ताज़ा खबर
 

कॉमरेड

अजेय कुमार मुझे मालूम था कि उन्हें कैंसर है। लेकिन मेरी इस जानकारी के बारे में उन्हें पता नहीं था। शायद इसीलिए अपने जीवन के आखिरी वर्षों में जब भी उनसे भेंट होती, वे प्रफुल्लित होकर मुझसे मुखातिब होते, ताकि मुझे शक न हो। उनसे मुलाकातें कम ही होती थीं, लेकिन जब पता चला कि […]

अजेय कुमार

मुझे मालूम था कि उन्हें कैंसर है। लेकिन मेरी इस जानकारी के बारे में उन्हें पता नहीं था। शायद इसीलिए अपने जीवन के आखिरी वर्षों में जब भी उनसे भेंट होती, वे प्रफुल्लित होकर मुझसे मुखातिब होते, ताकि मुझे शक न हो। उनसे मुलाकातें कम ही होती थीं, लेकिन जब पता चला कि उनके पास अब कम वक्त बचा है, मैं उनसे मिलने के अधिक अवसर खोजने लगा। आखिरी मुलाकात में उन्होंने अपने कैंसर को छोड़ कर हर विषय पर बात की और जब मैं चलने लगा तो बड़े संजीदा ढंग से मुझसे कहा- ‘तुमने मुझे कभी कॉमरेड नहीं समझा!’

उनका निधन हुए लगभग दो वर्ष होने को हैं, लेकिन अब तक उनकी यह बात नहीं भूल पाया हूं। उनसे मेरी पहली मुलाकात अस्सी के दशक में हुई थी। साक्षरता और जन-विज्ञान जैसे मुद्दों में मेरी दिलचस्पी थी और एक इंजीनियर होने के नाते मुझे लगता था कि वैज्ञानिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार में मैं शायद कुछ योगदान दे सकता हूं। इसी सिलसिले में मैं उनके संपर्क में आया, फिर दोस्ती बढ़ी। मैं उनसे बहुत प्रभावित था, लेकिन कई मित्रों की राय उनके बारे में भिन्न थी। कुछ तो उन्हें बेईमान भी कहते थे।

लेकिन इस पर मुझे हैरानी नहीं है, क्योंकि आज तक मैं किसी एक वामपंथी को नहीं जानता, जिसके बारे में कुछ लोग ऐसी राय नहीं रखें। दूसरे, मुझे बताया गया कि वे राजनीतिक तौर पर नक्सलियों के ज्यादा नजदीक हैं और कई तरह के स्वैच्छिक संगठनों से उनका नाता है। मेरे लिए यह सूचना भी उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं थी। मैं जानता हूं कि कई पुराने नक्सली विभिन्न स्वैच्छिक संगठनों के कर्ताधर्ता हैं। देखना यह चाहिए कि वे करते क्या हैं, किनके हित साधते हैं और धन का स्रोत क्या है। मैंने उनसे सीधे पूछा था कि उन स्वैच्छिक संगठनों में उनकी क्या भूमिका है। उन्होंने कुछ जानकारी मुझे दी, लेकिन विदेशी धन के सवाल पर मेरा शक बना रहा। कई मित्रों ने उनके संपर्कों का लाभ उठाया और विदेश यात्राएं कीं। अस्सी के दशक में विदेश यात्रा का आकर्षण अधिक था। उन्होंने एक बार ऐसे एक संगठन की बैठक में भाग लेने के लिए विदेश जाने का न्योता मुझे दिया, लेकिन विदेशी धन से दूरी बनाए रखने के सिद्धांत का पालन करते हुए मैंने उनके अनुरोध को नहीं माना।

साक्षरता आंदोलन और व्यापक शिक्षा आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से उनका संपर्क दूरदराज के इलाकों में काम कर रहे हजारों प्रगतिशील साक्षरता कार्यकर्ताओं के साथ हुआ, जिन्होंने अपनी तंगहाली के बीच भी जन-जन में साक्षरता की मशाल जलाए रखी। जमीनी हकीकत का उन पर असर था कि एक बार उन्होंने मुझसे कहा- ‘जिस घर में बच्चे भूख से मर रहे हों, वहां से लौट कर आप कोल्ड ड्रिंक नहीं पी सकते।’

वे लेखक तो अच्छे थे ही, प्रभावशाली वक्ता भी थे। वे गाते बहुत अच्छा थे और संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। ग़ालिब की गजलों वाली उनकी दी हुई दो सीडी मैंने कई वर्ष तक सुनीं। आजकल जब दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा संबंधी बदलावों को आनन-फानन में लागू करने के प्रयास चल रहे हैं तो ऐसे में मुझे अक्सर उनकी याद आती है।

लगभग चालीस वर्ष पहले भौतिक विज्ञान में पीएचडी करके जो व्यक्ति दिल्ली में एक प्रोफेसर की सुविधासंपन्न जिंदगी व्यतीत कर सकता था, वह अगर दूरदराज के एक शहर होशंगाबाद जाकर शिक्षा और ज्ञान के माध्यम से समाज को बदलने की राह चुनता है, ‘एकलव्य’ जैसी गतिशील संस्था का निर्माण करता है, भोपाल गैस कांड से प्रभावित लोगों के बीच उन्हें न्याय दिलाने के लिए संघर्ष में शामिल होता है, भारत ज्ञान विज्ञान समिति जैसे संगठन के राष्ट्रीय सचिव के पद पर रह कर देशभर में साक्षरता आंदोलन का मार्गदर्शन करता है, 2009 में संसद में पारित शिक्षा के अधिकार संबंधी कानून की नींव रखता है, नर्मदा बचाओ आंदोलन और उस जैसे कई जनवादी आंदोलनों में शरीक होकर उन्हें दिशा देने का प्रयास करता है, वह अगर केवल इतना चाह रहा है कि कोई उसे कॉमरेड कह कर बुलाए, तो यह कोई बड़ी मांग नहीं है। जबकि आज ऐसे कई घोषित कॉमरेड हैं जो ऐसे संबोधन से बचना चाहते हैं, उन्हें अब इस शब्द से मोह नहीं रह गया है।

बारह सितंबर 2013 को जब उन्होंने अंतिम सांस ली और लोदी रोड शवदाह गृह पर जब हम सबने ‘कॉमरेड विनोद रैना अमर रहे’ के नारों से अंतिम विदाई दी तो मुझे उनका उस दिन का चेहरा याद आ गया जब उन्होंने मुझसे शिकायत की थी कि मैंने उसे कभी ‘कॉमरेड’ नहीं समझा। घर लौट कर मैं उन तमाम दोस्तों को याद करने लगा जिनमें विचारधारा के स्तर पर कुछ छोटे-मोटे विचलन से ही मैंने उनसे दोस्ती लगभग खत्म कर दी थी, जबकि वे अच्छे इंसान थे, धर्मनिरपेक्ष थे और गरीबों का भला करना चाहते थे। आज मैं सोचता हूं कि अगर वे दोस्तियां खत्म न की होतीं तो शायद उनमें से कुछ आज ‘कॉमरेड’ कहलाना पसंद करते!

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Next Stories
1 स्वच्छता और पवित्रता
2 पहचान खोते शहर
3 अनचीन्ही प्रतिभाएं
ये पढ़ा क्या?
X