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उम्मीदों के समांतर

हमारा देश नित नूतन सवालों का देश है। लेकिन कुछ सवाल शाश्वत हैं जो कभी नहीं बदलते या हम उन्हें गंभीरता से बदलना ही नहीं चाहते। हम इसे यों भी कह सकते हैं कि सवालों से जूझना हमारा चिरंतन शौक है। लड़कियों की आजादी और पोशाक पर सवाल खड़े करना हमारी सनातनी सभ्यता का जहां सामान्य माना जाने वाला हिस्सा है, वहीं बेरोजगारी के सवाल पर हम ठगे से खड़े रह जाते हैं।

प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

हमारा देश नित नूतन सवालों का देश है। लेकिन कुछ सवाल शाश्वत हैं जो कभी नहीं बदलते या हम उन्हें गंभीरता से बदलना ही नहीं चाहते। हम इसे यों भी कह सकते हैं कि सवालों से जूझना हमारा चिरंतन शौक है। लड़कियों की आजादी और पोशाक पर सवाल खड़े करना हमारी सनातनी सभ्यता का जहां सामान्य माना जाने वाला हिस्सा है, वहीं बेरोजगारी के सवाल पर हम ठगे से खड़े रह जाते हैं। खुद कामचोरी करके भ्रष्टाचार को आजकल का शिष्टाचार बता कर दूसरों के भ्रष्टाचार को कोसना हमारा शगल बन चुका है। किसानों के पक्ष में कई योजनाएं बनने और घड़ों आंसू बहाने के बाद आज भी किसान क्यों आत्महत्या कर रहे हैं, इसका जवाब न हमारे पास है और न हमारे किसान चिंतक रहनुमाओं के पास। सवाल यह भी है कि जब हम दूसरों के आचरण और नीयत पर इतने सवाल खड़े करते हैं तो अपने खिलाफ सवाल किए जाने पर बौखला क्यों जाते हैं? कोई विरोधी तो दूर, हमारा मित्र भी मित्रवत भाषा में अगर हमारी किसी कमी की ओर इशारा कर देता है तो हमारा जनतांत्रिक चेहरा एकदम से पता नहीं कहां बिला जाता है! दूसरों की मां-बेटी पर व्यंग्यमय सवाल खड़े करते समय हमें अपने घर की बेटियों और महिलाओं के मासूम चेहरे क्यों याद नहीं आते हैं?

महिलाओं को लेकर हजार-हजार कुंठाएं पालने या उसे फैलाने में तो मानो हमारा कोई मुकाबला ही नहीं! दहेज विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़ कर नारे लगाने के बाद अपने बेटे के लिए बाकायदा लिस्ट बना कर दहेज मांगते समय हमारी जुबान क्यों नहीं लड़खड़ाती है? सवाल-दर-सवाल हमारी फितरत है। इस तरह के तमाम सवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी है और व्यक्ति की रुचियों के हिसाब से तैयार है। लेकिन अफसोस यह है कि सवालों के जंगल खड़े हुए हैं, मगर उनके उत्तर जैसे गूंगे हो चुके हैं। सवालों के जवाब कभी मिलेंगे भी या नहीं यह कहना भी अभी मुश्किल है।

क्रिकेट के प्रेमी अब मैदान से ज्यादा ड्रेसिंग रूम और खिलाड़ियों की निजी जिंदगी में ज्यादा ताक-झांक करने लगे हैं। पता नहीं, मैदान में उनका खेल अहम है या उनकी निजी जिंदगी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है! इसके अलावा, हमारा मीडिया और खासतौर पर टीवी मीडिया भी रोचक और सनसनीखेज की खोज में अपना युगधर्म भूल गया लगता है। विडंबना यह है कि जो सब पर सवाल खड़े करने की कूवत रखता है, खुद सवालों की बौछार को पल भर भी झेल नहीं पाता। राजनीति के अखाड़ेबाजों के लिए तो सवाल हमेशा ही मुंह बाए खड़े रहते हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सवालों की फसल खड़ी है, लेकिन हमारे नेता भी कम नहीं हैं। वे सवाल एक-दूसरे पर उछालते जा रहे हैं, लेकिन खुद पर उठे तीखे सवालों को भी नजरअंदाज कर जाते हैं या फिर उनकी दिशा बदल देते हैं। बेचारे सवाल करने वाले और जवाब की उम्मीद में बैठे दर्शक जवाब के इंतजार में आंखें बिछाए रह जाते हैं!

सवाल यह भी है कि क्या सत्तर साल की उम्र के बाद हम अब भी बचकाने बने रहेंगे और आने वाली उम्र की दहलीज पर अलग-अलग तरह की अनेक फूहड़ताओं और बेशर्मी के साथ कदम रखेंगे? गली-मोहल्ले में होने वाले बेलगाम झगड़ालू शोर से लेकर संसद तक में हालात देख कर तो ऐसा ही लगता है। क्या शिक्षा और चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे में हमारा रवैया सेवा की जगह ऐसे ही पेशेवराना बना रहेगा? रोजगार के लिए लाचार हमारे युवा किस दिशा में अपने लिए ठौर की उम्मीद करेंगे? क्या हम समाज के ज्यादातर लोगों को शिक्षा और बीमारियों के इलाज के लिए अस्पतालों के दरवाजे से वापस लौटाने की व्यवस्था तैयार कर रहे हैं? स्त्रियों के प्रति क्या ऐसे ही मध्ययुगीन सोच के साथ हम विकसित देशों की कतार में खड़े होने का दावा कर सकते हैं, अपने मौजूदा दागदार चेहरे के साथ? क्या हमारे साहित्यकार इसी तरह जन के गंभीर मुद्दों से मुंह चुरा कर पुरस्कारधर्मी लेखन में दत्त और चित्त रहेंगे? क्या पाठकों के अभाव को रोते-रोते वे कभी अपनी लेखनी के वैचारिक बंजरपन को भी रोएंगे?

सवाल बहुत हैं। हर सवाल के पीछे सवाल खड़े हैं और अपनी बाट जोह रहे हैं। बस नहीं हैं तो उनके माकूल उत्तर। लगता है, संतोषजनक उत्तर देने की या तो हमारी काबिलियत ही नहीं रही या हम अपने समय के प्रश्नों से मुंह चुराना चाहते हैं। हम नए साल में प्रवेश तो कर चुके हैं, लेकिन क्या इस नए साल में पुराने टोटकों से मन बहलाएंगे या कुछ नए हल भी खोजेंगे? लेकिन अगर हम नए साल में भी सवालों के सही जवाब ढ़ूंढ़ने के बजाय उसी तरह जुमले उछाल कर लोगों को रिझाने का खेल करते रहे तो फिर नएपन का सौंधा अहसास क्या होगा और उम्मीदों की नई कोंपले कैसे फूटेंगी?

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