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हरिश्चंद्र और फ्रायड

राजकिशोर पंडितजी धार्मिक श्रद्धा के साथ सत्य हरिश्चंद्र का किस्सा विस्तार से बताए जा रहे थे और मेरे अधार्मिक मन में फ्रायड चहलकदमी कर रहा था। किस्सा मशहूर है कि राजा हरिश्चंद्र ने सपने में देखा कि उन्होंने अपना सारा राजपाट एक ब्राह्मण को दान कर दिया था और अगले दिन वह ब्राह्मण आ पहुंचा […]

Author March 9, 2015 10:15 PM

राजकिशोर

पंडितजी धार्मिक श्रद्धा के साथ सत्य हरिश्चंद्र का किस्सा विस्तार से बताए जा रहे थे और मेरे अधार्मिक मन में फ्रायड चहलकदमी कर रहा था। किस्सा मशहूर है कि राजा हरिश्चंद्र ने सपने में देखा कि उन्होंने अपना सारा राजपाट एक ब्राह्मण को दान कर दिया था और अगले दिन वह ब्राह्मण आ पहुंचा तो उसे रत्न-जड़ित सिंहासन पर बैठा कर खुद एक आम आदमी हो गए। वह ब्राह्मण कोई और नहीं, खुद विश्वामित्र थे जो हरिश्चंद्र की यह ख्याति सुन कर कि उनके लिए सत्य ही सब कुछ है, उनकी परीक्षा लेना चाहते थे। आगे की कहानी राजा से रंक हुए हरिश्चंद्र की दुर्दशा की कहानी है, जिसका शिकार खुद उनकी पत्नी होती है, जिसे अपने पति की सत्यनिष्ठा की खातिर श्मशान-कर देने के लिए अपने आंचल के दो टुकड़े करना पड़ता है। आशय यह दिखाना है कि अपने मूल्यों की रक्षा के लिए कोई आदमी कितनी दूर तक जा सकता है। शायद इसीलिए कोई दूसरा हरिश्चंद्र अभी तक पैदा नहीं हुआ।

लेकिन इस किस्से में फ्रायड कहां से आए? आपको पता ही होगा कि फ्रायड की मान्यता यह थी कि हमारा व्यक्तित्व चेतन से ज्यादा अचेतन में निवास करता है। हम अपने अचेतन को नहीं जानते, न जानना चाहते हैं, क्योंकि वहां मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों के न जाने कितने कंकाल रहते हैं। ये कंकाल सामान्यत: सोए रहते हैं, पर जब मौका आता है तब हमारे चेतन को नचाने लगते हैं। अपने अचेतन के सामने हम पूर्णत: असहाय होते हैं- क्योंकि वह कोई और नहीं, हम ही हैं और अपना कीमा बनाना टेढ़ी खीर है। लेकिन हम तब भी असहाय हो जाते हैं यानी अपने आप पर नियंत्रण खो देते हैं जब नींद हमें दबोच लेती है। तब चेतना का मैदान खाली हो जाता है, जिसमें खेलने के लिए अचेतन के कंकाल निकल आते हैं। उन्हीं की कार्रवाइयों को स्वप्न कहते हैं। फ्रायड के शब्दों में, स्वप्न अचेतन की ओर ले जाने वाला राजपथ है।

मेरे लिए पहला सवाल यह था कि हरिश्चंद्र ने ऐसा स्वप्न क्यों देखा जिसमें वे सब कुछ दान देकर नि:स्व हो जाते हैं। दूसरा सवाल यह था कि उन्होंने स्वप्न की बात पर भरोसा क्यों कर लिया। चाहें तो एक तीसरा सवाल यह भी मान सकते हैं कि उस स्वप्न का विश्वामित्र से क्या संबंध था जो अगले ही दिन हरिश्चंद्र के सामने टपक पड़े?

अचेतन के सवालों के सच्चे जवाब अचेतन में ही होते होंगे। मैंने कई साधुओं के बारे में सुना है जो अबूझ सवालों के अबूझ जवाब दिया करते हैं। फिर भी आदमी हर चीज को सीधी-साफ भाषा में समझना चाहता है, क्योंकि वह मुख्यत: चेतन में ही जीता है जहां तर्क की भाषा चलती है। अचेतन की अपनी भाषा है, जिसमें तर्क और संगति के लिए कोई जगह नहीं है। वहां मनुष्य अपने नग्नतम रूप में मौजूद होता है और नग्नता एक स्थिति है, विचार नहीं।

मैंने यह कल्पना करने की आजादी ली कि राजा हरिश्चंद्र ने यह जो सपना देखा, वह किसी न किसी स्तर पर उनकी इच्छापूर्ति थी। चेतन या अचेतन में वह जरूर सब कुछ त्याग कर संन्यासी बनना चाहते रहे होंगे। उन्होंने सत्य का मार्ग अपनाया था, इसलिए वे जानते थे कि इस मार्ग पर कोई इच्छा-अभिलाषा-मुक्त व्यक्ति ही चल सकता है। स्वार्थ फटका कि सत्य छटका। व्यक्तिगत इच्छाएं सत्य को ढक देती हैं, जैसा कि संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है, सत्य का मुंह स्वर्ण पात्र से ढका है। ऐसा व्यक्ति ही बिना किसी दुख या परिताप के अपना सब कुछ त्याग सकता है जिसे स्वर्ण आकर्षित नहीं करता। लेकिन हरिश्चंद्र राजा थे और राजा को राज करना होता है। इसलिए नि:स्व होने की इच्छा उनके अवचेतन में दबी हुई थी, जो एक दिन उभर ही आई।

सबकुछहीन होने की इच्छा अगर हरिश्चंद्र के मन में दबी न होती, तो परीक्षा लेने आए विश्वामित्र को उन्होंने अपना राजपाट यों ही न पकड़ा दिया होता। सुबह होते ही वे अपने स्वप्न को भूल जाते या कम से कम विश्वामित्र के सामने मुकर जाते। लेकिन अगर वे ऐसा करते, तो सत्य की परीक्षा में फेल नहीं हो जाते? आत्मच्युत होना भी अपराध है- अपने ही साथ विश्वासघात। निश्चय ही सत्यवादी राजा को आभास होगा कि चेतना एक, और अंतर्विरोध होने पर भी अविच्छिन्न है।

विश्वामित्र ऋषि थे। ऋषियों की भी सीमा होती है। पर विश्वामित्र में यह सामर्थ्य था कि वे अचेतन में भी प्रवेश कर सकते थे। जाहिर है, हरिश्चंद्र का सपना झूठा था- वह विश्वामित्र द्वारा गढ़ा हुआ था। तो क्या ये सारे देवी-देवता, फरिश्ता-शैतान, स्वर्ग-नरक, आत्मा-परमात्मा मनुष्य के अचेतन की ही अभिव्यक्तियां हैं, जहां तक तर्क की धूप न पहुंची है, न पहुंच सकती है?

 

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