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संसार के पार संसार

अलका कौशिक कुल्लू कभी ‘कुलूत’ था, यानी सभ्यता का अंतिम पड़ाव और मान लिया गया था कि उसके आगे संसार खत्म होता है। और वह जो बर्फ की खोह में बसता था लाहुल-स्पीति का संसार, अलंघ्य और अविजित रोहतांग दर्रे के उस पार, उसका क्या! वह हमारे-आपके साधारण संसार से पार था, अभी कुछ साल […]

Author August 5, 2015 01:59 am

अलका कौशिक

कुल्लू कभी ‘कुलूत’ था, यानी सभ्यता का अंतिम पड़ाव और मान लिया गया था कि उसके आगे संसार खत्म होता है। और वह जो बर्फ की खोह में बसता था लाहुल-स्पीति का संसार, अलंघ्य और अविजित रोहतांग दर्रे के उस पार, उसका क्या! वह हमारे-आपके साधारण संसार से पार था, अभी कुछ साल पहले तक। मौत के दर्रे से गुजर कर जाना होता था वहां, कौन जाता? सिर्फ वही जिसे कुछ मजबूरी होती या कोई अटलनीय काम। तब भी व्यापारी लांघा करते थे उस तेरह हजार पचास फुट ऊंचे दर्रे की कई-कई फुट बर्फ से ढकी दीवारों को! ये व्यापारी कशगर, खोतां, ताशकंद तक से आते थे और कुल्लू-मनाली, पंजाब, चंबा-कांगड़ा जैसे देसी ठिकानों से भी। घोड़ों पर और पैदल पार किया करते थे उस जानलेवा दर्रे को।

गरमियों के महीनों में जब दर्रे की बर्फ पिघल जाती और यह आराम से राहगीरों को रास्ता दे दिया करता था, तब भी लाहुल से इस तरफ के संसार में आने में लोगों को तीन से चार दिन लगते। मगर अब पर्यटन है, सैलानी हैं जो टैक्सियों में भर-भर कर रोहतांग दर्रे तक हर दिन आते हैं और लौट भी जाते हैं। राष्ट्रीय हरित पंचाट ने हाल में रोहतांग दर्रे तक जाने वाले पर्यटक वाहनों की संख्या सीमित करने का आदेश जब से सुनाया है, मनाली के चौराहे पर दिन भर ये टैक्सी वाले परमिट लेने की आस में घंटों लाइन में गुजारते दिख जाते हैं।

कुछ दुस्साहसी सैलानी अब इस दर्रे से उस पार भी उतरने लगे हैं। यानी उस पार की दुनिया के दरवाजे इस पार वालों के लिए खुल गए हैं। हालांकि दर्रे से नीचे उतरने पर अब भी ऊबड़-खाबड़ संसार फैला है। यहां रास्ता क्या है, बस बड़े-बड़े चट्टानी पत्थरों पर से वाहनों के गुजर जाने से खुल गई एक राह भर है। बीच-बीच में बड़े-छोटे नाले हैं जो ठंड से रात में भले ही सिकुड़ जाएं, लेकिन दिन की धूप के साथ उनमें ग्लेशियरों का पानी तेजी से भरने लगता है। यानी वाहनों को लेकर उनके आर-पार जाना गरमियों के मौसम में भी आसान नहीं होता। मीलों के फासले अकेले ही तय करते हैं आप!

कभी-कभार कोई ‘बाइकर्स’ या ‘साइकलिस्ट’ दिख जाते हैं। लेकिन रफ्तार क्या होती है इसे भुलाने का मंत्र चाहिए तो रोहतांग दर्रे से आगे निकलना होगा। पंद्रह हजार फुट से अधिक ऊंचे कुंजुम दर्रे को भी लांघना होगा, लाहुल और स्पीति की उस दुनिया में जाना होगा, जिसे कभी रुडयार्ड किपलिंग ने ‘हमारी दुनिया के भीतर एक दुनिया’ कहा था! साल के आठ महीने बर्फ की खोह बनी रहने वाली यह दुनिया जून-जुलाई में जैसे शीत निद्रा से जागती है। कुंजुम के नजदीक समुद्र टापू और बड़ा-छोटा शिगरी जैसे ग्लेशियर पिघलते हैं।

इन ग्लेशियरों के पिघलने से जिंदगी हिलोरें लेती है घाटियों में। नदियों और ग्लेशियर की धाराओं को खेतों में, गांवों की दिशाओं में मोड़ते-बांधते स्पीतियन मुस्तैदी से जुट जाते हैं। खेतों में भी जिंदगी लौट आती है और औरतें बिना रुके बुआई-रोपाई करने में डूब जाती हैं। इस बर्फीली घाटी में गरमाइश की आहट मटर, जौ, गेहूं, कठ की एक-दो फसलों का इंतजाम करती है और उसी में जैसे पूरी घाटी जुटी रहती है। लांग्जा, किब्बर, की, हिक्किम, कोमिक जैसे दुनिया के ऊंचे गांवों की ढलानों पर बच्चों की रौनक बढ़ जाती है। रबड़ के बूट पहने स्कूली बच्चे पर्यटकों की हवा का संग पाकर आसपास के जंगलों में जमा जीवाश्मों को औने-पौने दाम में बेचने निकल पड़ते हैं। कहते हैं, दुनिया में जीवाश्मों का सबसे बड़ा खजाना है स्पीति, मगर यहां के बाशिंदे अपनी इस दौलत से अनजान हैं। वे तो बस थोड़ा-सा मोल पाकर ही झूमने लगते हैं।

लाहुल-स्पीति में बारिश देश के दूसरे भागों के मुकाबले बहुत कम होती है। बर्फ गिरती है यहां या बर्फीले तूफान आते हैं। यों इधर कुछ सालों से स्पीति को हरा-भरा बनाने की मुहिम में तेजी आई है और शायद उसी का नतीजा है कि यहां भी बादल अब बरसने लगे हैं। मॉनसूनी बूंदा-बांदी तो अक्सर हो जाती है।

हालांकि अभी भी बारिश यहां हैरान कर देने वाली एक घटना है। काजा में पहुंचते ही हमें इसका अनुभव हो गया था। यहां दुनिया के सबसे ऊंचाई वाले पेट्रोल पंप पर कई दूसरे ड्राइवर हमें सतर्क करने आ चुके थे। ऊंचाई की कच्ची सड़कों पर बारिश की वजह से जमा कीचड़ में पहिये न उतारने की चेतावनी उनसे ही सुनी थी हमने। सरकारें और प्रशासन इन दूरदराज की जगहों पर जरा देर से ही करवटें लेते हैं। हिमालय के उस पार का यह संसार शायद इसी वजह से अपने तिलिस्म को बचा कर रख पाया है।

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