ताज़ा खबर
 

हाशिये पर किताबें

प्रेमपाल शर्मा दिसंबर का पहला सप्ताह, शाम के छह बजे सर्दी की आहट भर थी। फुटपाथ पर अखबार, पत्रिकाएं बेचने वाले जिस स्टॉल पर मैं खड़ा था, वहां ऐसा सन्नाटा कम देखा गया। कुछ वर्ष पहले पत्रिका खरीदने वाले बच्चे, महिलाएं या बुजुर्गों की अच्छी-खासी भीड़ होती थी। बीते कुछ वर्षों से यह लगातार कम […]
Author December 23, 2014 13:56 pm

प्रेमपाल शर्मा

दिसंबर का पहला सप्ताह, शाम के छह बजे सर्दी की आहट भर थी। फुटपाथ पर अखबार, पत्रिकाएं बेचने वाले जिस स्टॉल पर मैं खड़ा था, वहां ऐसा सन्नाटा कम देखा गया। कुछ वर्ष पहले पत्रिका खरीदने वाले बच्चे, महिलाएं या बुजुर्गों की अच्छी-खासी भीड़ होती थी। बीते कुछ वर्षों से यह लगातार कम होती जा रही है। लेकिन उस दिन सन्नाटा था। अखबार वाले विनय मिश्रा ने बताया कि पिछले एक घंटे में दस रुपए की भी बिक्री नहीं हुई। जो बिकने थे, वे सुबह बिक गए। विनय का दर्द बांटने के लिए अगल-बगल के दोनों अखबार वाले, अख्तर और प्रदीप भी आ गए। पता नहीं ऐसे कैसे गुजारा होगा! कहां पहले पांच सौ रुपए की आमदनी हो जाती थी, अब पांच सौ रुपए की बिक्री भी नहीं होती। इस बार दिवाली, दशहरा पर दूसरे सामान भी रखने शुरू कर दिए थे। पूजा की सामग्री, मोमबत्ती, पटाखे। आखिर करें भी तो क्या, बच्चों का पेट तो पालना है!

वे तीनों और विस्तार में बताते हैं कि दो-तीन साल पहले ‘आउटलुक’, ‘अहा जिंदगी’, ‘कादम्बिनी’, ‘सरिता’ की लगभग चालीस-पचास प्रतियां बिक जाती थीं। अब वे घट कर पांच से दस रह गई हैं। ये पत्रिकाएं अब इंटरनेट पर मिलने लगी हैं। पहले बच्चे खुद देखने के लिए भीड़ लगाए रहते थे, कई अपनी मां की अंगुली पकड़ कर आते थे, वह भी कम हो रहा है। वे भी ज्यादातर स्कूल के होमवर्क में लगे हैं या परीक्षाओं में। सोमवार के टेस्ट ने भी हमारी बिक्री पर असर डाला है, वरना इतवार को तो बच्चे आते ही थे। फिर बिकता क्या है? उन्होंने चार-पांच फुट ऊंची करीने से लगाई अंगरेजी की किताबों की तरफ इशारा किया- शिडनी शैल्डन, अगाथा क्रिस्टी, जेफ्री आर्चर, डैन ब्राउन, रोडा बर्न। सबसे ज्यादा यही बिकती हैं। उसके बाद नंबर आता है ज्योतिष और वास्तु की पत्रिकाओं या किताबों का। अख्तर एक और दर्द का बयान करता है कि चेतन भगत की पांच से दस कॉपी पिछले महीने में उसने रोज बेची हैं। लेकिन मुनाफा उसमें भी बहुत कम रह गया है। इंटरनेट से मंगाने पर ग्राहक को सस्ती पड़ती है।

तीनों टकटकी लगाए हर गुजरते ग्राहक को देख रहे हैं। वाकई भारत जैसे गरीब देश में किताबों की बिक्री पर सबसे भयानक संकट नई सभ्यता शैली का है। इसमें भी सबसे बड़ा नुकसान किया है अंगरेजी ने। आखिर एक पराई भाषा में रटने-पढ़ने का काम कोई कितनी देर तक कर सकता है। बच्चे अंगरेजी जरूर पढ़ रहे हैं, लेकिन वह मजबूरी में मां-बाप, कोचिंग क्लास के डंडे के बल पर। ऐसे किया हुआ काम बहुत देर तक जुड़ाव पैदा नहीं करता। इसलिए वे किताबों से ही दूर हो जाते हैं। और तो और, सरकारी स्कूलों समेत रेलवे के स्कूलों को भी अंगरेजी निगल गई। पिछले कुछ समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्कूलों के पुस्तकालयों में किताब पढ़ने की आदत को बढ़ाने के लिए कभी-कभी जाना होता है। अच्छा लगता है जब वे सभी बच्चे अपनी भाषा, यानी हिंदी की किताबों की मांग करते हैं। पढ़ते भी हैं। सबसे ज्यादा मांग रहती है चकमक, नंदन या प्रेमचंद की कहानियों की। यहां फिर हिंदी का एक कमजोर पक्ष उभरता है। सत्तर करोड़ के हिंदीभाषी बच्चों की दुनिया! लेकिन हिंदी की बाल पत्रिकाएं इतनी कम और बच्चों के लिए लिखने वाले तो मौजूदा पीढ़ी में लगभग शून्य हैं। जनवादी सैद्धांतिक क्रांतिकारी विमर्शों के चलते बच्चों के लिए कविताएं, कहानी लिखने को दोयम दर्जे का काम बना दिया गया है। अगर किसी ने मंच से कविता पढ़ दी तो वह जाति, बिरादरी से बाहर!

बच्चों को अपनी बोली, लय, तुकबंदी की कविताएं चाहिए, जिन्हें वे गुनगुना सकें। वरना लौट-फिर कर हर बच्चा अंगरेजी की उन्हीं लाइनों- ‘जैक एंड जिल वैंट अप दि हिल, या जॉनी-जॉनी यस पापा…’ को दुहरा रहा है। स्कूली शिक्षा में अपने साहित्य की शुरुआत ही नहीं हो पा रही। यही बात लोकप्रिय साहित्य पर लागू है। प्रेमचंद अभी भी सबसे ज्यादा बिकने वाले और पढ़े जाने वाले लेखक हैं। पिछले साठ साल की शिक्षा, संस्कृति की नीतियां और उनके रखवाले लेखक, संगठन, विश्वविद्यालय, अकादमियां, पुरस्कार… सब कहां गए! जनता हिसाब मांग रही है और छोटा-मोटा धंधा करने वाले, अखबार बेचने वाले भी पूछ रहे हैं कि हम कहां जाएं! स्वदेशी और स्वभाषा के भाषणों से हमारा पेट तो नहीं भर सकता। सन्नाटे को एक बहस फिर तोड़ रही है, जर्मन या संस्कृत! लेकिन आमजन कह रहे हैं कि न हमें जर्मन चाहिए, न संस्कृत। हमें अपनी भाषा, बोली चाहिए। क्या कोई सबके हित में इस आवाज को सुनने की कोशिश करेगा!

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.