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लोकतंत्र के आईने में

निवेदिता सिंह काफी जद्दोजहद के बाद हाल ही में आखिर मुझे भी मौका मिला अपने देश के लोकतंत्र के मंदिर को देखने का। उस दिन संसद की कार्यवाही शुरू होने के बहुत पहले ही मैं संसद पहुंच गई। जितनी गहन जांच होती है, उन सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद अपने साथ स्कूली बच्चों […]

Author August 9, 2015 4:51 PM

निवेदिता सिंह

काफी जद्दोजहद के बाद हाल ही में आखिर मुझे भी मौका मिला अपने देश के लोकतंत्र के मंदिर को देखने का। उस दिन संसद की कार्यवाही शुरू होने के बहुत पहले ही मैं संसद पहुंच गई। जितनी गहन जांच होती है, उन सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद अपने साथ स्कूली बच्चों को लेकर भीतर गई। बच्चों की जिज्ञासा बनी हुई थी कि सांसद काम कैसे करते हैं, क्या हम समस्याओं पर उनसे सवाल पूछ पाएंगे! बच्चों के मासूम सवालों पर मैंने उनकी हौसलाअफजाई की। हम सबको हिदायत थी कि अपनी जगह पर शांति से बैठे रहें।

बहरहाल, घड़ी की सुइयों के ग्यारह पर पहुंचते ही लोकसभाध्यक्ष के आने की घोषणा हुई। फिर एक-एक कर सांसद अपने हाथ में नारे लिखी तख्तियां लेकर लोकसभाध्यक्ष के करीब जमा होकर नारे लगाने लगे। उन कुछ सांसदों के आगे पूरी संसद लाचार दिखी। अध्यक्ष बार-बार सांसदों से तख्तियां हटाने की अपील करती रहीं, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं था। इतने शोर-शराबे के बावजूद लोकसभा की कार्यवाही रुकी नहीं। हालांकि किसी को कुछ पता नहीं चल रहा था कि हो क्या रहा है। मेरे साथ बैठे बच्चे सकते में थे, उनके उत्साह पर घड़ों पानी पड़ चुका था। टीवी पर बुद्धिमान और तेजतर्रार दिखने वाले नेताओं को लेकर मन में बनी राय गड्डमड्ड होने लगी। फौरन ही वे फैसले भी लेने लगे। एक ने साफ कहा कि मुझे तो ऐसा नेता नहीं बनना। हालांकि मैंने बच्चों को यह समझाने की कोशिश की कि यहां ऐसा हमेशा नहीं होता और लोकतंत्र का एक चेहरा यह भी है।

इस पर मासूमियत भरा एक संजीदा सवाल खड़ा हो गया कि वे अच्छे वाले नेता कौन से हैं और उन तक हम अपनी बात कैसे पहुंचा सकते हैं। हमारे स्कूल में खेल का मैदान बेहद छोटा है, रात में पढ़ाई के वक्त बिजली गुल हो जाती है, पापा दिन-रात काम करते हैं लेकिन मेरे लिए चॉकलेट नहीं ला पाते…! मैंने बातों को घुमा-फिरा कर समझाने की कोशिश की कि ये नेता बड़े-बड़े काम कर रहे हैं, उन पर देश भर के लोगों के सपने पूरा करने की जिम्मेदारी होती है। इस पर बच्चों का खीझ भरा जवाब मिला कि हमें उनके बड़े कामों से मतलब नहीं। बस हमारे रोजमर्रा के जीवन की छोटी-मोटी मुश्किलें ही आसान बना दें।

इसी बीच ऐलान हुआ कि लोकसभा से कुछ सांसदों को पांच दिनों के निलंबित कर दिया गया। पहली बार बच्चे यह कहते हुए उछल पड़े कि इतनी सजा तो हमें भी नहीं मिलती, चाहे गलती कितनी भी बड़ी क्यों न हो! बच्चे इस कोशिश में थे कि कहीं से निलंबित सांसदों से मिल कर यह पूछ सकें कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि इतनी कठोर सजा झेलनी पड़ी।

बाद में बच्चों के साथ संसद से जब हम बाहर निकल रहे थे, उनके दिमाग में सवाल ज्यादा थे, जवाब कम। कुछ सवाल तो ऐसे थे जिनका जवाब न मेरे पास था और न देश के सांसदों के पास होगा। आखिर जिन पर देश चलाने की जिम्मेदारी हो, जिनके फैसले पर सवा अरब लोगों की जिंदगी टिकी हो, वे काम के वक्त ऐसी लापरवाही कैसे कर सकते हैं। संसद आते वक्त बच्चों के दिल में देश की लोकतांत्रिक प्रणाली और राजनेताओं को लेकर जो एक सुनहरी तस्वीर थी, उस पर अब न जाने कितनी खरोंचें लग चुकी थीं। नेता क्या करते हैं, कैसे करते हैं, देश और संसद कैसे चलाते हैं। इतना ही नहीं, ज्यादातर बच्चे शायद यह भी तय कर चुके थे कि अगली किसी परीक्षा में जब इस बात पर निबंध लिखने को कहा जाएगा कि बड़े होकर वे क्या बनना चाहते हैं तो उसमें नेता बनने की ख्वाहिश शामिल नहीं होगी।

हम इन्हें लोकतंत्र का पहरुआ कहें, देश के सर्वशक्तिशाली लोग या फिर भारत भाग्य विधाता, लेकिन एक बात तो आईने की तरह साफ है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमारे नेताओं से ताकतवर और कोई नहीं है। उनके हाथों में देश की तकदीर और तस्वीर बदलने की ताकत है और खुद के लिए आदर्श बनने और बनाने का अवसर। लेकिन इन दिनों हालात यह हैं कि नई पीढ़ी अदना-सा बाबू बन कर जीवन गुजरने को तैयार है, पर सबसे शक्तिशाली नेता नहीं बनना चाहती। इस सवाल का जवाब नेताओं को ही तलाशना होगा। अगर इसमें देर की गई तो लोकतंत्र की गाड़ी पटरी से उतर सकती है और उसे वापस पटरी पर लाना आसान नहीं होगा।

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