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लोकार्पण की माया

पुस्तक लोकार्पण की परंपरा की शुरुआत इस देश में कब हुई, इसके बारे में मुझे अभी तक कुछ विशेष जानकारी नहीं है। लेकिन संभवत: यह आधुनिक दौर में इक्कीसवीं सदी की देन है। उससे पहले मध्यकाल के एक रचनाकार तुलसीदास से लेकर गुरु नानक और रीतिकालीन दरबारी कवियों में अपनी पुस्तकों के विज्ञापन या आत्मविज्ञापन […]

Author August 25, 2015 5:59 PM

पुस्तक लोकार्पण की परंपरा की शुरुआत इस देश में कब हुई, इसके बारे में मुझे अभी तक कुछ विशेष जानकारी नहीं है। लेकिन संभवत: यह आधुनिक दौर में इक्कीसवीं सदी की देन है। उससे पहले मध्यकाल के एक रचनाकार तुलसीदास से लेकर गुरु नानक और रीतिकालीन दरबारी कवियों में अपनी पुस्तकों के विज्ञापन या आत्मविज्ञापन के लिए लोकार्पण संस्कृति की पदछाप या इसके चिह्न हमें दिखाई नहीं पड़ते। उनके लिए कुछ सार्थक लिखना या साहित्य की रचना आत्मप्रचार या विज्ञापन का मसला नहीं होगा। इसके अलावा, उस दौर में तकनीकी दृष्टि से भी वह समाज उतना उन्नत नहीं था। उनके लिए साहित्य ऐसा जीवन दर्शन रहा, जिससे समाज को प्रेरित किया जाता था। यानी सामाजिक उद्देश्य के बिना कोई भी साहित्य चिरायु या आयुष्मान नहीं हो सकता।

इस तरह भारत में इक्कीसवीं सदी में लोकार्पण संस्कृति का जन्म हुआ है। कुछ नामचीन आलोचक इसे पुस्तक, लेखक-प्रकाशक सहित बाजार से जुड़ा मसला मानते हैं। यानी यह तीनों के विज्ञापन का माध्यम है। लेकिन कुछ आलोचकों की राय में यह आशीर्वादी संस्कृति है़, जिससे कोई नई पौध या खेप अचानक लेखक बिरादरी में शामिल कर लिया जाता है। वहां नई खेप या पौध के लेखकों की प्रशंसा इस भाव से होती है कि वह अपने लिए समस्याग्रस्त क्षेत्र का चुनाव करते हुए लिखने के लिए उद्यत या प्रेरित हो जाता है।

पश्चिमी आलोचक मैथ्यू ऑर्नाल्ड की मान्यता थी कि पुस्तक संस्कृति का प्रचार-प्रसार विज्ञापन, समीक्षा आदि उपक्रमों से नहीं होता, बल्कि अपनी अंतर्वस्तु के कारण कोई भी पुस्तक दीर्घ जीवन पाती है। मुझे जीवन में सफलता और सार्थकता दोनों की चाह है। इतनी हिम्मत है कि अपनी बात बेबाक ढंग से दूसरों के सामने प्रकट कर सकता हूं। एक बुद्धिजीवी या सामान्य मनुष्य अपनी गरिमा के साथ-साथ दूसरों की गरिमा का अवश्य खयाल रखता है।

हमारे जीवन में जन्मभूमि, पितृ-ऋण, गुरु-ऋण, मातृ-ऋण के अतिरिक्त समाज, राष्ट्र और स्मृतियों के भी ऋण होते हैं। उन्हीं ऋणों के दबाव में अपनी सद्य: प्रकाशित दिनकर पर केंद्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण कराने का विचार मन में आया। मैंने कई नामचीन आलोचकों से सपंर्क किया और लोकार्पण समारोह की जगह दिल्ली विश्वविद्यालय का अतिथि गृह निश्चित हुआ। विश्वविद्यालय परिसर सहित विभिन्न कॉलेजों में पोस्टर-बैनर लगाए गए। कार्यक्रम में वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह अस्वस्थ होने की वजह से नहीं आ सके।

हालांकि मेरे बुलाने पर वे पहले कई कार्यक्रमों आ चुके हैं। लेकिन अच्छी-खासी संख्या में कई प्राध्यापकों और नौजवान मित्रों के आने से मुझे राहत मिली। बल्कि मैं कह सकता हूं कि इन सबकी उपस्थिति से मेरा मनोबल बिखरने से बच गया। जो किन्हीं वजहों से नहीं आ सके, उनके प्रति मेरे मन में कोई मलाल नहीं है। बहरहाल, इस आयोजन के बाद मेरे मन में जो निष्कर्ष आया, वह यह कि हम ‘नितांत सामयिकता’ के बाड़े में कैद और मुदित हैं। हिंदी साहित्य के पाठकों में अकृतज्ञता और विस्मृति की सशक्त परंपरा है। आयोजन में उपस्थिति से पूर्व लेखक की जाति का पता लगाया जाता है। इन संकीर्णताओं से हिंदी समाज ग्रस्त है। इस दशा में बुद्धिजीवी किसे माना जाए, यह प्रश्न बार-बार परेशान कर रहा है।

बीते लगभग डेढ़ दशक में दिल्ली में जीवन की धूप-छांव के अनेक अनुभव हुए। लेकिन आज जब अपने गांव की तरफ देखता हूं तो लगता है कि घटनाओं की तलाश गांव में हम खुद करते हैं, जबकि दिल्ली जैसे शहरों में घटनाएं हमारी तलाश करती हैं। एक ठहरे हुए समाज और स्थिर जीवन-शैली को हम गांव कहते हैं। लेकिन किसी शायर ने लिखा है- ‘गर चाहते हो बादल में रखना पांव तो जरूरी है कि छूटा हो न गांव।’ दिल्ली को हम सुविधाओं का स्वर्गलोक मानते हैं। लेकिन सच यह है कि इस शहर में बाजार, चमक, तरक्की की सुविधाएं तो हैं, लेकिन समाज और संवेदनशील मनुष्य गायब है।

मेरी दृष्टि महात्मा गांधी के एक वाक्य की तरफ जाती है। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति या आंदोलन को सफल होने के लिए चार दौर से गुजरना पड़ता है- उपहास, तिरस्कार, उपेक्षा और दमन। इन वाक्यों से मेरे जैसी नौजवान पीढ़ी का मनोबल ऊंचा होता है और ताकत मिलती है।

(जयपाल सिंह)

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