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कौशल बनाम जीवन

कौशल और जीवन के बीच जो संबंध हैं, उसके कई आयाम हो सकते हैं। किसी में दोनों का सीधा संबंध दिखाई पड़ता है तो किसी में दोनों के बीच एक तीसरे माध्यम की अनिवार्यता लगती है।

Author January 4, 2016 12:23 AM

कौशल और जीवन के बीच जो संबंध हैं, उसके कई आयाम हो सकते हैं। किसी में दोनों का सीधा संबंध दिखाई पड़ता है तो किसी में दोनों के बीच एक तीसरे माध्यम की अनिवार्यता लगती है। दरअसल, जीवन को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं। व्यक्ति-विशेष के परिवार की सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति, किसी व्यक्ति की पढ़ाई-लिखाई, उसकी शिक्षा या अन्य कारकों के आधार पर उसने किस व्यवसाय का चयन किया, उससे होने वाली आमदनी, उस व्यक्ति ने विद्यालय या किसी संस्थान से मिलने वाले विचारों के अलावा अपने परिवार से जो विचार लिये या अपने चिंतन-मनन से जो विचार अर्जित किए और फिर उन विचारों के आधार पर अपनी बाल्यावस्था या लड़कपन में ही जो जीने का ढंग विकसित किया।

ये जीवन के अलग-अलग दौर के विभिन्न आयाम हैं और इनसे ही व्यक्ति का निर्माण होता है। तो क्या इन सभी कारकों का कौशल से कोई संबंध है? कौशल की भूमिका कहां से शुरू होती है? एक सामान्य व्यक्ति जन्म लेता है, तब उसके भविष्य की सामाजिक-आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति का अनुमान उसके परिवार की इन्हीं तीनों स्थितियों के आधार पर लगाया जा सकता है। यानी व्यक्ति की बाल्यावस्था में उसके भविष्य की सामाजिक-आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति का सीधा संबंध उसके परिवार की इन्हीं स्थितियों की पृष्ठभूमि से है। यह हमेशा तो नहीं, पर आमतौर पर यह सच है।

व्यक्ति की योग्यता और परिस्थितियां एक चक्र में चलती हैं। विडंबना है कि परिस्थितियों का इस चक्र में पहला क्रम पड़ जाता है। इस चक्र को इस प्रकार समझा जा सकता है। पेट भर खुराक न मिल पाने के कारण एक व्यक्ति कमजोर हो जाता है और इसी वजह से वह उतनी मेहनत नहीं कर पाता, जितनी वह स्वस्थ स्थिति में कर पाता। पूरी मेहनत न कर पाने से उसे ठीक से और वाजिब आमदनी नहीं हो पाती। आय नहीं हो पाने के चलते वह पहले से भी कम खुराक जुटा पाता है और ठीक से खाना-पीना नहीं होने से वह पहले के मुकाबले और ज्यादा कमजोर हो जाता है। फिर पहले की अपेक्षा काफी कम मेहनत कर पाता है। जाहिर है, उसकी आमदनी और कम हो जाती है, फिर खुराक और कम हो जाती है, वह और ज्यादा कमजोर हो जाता है। विडंबना यह है कि इस दुश्चक्र को चलते रहने दिया जाता है।

व्यक्ति की बाल्यावस्था में उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति को ठीक से समझने के लिए एक वास्तविक स्थिति को देखते हैं। एक व्यक्ति के परिवार में कोई राजमिस्त्री का काम करता है। इस व्यवसाय का जो स्वरूप और उससे होने वाली आय है, उससे उसकी आर्थिक स्थिति भी स्पष्ट हो जाती है। अन्य किसी व्यवसाय को भी चुना जा सकता था, मसलन खेत मजदूर, ठेला या रिक्शा चलाने वाला, घंटे के हिसाब से वेतन देने वाली किसी फैक्ट्री में काम करने वाला, कपड़े की दुकान में काम करने या पानी-चाय आदि देने का काम, आदि। इन सभी में आय कम है और अनियमित भी।

इस व्यक्ति को पढ़ाई-लिखाई के लिए आवश्यक कई चीजें अपने परिवार से नहीं मिल पातीं। मसलन माहौल, प्रेरणा, उचित मार्गदर्शन, आवश्यक समय, रुपया-पैसा आदि। ऐसे में युवक किसी तरह पांचवीं कक्षा पास कर लेता है, फिर आगे नहीं बढ़ पाता। एक-दो बार फेल होकर पढ़ाई पूरी हो जाती है। अब व्यवसाय का चुनाव करना होता है, जो आमतौर पर परिवार में किया जाता है। दरअसल, उसी व्यवसाय में युवक को आसानी से मार्गदर्शन भी मिलता है और वह उसे अपना लेता है। लेकिन व्यक्ति के लिए परिवार के व्यवसाय को अपनाकर आसानी से हार जाना उतना सरल नहीं होता। इस व्यवसाय में जाने के बाद वह जिस मंजिल तक पहुंचेगा, उसे वह अच्छी तरह जानता है और उससे वह खुश नहीं है।

इस स्थिति में व्यक्ति एक पेशे में तो है, पर वह उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। वह ज्यादा सम्मान, ज्यादा पैसा और ज्यादा सुकून वाले पेशे की भूख से छटपटा रहा है। आर्थिक कारणों से वह अपने मौजूदा पेशे को एकदम से नहीं छोड़ सकता। इसके अलावा काफी जांच-पड़ताल, खोजबीन, विचार-विमर्श, दौड़-धूप के फलस्वरूप अपनी पसंद का दूसरा काम, जिसमें वह अपना सुनहरा भविष्य देखता है, साफ-साफ दिखाई पड़ने के बावजूद वह उसे पा नहीं सकता। दूसरा काम रुपए और समय का निवेश मांगता है। यह समस्या या स्थिति व्यक्ति की राह में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। इस बिंदु पर उसे कौशल चाहिए। यहीं पर उसे जो कौशल मिलेगा वह उसके जीवन की दिशा निर्धारित करेगा।

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