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आभासी दुनिया में

एक परिचित मेरे घर से दुनिया के दूसरे छोर यानी सिएटल में रहती हैं। उनकी उम्र सत्तर साल के पार है। मगर उम्र के अनुपात में वे आज भी चुस्त-दुरुस्त हैं। चेहरे पर उतर आई झांइयों और ढीली पड़ती चमड़ी को अनदेखा कर दिया जाए तो वे आज भी ठीक वैसी ही दिखाई देती हैं जैसे तीस साल पहले दिखती थीं। उनकी वही छवि ही मेरी आंखों की थाती थी।

Author February 4, 2019 3:32 AM
तस्‍वीर का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए गया है।

शरद सिंह

एक परिचित मेरे घर से दुनिया के दूसरे छोर यानी सिएटल में रहती हैं। उनकी उम्र सत्तर साल के पार है। मगर उम्र के अनुपात में वे आज भी चुस्त-दुरुस्त हैं। चेहरे पर उतर आई झांइयों और ढीली पड़ती चमड़ी को अनदेखा कर दिया जाए तो वे आज भी ठीक वैसी ही दिखाई देती हैं जैसे तीस साल पहले दिखती थीं। उनकी वही छवि ही मेरी आंखों की थाती थी। भागते-दौड़ते समय में कई बार उनकी याद आई, उसी छवि के साथ। झुंझलाहट होती कि अब तो वे दैहिक रूप से बदल चुकी होंगी। शायद मोटी हो गई हों, थुलथुल या बेहद पतली, कौन जाने। पक्का था कि फिर देखूंगी तो पहचान नहीं सकूंगी उन्हें। अक्सर यही होता है। बिछड़े हुए जब कई साल बाद मिलते हैं तो उनका आकार-प्रकार सब कुछ बदल चुका होता है। मैं उन्हें ‘मौसी’ कहती थी। उनके इंदौर जाने तक तो आशा थी कि कभी न कभी उनसे मिलना हो ही जाएगा। फिर पता चला कि उनके पति को यानी मौसा को सिएटल के किसी कॉलेज में अतिथि शिक्षक के रूप में बुला लिया गया है और वे सपरिवार अमेरिका चले गए हैं। सिएटल उन्हें रास आ गया। उनके कई रिश्तेदार भी वहीं थे। कुछ समय बाद अचानक मौसा चल बसे। पर मौसी वहीं बस गर्इं। बेटे ने वहीं अपनी पढ़ाई पूरी की और वहीं नौकरी, शादी करके हमेशा के लिए सिएटलवासी हो गया। ये सारी बातें मुझे मौसी से ही पता चलीं।

हुआ यों कि एक दिन अचानक फेसबुक पर मौसी की ‘रिक्वेस्ट’ देख कर मैं चकित रह गई। दिल एकबारगी तेजी से धड़का और मैं अनुमान लगाने लगी कि प्रोफाइल में जो फोटो दिख रही है, वह कितनी पुरानी है! उस तस्वीर में मौसी की काफी पहले वाली ही छवि कौंध रही थी। उनकी फेसबुक वाल पर जाकर उनकी कुछ ताजा तस्वीरें देखीं तो समझ में आ गया कि वे मात्र उतनी ही बदली हैं जितनी कि उम्र ने उन्हें बदला है। वह भी बड़ी कोमलता से। उनका सिकुड़ा हुआ चेहरा अभी भी वही भाव-भंगिमा दिखा रहा था। कैलेंडर ने मानो एक झटके में कई सारे पन्ने पलट दिए और मुझे उसी रात्रिभोज वाले समय में पहुंचा दिया। एक पल की देर नहीं लगाई मैंने उनकी ‘रिक्वेस्ट’ स्वीकार करने में।

इस बीच किसी समय मौसी ने मेरी एक पोस्ट को पहली बार ‘लाइक’ करते हुए लिखा-‘हेलो, कैसी हो?’ फिर उनकी अगली टिप्पणी थी-‘मुझे पहचाना? मैं तुम्हारी शांता मौसी।’ वहीं से हमारे बीच संवाद का सिलसिला चल पड़ा। लेकिन इसके बाद के सारे संवाद ‘वॉल’ से हट कर ‘इनबॉक्स’ में होने लगे। हमने एक-दूसरे से अपनी अब तक की जिंदगी की कई बातें साझा कीं। उन्होंने मेरा मोबाइल नंबर मांगा। इसके बाद एक सुबह अचानक उनका फोन आया मेरे मोबाइल पर- ‘मैं बोल रही हूं, तुम्हारी शांता मौसी।’ वही खनकती-सी आवाज। उम्र की थकन अगर आवाज में न झलकती तो कुछ भी नहीं बदला था स्वरों के उतार-चढ़ाव में।’ मैंने पूछा- ‘ओह, आप इंडिया कब आईं?’

‘नहीं मैं भारत में नहीं हूं, सिएटल में ही हूं।’ उनकी इस बात ने मुझे झेंपने पर विवश कर दिया। मैंने उनसे ‘इंडिया’ कहा था और उन्होंने उत्तर देते हुए ‘भारत’ कहा। उस पर यह मेरे लिए हर्ष मिश्रित आश्चर्य का विषय था कि वे सिएटल से मुझसे बात कर रही थीं। शायद भारत में रहने वाले उनके रिश्तेदारों को भी उनके द्वारा फोन किए जाने की इच्छा रहती होगी। जल्दी-जल्दी परस्पर ढेर सारी बातें कर डाली थीं हम दोनों ने। उस दौरान उनके द्वारा कही गई एक बात मेरे मन को गहरे तक छीलती चली गई। उन्होंने कहा- ‘मैंने भारत के बहुत-से पुराने परिचितों को अपने फेसबुक में जोड़ रखा है। उनसे मुझे अपनेपन का बोध होता है, वरना यहां तो पराएपन की गंध जाती ही नहीं है। सच, दम घुटता है।’

बाद में देर तक मैं अपने मन को खंगालती रही कि मैं भी क्या उन्हें वह अपनापन दे पा रही हूं जो वे सात समंदर पार से यहां ढूंढ़ रही हैं? न जाने क्यों मुझे याद आ गई टॉम हैंक्स और मेग रायन की प्रसिद्ध फिल्म ‘स्लीपलेस इन सिएटल’। हॉलीवुड की 1993 की इस फिल्म में एक विधुर पिता को उसका आठ वर्षीय बेटा एक रेडियो टॉक शो में जाने के लिए प्रेरित करता है, ताकि उसका पिता अपने लिए एक नया जीवन-साथी ढूंढ़ सके। यह कहानी याद आते ही मुझे लगा कि वह सिएटल कहीं भी हो सकता है, अमेरिका ही नहीं, भारत के छोटे-से गांव-कस्बे में भी, जहां एकाकी लोग प्रेम भरे अपनेपन के लिए सोशल मीडिया का मुंह जोहते रहते हैं। सच कहूं तो यह सच मैंने उसी दिन जाना कि सिएटल ही नहीं, बल्कि पूरी वह दुनिया अनिद्रा की शिकार है जो आंखें फाड़-फाड़ कर आभासी दुनिया में अपने लिए मुट्ठी भर प्रेम तलाश रही है। उस आभासी दुनिया में जहां सच और झूठ में अंतर करना बेहद कठिन है।

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