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कसौटी पर युवजन

शुभू पटवा आज क्या यह कल्पना की जा सकती है कि कोई समाज युवजन-विहीन होकर अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है? किसी भी काल में समाज का अस्तित्व युवजनों पर ही आधारित रहा है। शैशव और किशोरावस्था पार कर जब यौवन दस्तक देता है, तो वह अवस्था शारीरिक शक्ति, मानसिक तेजस्विता, नैतिक बल और शौर्य […]

Author January 12, 2015 12:34 PM

शुभू पटवा

आज क्या यह कल्पना की जा सकती है कि कोई समाज युवजन-विहीन होकर अपना अस्तित्व बनाए रख सकता है? किसी भी काल में समाज का अस्तित्व युवजनों पर ही आधारित रहा है। शैशव और किशोरावस्था पार कर जब यौवन दस्तक देता है, तो वह अवस्था शारीरिक शक्ति, मानसिक तेजस्विता, नैतिक बल और शौर्य से सराबोर होती है। यही वह समय होता है, जब एक युवा को अपने कर्तव्य और दायित्वबोध का अहसास होने लगता है। इन्हीं घड़ियों में समाज की अपेक्षाएं व्यग्रता के साथ बलवती होती हैं और ‘युवजन’ कसौटी पर होता है।

आज का ‘युवजन’ भी काल की निर्मम कसौटी पर है। उसका नैतिक बल, उसकी शारीरिक क्षमता, मानसिक तेजस्विता, उसका शौर्य उसमें यथारूप विद्यमान हैं, तब भी लगता है कि कुछ खो गया है। कुछ ऐसा अधकचरा या अधूरा है, जो समाज को रुग्ण बनाए हुए है। जब देश गुलाम था, तो इसके कारण स्पष्ट थे। लेकिन तब देश की तरुण-शक्ति की अपार क्षमता प्रकट भी होती रही थी। आज हम गुलाम नहीं हैं, स्वतंत्रता के उपभोग में आधी सदी पार कर गए हैं, पर क्या पहले से अधिक रुग्ण नहीं हो गए हैं? हम अपनी ही बुद्धि से समीक्षा करें।

भारत की गुलामी समष्टिगत साधना के विलोपन का परिणाम थी। सही है कि कोई भी समाज बिना व्यक्ति के नहीं हो सकता, पर समग्र समाज की उन्नति के बिना व्यक्ति की उन्नति का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता। गुलामी के दिनों को याद करें तो पाएंगे कि निजी तौर पर अनेक व्यक्ति समर्थ रहे होंगे, पर साझा तौर पर समाज की अवस्था जर्जर ही थी। आजादी के बाद यह उम्मीद स्वाभाविक थी कि समाज सशक्त और उन्नत होगा। पर आज हम देख रहे हैं कि व्यक्तिगत तौर पर अनेक लोगों के सामर्थ्यवान होते हुए भी सामाजिक स्तर पर विखंडन, विषमता और विग्रह के अजगर का मुंह पहले से कहीं अधिक बड़ा और भयावह स्तर पर खुलता जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है?

लोकतंत्र की शक्ति तो ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ के सिद्धांत में निहित है। सत्ता और शक्ति के विकेंद्रीकरण में ही लोकतंत्र की सफलता सुनिश्चित हो सकती है। एक सार्वभौमिक गणराज्य के रूप में भारत की साख दुनिया की नजर में जो भी हो, अपने ही देश में हमारी जो अवस्था है, हमें आईने में अपना चेहरा देखना चाहिए। जिस सामाजिक वृत्ति का विकास स्वाधीनता के बाद हममें होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। अब जो हालात बन रहे हैं, वे सामाजिक और समष्टिगत विकास के कम और वैयक्तिक उन्नति के अधिक प्रतीत हो रहे हैं। उदारीकरण में यही होता है। इसके चलते सामाजिक वृत्ति का सशक्तीकरण नहीं हो पाता। व्यक्ति के ही बलशाली होने की

संभावना प्रबल होती है। पराधीनता का कारण भी सामाजिक वृत्ति का अभाव ही होता है। तो क्या हम प्रच्छन्न पराधीनता की दशा की ओर अग्रसर हैं?
आज का युवजन अबूझ भटकाव की अवस्था में है। एक तरफ वह भौतिक संसाधनों की चकाचौंध से विस्फारित है और उसी में मुग्ध है। दूसरी तरफ, ऐसा युवजन वर्ग भी है जो कुंठित और विगलित है। उसके सामने कोई अवसर नहीं है। अपना भविष्य उसे लुंठित प्रतीत हो रहा है। आतंकवाद, हिंसा, अनाचार के रूप में जो विग्रह दिखाई दे रहा है, उसका निमित्त भी यही वह वर्ग है। दोनों ही वर्गों के युवजनों के लिए किसी ‘श्रेयस्’ की जरूरत है। उनकी अजस्र शक्ति का समुचित उपयोग कैसे हो कि वह समष्टिगत विकास, साझा शक्ति का आधार बन सके। इस दृष्टि से यह देखना जरूरी है कि क्या समाज उसे यथोचित आदर और श्रद्धा प्रदान कर रहा है? बिना श्रद्धा और आदर के दायित्व और कर्तव्य कभी जागृत नहीं हो सकता।

जहां यह देखना जरूरी है कि युवजनों का स्थान समाज में सर्वोपरि हो, वहीं यह भी आवश्यक है कि युवा समष्टिगत स्तर पर जो कुछ करें, उसे निष्काम कर्म मानते हुए करें। इसी सहज क्रिया से ‘अहं’ का विसर्जन संभव है। अहं के विसर्जन से चित्त की जैसी शुद्धि होती है, उसी में वैयक्तिक उन्नति सन्निहित है, जो समष्टि के लिए भी हितकर सिद्ध हो सकती है। यही वह अवसर है जब हमारा युवजन एक नए अर्थ, रस और नए आनंद से समाज को आप्लावित कर सकता है। युवजन का अर्थ ही संयम और कर्मशीलता है। भाग्यवाद व्यक्ति को कायर और कूपमंडूक बनाता है। रचनात्मक-संघर्ष की जिजीविषा उससे पैदा नहीं हो सकती। युवजन का स्वधर्म ही कर्मशीलता और संयम में निहित है। जब युवजन अपने स्वधर्म का निर्वाह करने लगेगा, तो समाज में श्रद्धा और आदर का स्थान अपने आप प्राप्त हो जाएगा।

युवजनों के लिए आज ऐसे ही संकल्प का अवसर विद्यमान है। अब समय है कि हमारा युवजन अपनी शक्ति, तेजस्विता और अपना नैतिक बल द्विगुणित करने का संकल्प ले और अपने जीवन को रूपांतरित करे। उनके व्यक्तिगत विकास में ही समग्र समाज की उन्नति निहित है। व्यापक बदलाव की भूमि इसी तरह तैयार होगी। कागजी प्रचार और आंकड़ों की कलाबाजी से मुक्त सुदृढ़ संकल्प और अटूट निष्ठा से कोई भी कार्यक्रम या उद्देश्य सफल हो सकता है। युवजनों की असली पहचान इसी तरह बन सकती है।

 

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