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भय का कारोबार

मेरे पड़ोस में रहने वाली एक महिला बैंक में काम करती हैं। कुछ दिनों पहले उनके पति की मृत्यु हो गई, जो बेहद कर्मकांडी थे। पास के एक मंदिर में रोज जाते थे। वहां के एक पुजारी से भी उनकी मित्रता थी। उनकी मृत्यु की खबर सुन कर वे पुजारी भी उनके घर सांत्वना देने आए। मैं भी उस वक्त वहीं थी। पुजारी ने मेरी पड़ोसन से जो कुछ कहा, वह विचित्र था।

Author January 8, 2019 4:26 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल)

मेरे पड़ोस में रहने वाली एक महिला बैंक में काम करती हैं। कुछ दिनों पहले उनके पति की मृत्यु हो गई, जो बेहद कर्मकांडी थे। पास के एक मंदिर में रोज जाते थे। वहां के एक पुजारी से भी उनकी मित्रता थी। उनकी मृत्यु की खबर सुन कर वे पुजारी भी उनके घर सांत्वना देने आए। मैं भी उस वक्त वहीं थी। पुजारी ने मेरी पड़ोसन से जो कुछ कहा, वह विचित्र था। उसने कहा- ‘देखिए, मुझे सपना आया है कि आपके पति ने मुझे कुछ निर्देश दिए हैं। आपको उनका पालन करना होगा।’ पड़ोसन ने घबरा कर कहा- ‘आप जैसा बताइए, मैं यथाशक्ति पालन करूंगी।’ पुजारी ने कहा कि ‘अपने पति का मोबाइल ग्यारह महीने तक ऑन रखिएगा। उसका सिम मत हटाइएगा। इसके अलावा वे रोज जिस तरह पूजा-पाठ, दान या विधि-विधान आदि करते थे, वह सब जारी रखिएगा।’ पति की मौत से पड़ोसन काफी विचलित थीं और उस पुजारी की हर बात पर हामी भरती रहीं। पुजारी के जाने के बाद मैंने अपनी पड़ोसन से पूछा कि आप इन सज्जन को कितना जानती हैं, तो उन्होंने बताया कि मैं ज्यादा नहीं जानती, लेकिन मेरे पति इन्हें काफी मानते थे। मैं बस हैरान थी।

घर लौटने के बाद भी मैं सोच रही थी कि इस पुजारी ने इस तरह की बातें क्यों कीं। मुझे यही लगा कि मेरी पड़ोसन से मिल कर वह समझ गया कि अचानक घर में हुई मौत को अनिष्ट मानने वाली यह महिला डरी हुई है। अभी दुखी और परेशान भी है तो उनकी बातों में जल्दी आ जाएगी। इसके अलावा, वह चूंकि खुद अच्छी नौकरी में भी है तो उसके पास पैसों की भी समस्या नहीं है। यानी एक तरह से पुजारी ने भय के मनोविज्ञान का फायदा उठाया। धार्मिक मामलों में इस तरह की मनोवैज्ञानिक अवस्था में जीते लोगों की मन:स्थिति का फायदा उठाने के लिए मनोविज्ञान की जटिलता को समझना जरूरी नहीं होता। हमारे समाज में ज्यादातर लोग जिस मन:स्थिति में जीते हैं, उसमें पुजारी को इसका काफी अनुभव रहा होगा। उसे पता होगा कि किस तरह के व्यक्ति से क्या कह कर उसे अपने प्रभाव में लेना है।

अंधविश्वास और धर्म के पाखंड से जुड़ा सारा कारोबार भय के मनोविज्ञान पर ही टिका है। पहले तरह-तरह के काल्पनिक डर दिखाए जाते हैं। फिर उनके नाम पर विधि-विधान और पूजा पाठ बताए जाते हैं। भयग्रस्त व्यक्ति सोचता है कि उसकी सारी समस्याएं इसी रास्ते हल होंगी। अगर इस दौरान कुछ समस्याएं हल हो जाती हैं तो व्यक्ति को लगता है कि इसी कर्मकांड का लाभ हुआ है। जबकि वह उसकी अपनी कोशिशों के बूते हुआ होता है। आखिर बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही समय बताती ही है। यह सारा कारोबार इसी तरह चलता है। कुछ अच्छा हो गया तो इसी सबको मानने की वजह से हुआ है, अगर अच्छा नहीं हुआ तो पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा बढ़ाते जाओ। एक न एक दिन सब अच्छा होगा। इसी उम्मीद में लोग अपनी मेहनत की कमाई लुटाते रहते हैं। पुजारी या तांत्रिक जैसे अंधविश्वासों के कारोबारी बहुत अच्छी तरह से लोगों को मूर्ख बनाने की कला जानते हैं।

कई बार ऐसी घटनाएं भी सुनने में आती हैं कि लोगों ने तांत्रिक के कहने पर बच्चे की बलि तक चढ़ा दी है। ‘डायन’ या ‘चुड़ैल’ बोल कर महिलाओं को मार डाला। अचानक किसी ने बोल दिया कि फलां औरत ‘अपशकुनी’ है और लोगों ने अनिष्ट से बचने के लिए उसकी हत्या कर दी। कुछ लोग लड़की की कुंडली में ‘मंगल’ होने की धारणा पर ज्योतिष की सलाह के मुताबिक ‘दोष’ दूर करने के लिए उसकी शादी पेड़ या कुत्ते आदि से करवा देते हैं। अगर यह माना जाता है कि सिर्फ अशिक्षित या गांव के लोग ऐसी बातों को मानते हैं, तो यह गलत होगा। खासे पढ़े-लिखे लोग भी ऐसे झांसे में आ जाते हैं। एक फिल्म स्टार ने भी मांगलिक दोष के कारण अपनी होने वाली बहू की शादी पहले पेड़ से कराई थी।

दरअसल, भय और असुरक्षा का भाव जिसके अंदर जितना ज्यादा होता है, वह उतना ही ऐसे लोगों के चक्कर में पड़ जाता है। विडंबना यह है कि कितने सारे ठग बाबा पकड़े जाते रहते हैं, कितनों की पोल खुल चुकी है, इसके बाद भी बाबाओं और उनके भक्तों की संख्या में कमी न आना इस बात का प्रतीक है कि लोगों के सोचने-समझने के स्तर में बहुत फर्क नहीं पड़ता है। बलात्कार या हत्या जैसे जघन्य अपराधों के आरोप में जेल में पड़े तमाम बाबाओं के लिए लोग प्रदर्शन या उपवास आदि करते हैं। उल्टे लोग पाखंड के खिलाफ बोलने को धर्म के खिलाफ बोलना समझते हैं और उसी व्यक्ति से नफरत करने लगते हैं जो उन्हें तार्किक रूप से समझाने की कोशिश करता है। अफसोस की बात यह है कि हमारी सत्ता-व्यवस्था भी वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देने के बजाय अंधविश्वास फैलाने वालों को आजाद छोड़ने में विश्वास करती है। हालत यह है कि विज्ञान कांग्रेस तक में ऐसी बातें बिना किसी हिचक के प्रस्तुत की जाती हैं, जो अंधविश्वासों पर आधारित होती हैं और उनसे दुनिया भर में हमारे देश को हास्यास्पद स्थिति का सामना करना पड़ता है। इतना तय है कि जब तक लोग तार्किक होकर नहीं सोचेंगे, उनके भय के मनोविज्ञान का फायदा पाखंडी लोग उठाते रहेंगे।

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