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किसिम किसिम के लोग

उर्मिलेश उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण में संवाददाता था और राजनीतिक मामले ‘कवर’ करता था। सचिवालय, विधानसभा, राजनीतिक दलों के दफ्तर या प्रमुख नेताओं के घर अक्सर जाना होता था। पटना तब मेरे लिए बिल्कुल नया था। अलग-अलग सोच के लोगों से मिल कर नई-नई जानकारी मिलती। कुछ प्रेरित करते, कुछ हताश। […]
Author June 16, 2015 15:55 pm

उर्मिलेश

उन दिनों मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण में संवाददाता था और राजनीतिक मामले ‘कवर’ करता था। सचिवालय, विधानसभा, राजनीतिक दलों के दफ्तर या प्रमुख नेताओं के घर अक्सर जाना होता था। पटना तब मेरे लिए बिल्कुल नया था। अलग-अलग सोच के लोगों से मिल कर नई-नई जानकारी मिलती। कुछ प्रेरित करते, कुछ हताश। कुछ प्रभावित करते, कुछ निराश। पर इनमें एक वरिष्ठ राजनेता बेहद दिलचस्प थे, सबसे अलग! अब ‘भूतपूर्व’ थे, पर एक समय वे महत्त्वपूर्ण पद पर रह चुके थे।

जितने प्रखर थे, उससे अधिक उनकी प्रखरता का प्रचार था। कुछ मामलों को लेकर विवादों में भी रहे। पर इतने चतुर थे कि किसी लफड़े में नहीं फंसे। उनके पास हमेशा अपने विरोधियों की मसालेदार सूचनाएं होतीं। पत्रकार के रूप में जिन दिनों मैं पटना पहुंचा, वे सत्तारूढ़ पार्टी के होते हुए भी सत्ता की मुख्यधारा से कुछ बाहर थे। पर ‘नेता-नगरी’ में उनका बंगला आबाद था। खबर छपाने के लिए पत्रकारों की मौजूदगी में उनकी खूब प्रशंसा करते, लेकिन जैसे ही कोई उनके घर से बाहर जाता, वहां मौजूद लोगों के बीच ‘मूर्खता’ या ‘अज्ञानता’ के लिए पत्रकारों को कोसने लगते।

बाद के दिनों में सत्ता पर दूसरी पार्टी काबिज हुई। लेकिन उनका ‘दरबार’ अपनी जगह बना रहा। कोई उन्हें नए ‘राजदरबार’ का ‘चाणक्य’ कहता तो कुछ ‘परदे के पीछे का बड़ा खिलाड़ी’ कहते। अब उनके पास सरकारी तंत्र के अलावा प्रमुख विपक्षी नेताओं की चटपटी खबरें होती थीं। वे नेता जो उनकी अपनी पार्टी के थे। नए सत्ता-शीर्ष से उनके रिश्ते और प्रगाढ़ होते गए। लोग बताते थे कि सूबे के ‘नए राजा’ (उनके ‘फैन-क्लब’ वाले इसी विशेषण का प्रयोग करते) कई दफा उनके घर पैदल चल कर आ जाते। नींबू चाय पर गपशप होती, समस्याओं और सुझावों का आदान-प्रदान होता। ऐसे में कोई उन्हें ‘चाणक्य’ कहता, तो उनका चेहरा खिल उठता था।

उनसे मिली सूचना के आधार पर अगर किसी संवाददाता ने विपक्षी खेमे या सरकार के किसी प्रतिकूल अफसर के खिलाफ कोई खबर छाप दी तो उसे वे अगले दिन खूब शाबासी देते। जितने लोग उस दिन उनसे मिलते, खबर छापने (या प्लांट करने) वाले संवाददाता की प्रशंसा में विशेषणों की झड़ी लगा देते। मसलन, उसे पत्रकारिता का ‘उज्ज्वल सितारा’, ‘बिहार का अरुण शौरी’ (उन दिनों शौरी एक्सप्रेस की अपनी खोजी रपटों के कारण अक्सर चर्चा मे रहते थे) या ‘यशस्वी पत्रकार’ कहते। लेकिन यह बताना नहीं भूलते कि उक्त पत्रकार की ‘प्रतिभा’ के शक्तिपुंज वही हैं। अपने दरबार में न आने वाले किसी नए और सक्रिय पत्रकार को देखते तो अक्सर शिकायती लहजे में कहते- ‘अरे, आप तो मेरे यहां आते नहीं! आइए, बहुत सारी नई जानकारी मिलेगी, लिखने-समझने की।’

एक बार उन्होंने मुझे भी इसी शिकायती लहजे में अपने यहां आने का न्योता दिया। मजा लेते हुए मैंने उनका न्योता स्वीकार किया- ‘जी सर, जरूर आऊंगा, आपके यहां ज्ञान लेने।’ मखाना वाली नमकीन के साथ अच्छी चाय पर हमने उनसे काफी-कुछ सुना। मेरा पहला दिन था, उनके ‘दरबार’ में हाजिर होने का। साथ में एक वरिष्ठ पत्रकार भी थे, जो उन्हें बहुत नजदीक से जानते थे। जब हम उनके ड्राइंगरूम में दाखिल हुए, वहां पहले से कुछ नेता-विधायक और कुछ पूर्व अधिकारी मौजूद थे। मेरे साथ गए वरिष्ठ पत्रकार को वे सभी पहचानते थे। पर मुझे सारे लोग नहीं जानते थे।

उन्होंने मेरा नाम लेकर परिचय दिया। विशेषणों की ऐसी भरमार लगाई कि मैं असहज हो गया। गपशप के बाद हम लोग बाहर निकले और अपने-अपने दफ्तर के लिए रवाना हो गए। बीच में पटना के डाकबंगला चौराहे की मशहूर दुकान पर पान खाने के लिए रुके। कुछ देर बाद वे पूर्व अधिकारी भी पान खाने वहां आ पहुंचे, जो उक्त नेता के ड्राइंगरूम में हम लोगों की गपशप के दौरान वहां मौजूद थे। हम दोनों को देखते ही वे पास आए। बोले- ‘आप दोनों की मैं बहुत कद्र करता हूं। पर आप जैसे लोग उनके यहां जाते ही क्यों हैं?’ हम दोनों ने पूछा- ‘ऐसी क्या गलती हो गई उनके यहां जाने में?’ उन्होंने गंभीर होकर कहा- ‘आपकी मौजूदगी में तो उन्होंने आप दोनों की खूब बड़ाई की, लेकिन जैसे ही आप लोग उनके बंगले से बाहर निकले, हम सबके बीच उन्होंने कहा कि ‘खबर के लिए मारे-मारे फिरते रहते हैं, फालतू हैं सब! कोई ज्ञान ही नहीं इन्हें!’

मेरे साथ के वरिष्ठ पत्रकार ने ठहाका लगाते हुए उक्त अधिकारी को आश्वस्त किया- ‘अरे आप मस्त रहिए, हम लोगों को उनकी यह आदत मालूम है। फिर भी हम लोग जाते हैं, कभी मजा लेने, कभी अच्छी चाय पीने। कभी-कभार अच्छी खबर का मसाला भी निकल आता है।’ उन दिनों पटना गए मुझे ज्यादा दिन नहीं हुए थे। इसलिए उक्त अधिकारी की तरह मेरे लिए भी वह दिलचस्प अनुभव था। तब से उस नेता को जब भी देखता, नमस्कार के साथ उनकी शख्सियत पर बरबस ही मुस्करा देता। वे बिल्कुल अलग ढंग के जीव थे। दिवंगत को नमन!

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