजी की तरह मैं भी यह कह जाना चाहता हूं कि मेरी पीढ़ी के पत्रकारों को जितनी स्वतंत्रता मिली और हम जिस ठेठ आत्मसम्मान के साथ जिए, वह वर्तमान पीढ़ी को बहुत कम उपलब्ध है और आगे जो स्थितियां आने वाली हैं, उनमें यह बहुत दुर्लभ होगा। अखबार जो है सो आलू-प्याज की तरह बिक रहे हैं और सीईओ बन जाने से पत्रकारों की बांछें खिल जाती हैं। ऐसे वातावरण में ही संभव है कि हिंदी का आखिरी संपादक विदा हो रहा है, लेकिन पत्रकारिता के आचार्य इस खोज में लगे हुए हैं कि हिंदी का पहला संपादक कौन था। इसके बावजूद जो आ रहे हैं, उनके लिए यह शुभेच्छा कि वे खिलें और हम देखें।

मैं जिस कमाई की बात कर रहा था, वह अधूरी रह गई। मैं यही सोचता था कि सरस्वती की आराधना से जो आय होती है, वह दुनिया की सबसे पवित्र कमाई है। पत्रकारिता में कई दशक बिताने के बाद अब यह दावा मैं नहीं कर सकता। यह कमाई वास्तव में काले धन का एक तुच्छ-सा हिस्सा है जो इसलिए दे दिया जाता है कि अखबार के खाली पन्ने नहीं बिक सकते। मार्क्स और गांधी की इस राय में बहुत दम दिखाई पड़ता है कि जीवन जीने के लिए जितना आवश्यक है, उसके अतिरिक्त सारी कमाई पाप की कमाई है।

लेकिन परिप्रेक्ष्य को इतना विस्तृत न किया जाए, तब भी यह तो कहा ही जा सकता है कि जिस पैसे से अखबार निकलते हैं और किताबें छपती हैं, वह सारी की सारी उजली कमाई नहीं होती। दरअसल, उद्योग की परिभाषा ही यह है- वे सारे प्रयत्न जिनसे दो का चार किया जा सके। कुछ उद्योगों में चार की जगह दस-पंद्रह-बीस भी होता है। अखबार छापना भी एक उद्योग है और उसकी कमाई का जो थोड़ा-बहुत अंश लेखकों और पत्रकारों को मिलता है, वह उतना ही होता है जितना शेर द्वारा किसी जानवर को मार गिराने के बाद लोमड़ी और सियार को मिलता है। ध्यान देने की बात है कि जंगल में लोमड़ी और सियार ही बुद्धिजीवी माने जाते हैं।

लेकिन जीविका कभी भी अपने हाथ में नहीं होती, उनके हाथ में होती है जिनका उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण है। कोई भी जीविका इसलिए अनैतिक नहीं होती कि वह वास्तव में आपत धर्म होती है। पूंजी के दानव को हम सभी अपने-अपने सिर पर ढोते हैं। महत्त्व इस बात का है कि हमने सिर्फ कुलीगीरी की या कुछ और भी करते रहे।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App