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बगैर ताज के ताजपोशी

श्रीप्रकाश दीक्षित एक तरफ आम भारतीय इसे चुनावी जुमला न मान कर अच्छे दिनों की आस में मरा जा रहा है, तो दूसरी ओर अंगरेजों के जमाने के राजे-रजवाड़े उन सुनहरे दिनों की याद में करोड़ों रुपए फूंक रहे हैं। लगता है वे सुनहरा अतीत भुला नहीं पा रहे, या भुलाना नहीं चाहते। तभी दुनिया […]

Author June 22, 2015 5:57 PM

श्रीप्रकाश दीक्षित

एक तरफ आम भारतीय इसे चुनावी जुमला न मान कर अच्छे दिनों की आस में मरा जा रहा है, तो दूसरी ओर अंगरेजों के जमाने के राजे-रजवाड़े उन सुनहरे दिनों की याद में करोड़ों रुपए फूंक रहे हैं। लगता है वे सुनहरा अतीत भुला नहीं पा रहे, या भुलाना नहीं चाहते। तभी दुनिया की सबसे बड़ी लोकशाही में मैसूर जैसा शाही नाटक होता रहता है। कर्नाटक की इस पूर्व रियासत में कथित सत्ताईसवें राजा की ताजपोशी का तमाशा हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास उड़ाता नजर आता है। कहते हैं, इस परिवार के पास दस हजार करोड़ की संपत्ति है।

मैसूर रियासत के पूर्व राजा जब बिना औलाद जाते रहे तो उनकी विधवा ने रिश्तेदार को गोद लेकर ताजपोशी का तमाशा किया, जहां चालीस पुजारियों ने घंटों राजतिलक की रस्म अदा की। बड़ा सवाल है कि हमारे यहां इंग्लैंड जैसी दिखावटी राजशाही भी नहीं है, फिर इस राजतिलक की इजाजत कैसे दी गई? कर्नाटक के वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री की इस खर्चीले दरबारी आयोजन में मौजूदगी ही इसका जवाब है। मजे की बात है कि जिस महल में यह तमाशा हुआ, उसे कर्नाटक सरकार कब्जे में लेना चाहती है और इसके लिए मुकदमेबाजी हो रही है। मुख्यमंत्री की हाजिरी से साफ है कि मुकदमे का क्या हश्र होना है…!

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इंदिरा गांधी ने प्रिवीपर्स के शाही नाम से इन पूर्व राजे-रजवाड़ों को मिलने वाली मोटी पेंशन और राजसी नंबर प्लेट लगाने जैसे विशेषाधिकार एक झटके में खत्म कर दिए थे। इससे शाही घरानों को झटका जरूर लगा, पर अकूत दौलत वाले हैदराबाद, कश्मीर, ग्वालियर, जयपुर, जोधपुर, मैसूर और बडोदरा आदि के पूर्व राजाओं पर आर्थिक मार नहीं पड़ी। दरअसल, राजशाही के अवशेष जैसे बड़े-बड़े भव्य राजमहल और शाही संपत्ति इन लोंगों के पास रहेगी तब तक ऐसे तमाशे होते रहेंगे। राघोगढ़ जैसी बेहद छोटी रियासत के दिग्गी राजा मध्यप्रदेश जैसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री रहे हैं। उनके बेटे की शादी के तीन समारोह हुए। पहला, दिल्ली के पांच सितारा होटल में, दूसरा भोपाल के तीन सितारा होटल में (यहां पांच सितारा होटल है ही नहीं) और तीसरा अपने इलाके में। दूर जाने की जरूरत नहीं है, मध्यप्रदेश का ही एक किस्सा सुन कर पूर्व रजवाड़ों की मानसिकता को समझा जा सकता है।

मध्यप्रदेश की वाणिज्य-उद्योग मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया जब पिछली दफा शिवराज सरकार में मंत्री बनी थीं तब मुख्यमंत्री से सरकारी निर्देश जारी करवा दिया था कि उनके नाम से पहले श्रीमंत का संबोधन लगाया जाए। इसके जगजाहिर होने पर दांव उल्टा पड़ता देख श्रीमंत शब्द की नई व्याख्या गढ़ी जाने लगी, पर था यह तुष्टीकरण का हास्यास्पद नमूना ही। इसकी फजीहत और शिवराज सिंह चौहान की किरकिरी होने के बाद सरकार को निर्देश वापस लेना पड़ा।

अविभाजित मध्यप्रदेश में पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र के कार्यकाल में तीन राजघराने चर्चित रहे। बस्तर में प्रवीरचंद्र भंजदेव सरकार से भिड़ते रहे और पुलिस मुठभेड़ में वे कई अनुयायियों सहित मारे गए। 1967 के आम चुनाव से पहले जब मिश्रजी ने विजयाराजे सिंधिया की मर्जी से टिकट बांटने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने जनसंघ से हाथ मिला लिया। इसके बावजूद मिश्रजी कांग्रेस को बहुमत दिलाने में कामयाब रहे, जबकि 1962 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया था। अलबत्ता रीवां के मार्तंड सिंह ने मिश्रजी का साथ दिया।

उधर मिश्रजी से कुपित श्रीमती सिंधिया कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों को एकजुट करने में कामयाब रहीं और दलबदल से सरकार गिरा दी गई। राजनीति के जानकार इसमें मिश्रजी की स्वभावगत उग्रता, जिसे वे अहंकार भी कहते थे, को भी बड़ा कारण मानते थे। मिश्रजी श्रीमती सिंधिया पर व्यंग्यवाण छोड़ने का कोई मौका नहीं चूकते थे। तब गरमी में सरकार पचमढ़ी स्थानांतरित हो जाया करती थी। वहां मंत्रिमंडल की बैठक के समय अचानक मधुमक्खियों ने हमला बोल कर कई मंत्रियों को लहूलुहान कर दिया, पर मिश्रजी साफ बच गए। जब पत्रकारों ने उनसे इसकी वजह जाननी चाही तब वे मुस्करा कर बोले- मधुमक्खियों के झुंड में शायद कोई रानी मक्खी नहीं थी…!

दैनिक भास्कर ने मैसूर में राजा की ताजपोशी के तमाशे पर सवाल उठाते हुए सचित्र खबर छापी। उसी ने अगले दिन भोपाल में एक पूर्व शाही परिवार की शादी की खबर में वर के पिता को सरगुजा रियासत का राजा कह कर संबोधित किया। इस प्रकार का महिमामंडन ही पूर्व राजघरानों को यथार्थ के धरातल पर उतरने नहीं दे रहा है।

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